'घाटे का सौदा' है देसी गाय पालना

भारतीय राजनीति में गाय अचानक से एक महत्वपूर्ण मुद्दा हो गई है लेकिन क्या ये वाक़ई एक भावनात्मक मुद्दा है या फिर राजनीति का बस एक हथकंडा.

कई बार गाय को लेकर दूध, गोमूत्र, गोबर आदि का हवाला देते हुए कहा जाता है कि गाय सबसे फ़ायदेमंद जानवर है.

मैंने सोशल मीडिया पर कुछ लोगों से जानना चाहा कि अगर उन्होंने कभी गाय पाली हो या फिर वो गाय का अर्थशास्त्र जानते हों तो बताएं कि आखिर सच क्या है.

कई लोगों ने अपनी बात रखी. कुछ लोगों ने हिसाब किताब भी दिया कि एक गाय पालने में कितना ख़र्च आता है और ये अंतत: उतना फ़ायदेमंद नहीं दिखता, जितना इसके बारे में कहा जाता है.

एक औसत हिसाब किताब कुछ ऐसा हो सकता है लेकिन इसके इतर भी कई और बातें हैं जो लोगों ने ही बताई हैं.

हिसाब किताब

फेसबुक की मेरी पोस्ट पर अरबिंद झा, अमृत आनंद, मालिनी अडिगा, पारिजात पारिजात, प्रवीण कुमार झा, नवीन रमण, दीपक मिश्रा, शिवम यादव से लेकर सिद्धांत, अंजुले एलुजना, पारस प्रभात जैसे पाठकों ने अपनी राय दी है.

इसके साथ ही कई लोगों ने इनबॉक्स में भी बातें रखी हैं.

इन सबकी राय का लब्बोलुआब कुछ यूं बनता है कि देसी गाय किसी भैंस या संकर गाय की तुलना में घाटे का सौदा है. संकर गायें और भैंसे अधिक चारा खाती हैं लेकिन अधिक दूध भी देती हैं.

नवीन रमन कहते हैं कि देसी गायों को पालने का ख़र्चा कम होता है. वो कहते हैं कि गांवों को छोड़ दें तो कस्बों-शहरों में गायों को दूहने के बाद छोड़ दिया जाता है और लोग उन्हें तब फिर पकड़ कर ले आते हैं जब वो गर्भ से होती है.

बीबीसी हिंदी के पाठक सिद्धांत कहते हैं कि गाय के दस साल के हो जाने के बाद बहुत कम परिवार उसे अपने पास रखते हैं. ऐसी अधिकतर गायें जंगल या नदियों के पास छोड़ दी जाती हैं या फिर उन्हें कसाई खरीद कर ले जाते हैं.

'गाय का दूध और फैट'

अमृत के घर में गायें पाली जाती हैं और वो मानते हैं कि गाय का फैट अच्छी क्वॉलिटी का होता है. वो कहते हैं कि अगर आप किसान हैं तो देसी गाय पालने में ख़र्च बहुत कम होता है.

वो गाय के राजनीतिकरण पर कहते हैं कि असम और बिहार जैसे इलाकों में दुधारू गायों की चोरी होती है जिस पर पुलिस कुछ नहीं करती है और ये आगे चलकर राजनीतिक मुद्दा बन जाता है.

अंजुले पूरा हिसाब किताब देते हुए कहते हैं कि लोग गायें इसलिए पालते हैं ताकि घर में अपने खाने पीने भर का दूध आ सके. इसका व्यावसायिक लाभ कुछ ख़ास नहीं है.

नवीन बताते हैं कि वो हरियाणा से हैं जहां गाय का दूध हलवाई नहीं खरीदते हैं. कुछ लोगों का कहना है कि इसमें फैट कम होता है हालांकि कुछ लोग मानते हैं कि इसमें फैट सुपाच्य होता है जो बच्चों के लिए फायदेमंद हो सकता है.

खैर मुझे चार से पांच लोगों ने मोटा मोटा हिसाब किताब भी दिया और कुल मिलाकर अगर आप सिर्फ़ गाय पाल रहे हैं और आपका उद्देश्य दूध बेचने तक सीमित है तो इससे क़रीब 14 साल में 75 हज़ार से 1 लाख रुपए तक का फ़ायदा हो सकता है.

शायद यही कारण है कि शहरों में कस्बों में देसी गायें खुले में घूमती दिख जाती हैं लेकिन जरसी या अन्य संकर गायें या भैंसे कभी भी सड़क पर नहीं दिखती हैं.

यानी कुल मिलाकर देसी गाय पालना एक नुक़सान का सौदा है अगर भावनात्मक पक्ष को अलग कर दिया जाए तो.

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