ज़मीनें बंजर हो गईं, जवानी घर छोड़ गई

कर्नाटक, यादगीर ज़िला, हंचीनाल

कर्नाटक के यादगीर ज़िले के भीतर गांव हंचिनाल का एक परिवार इसी मलबे के ढेर पर सोता है. पिछले साल की तरह बारिश इस बार भी धोखा दे गई. सूखे और अकाल के हालात से जब खाने को कुछ नहीं तो घर की छत के लिए पैसा कहां से लाएं.

अयम्मा इसे अपना घर ही कहती हैं मगर कभी पक्के रहे घरों के बीच मौजूद उनकी फूस की छत ही उनका आखिरी सहारा है. बेटा गांव छोड़कर बैंगलोर चला गया है क्योंकि हंचिनाल में जब खेती ही नहीं बची तो वो क्या करे.

हंचिनाल की इरप्पा का टीन की छत का मकान गिर गया और फिर कभी बना ही नहीं. आज उनके इस घर में खाने के लाले हैं क्योंकि ज़मीन बंजर हो चुकी है. अब वो गांव के घर-घर में परचूनी का सामान बेचकर किसी तरह 25-30 रुपए कमा लेती हैं.

ये घर जागीरदार का था. मगर सूखे के बाद बने आर्थिक हालात ने पत्थरों के पक्के घर को भी तीन साल में खंडहर में तब्दील कर दिया क्योंकि एक बार टूटने के बाद जागीरदार भी उसे बनाने की हालत में नहीं रहे.

हंचिनाल के रहने वाले 68 साल के बासु की गांव से बाहर तीन एकड़ ज़मीन का एक हिस्सा, ज़रूरत की चौथाई बरसात हुई और इसने उनकी ज़मीन को किसी भी फसल के उगाने लायक नहीं छोड़ा.

दो एकड़ के रकबे का एक हिस्सा, जिसके कुछ हिस्से में सब्ज़ियां होती हैं, बाकी में पत्थर और रोड़ियां ही देखने को मिलेंगी.

बासु की खेतिहर ज़मीन गांव की 3000 की आबादी में से एक नमूना है. और तक़रीबन हंचिनाल की खेती की ज़मीनों का हाल यही है, जहां के क़रीब आधे युवा गांव छोड़कर जा चुके हैं.

हंचिनाल में केवल ज़मीन पर निर्भर किसान पूरी तरह पस्त है. इस साल मॉनसून की बेरुखी ने उसकी कमर तोड़कर रख दी है.

सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव के नेतृत्व में चल रही संवेदना यात्रा का आगाज़ दो अक्टूबर को यादगीर ज़िले के गांव हंचिनाल में हुआ. यह यात्रा हरियाणा के भिवानी तक जारी रहेगी और 15 अक्टूबर तक समाप्त होगी.

यादव का कहना था कि 50 करोड़ भारतवासी किसी न किसी रूप में सूखे की चपेट में हैं, लेकिन इस गंभीरता का अहसास किसी भी सरकार को नहीं है.

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