मोदी की 'बेपरवाही' और राहुल का 'भोलापन'

दादरी के पीड़ित परिवार के सदस्य

पिछले हफ्ते दिल्ली से सटे दादरी में गोमांस की अफवाह पर एक मुस्लिम व्यक्ति की हत्या ने क्या राजनीतिक कल्पनाशीलता की विफलता को उजागर कर दिया है?

ये घटना देश की राजधानी दिल्ली से महज़ 50 किलोमीटर दूर हुई.

पेशे से लोहार 50 वर्षीय मोहम्मद अख़लाक़ की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी थी और भीड़ की हिंसा का शिकार उनका बेटा दानिश गंभीर रूप से घायल हो गया था.

अख़लाक़ का एक और बेटा भारतीय वायुसेना में तकनीशियन के रूप में कार्यरत है और वह हमले में इसलिए बच गया क्योंकि वह गांव में नहीं रहता है.

मोदी की चुप्पी

घटना को गुज़रे एक हफ़्ते से भी अधिक समय बीत गया है, लेकिन सोशल मीडिया में बेहद सक्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुप्पी साध रखी है.

इमेज कॉपीरइट Reuters

मोदी ने हाल की अपनी अमरीकी यात्रा में वहाँ के लोगों द्वारा किए गए अतिथि सत्कार के लिए उनका शुक्रिया अदा किया, मत्रिमंडल के अपने एक सहयोगी और एक राज्यपाल को उनके जन्मदिन पर शुभकामनाएं दी और चीन के लोगों को उनके राष्ट्रीय दिवस पर शुभकामनाएं देना भी नहीं भूले.

मोदी ने ट्विटर के ज़रिए एक गायिका के बेटे के निधन पर शोक जताया, जबकि बिलियर्ड्स चैंपियन को उनकी शानदार उपलब्धि के लिए बधाई भी दी.

इतिहासकार शिव विश्वनाथन के मुताबिक़ दादरी मामले पर मोदी की चुप्पी ‘उदासीनता की चुप्पी है, जो कि बेपरवाही बन गई है क्योंकि ये पीड़ित को सम्मान देने से इनकार करती है.’

‘आश्चर्यजनक’

बहुमत के साथ देश पर राज कर रही उनकी पार्टी तो हालात को और बिगाड़ रही है.

पार्टी के वरिष्ठ सांसद तरुण विजय ने एक अख़बार में लिखा कि, “महज़ अफवाह पर एक व्यक्ति को पीट-पीट कर मारना एकदम गलत है.” तो क्या इसका मतलब ये है कि अगर उसने वाकई गोमांस खाया होता और भीड़ के पास इस बात के पक्के सबूत होते तो सजा एकदम जायज होती.

स्तंभकार प्रताप भानु मेहता ने कहा, “तरुण विजय की माफ़ी भी हिंसक नज़र आती है और इसकी पूरी-पूरी ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री मोदी पर आनी चाहिए.”

राजनीतिक अदूरदर्शिता मोदी की चुप्पी और तरुण विजय के लेख पर ही ख़त्म ही नहीं हुई. केंद्रीय पर्यटन मंत्री और स्थानीय सांसद महेश शर्मा ने पीड़ित परिवार से मुलाक़ात की और कहा कि गाय काटने की अफवाह की घटना की प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप ये हत्या हुई है.

महेश शर्मा ने वहाँ मौजूद पत्रकारों से कहा कि घर में मृतक अख़लाक़ की बेटी भी थी, लेकिन उन्हें किसी ने नहीं छुआ. उनके इस बयान से ऐसा लगा कि जैसे भारत की महिलाओं को इस दया के लिए शुक्रगुज़ार होना चाहिए.

आग में घी का काम किया भाजपा के विधायक संगीत सोम ने. रविवार को बिसारड़ा पहुँचे संगीत सोम ने धार्मिक उन्माद को भड़काते हुए कहा कि अगर हिंदू समुदाय के निर्दोष लोगों को ‘फंसाया’ गया तो हिंदू मुंहतोड़ जवाब देने में सक्षम हैं.

विपक्षी पार्टियां भी इस मुद्दे पर कुछ कम नहीं नकलीं.

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी घटना के लगभग एक हफ्ते बाद अख़लाक़ के परिवार से मिलने पहुँचे. इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक लगभग आधा दर्जन ट्वीट कर अपनी भावनाओं को इज़हार किया.

उन्होंने कहा कि गांव वालों के सदभावना बनाए रखने की इच्छा से वे बहुत प्रभावित हुए और यही भावना देश को मुश्किल समय से बाहर निकालेगी.

‘भोलेपन की राजनीति’

इमेज कॉपीरइट AFP

डॉक्टर विश्वनाथन का कहना है कि राहुल की ‘भोलेपन की राजनीति’ सांप्रदायिकता और सामाजिक विद्वेष से लड़ने की ज़िम्मेदारी से भागना है और लोगों की सुरक्षा उनके भरोसे छोड़ना है. सवाल है कि भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी क्या इस मुद्दे पर इतना ही कुछ कर सकती थी.

उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी समाजवादी पार्टी के बारे में जितना कहा जाए, उतना कम है. सपा के शासन में मजहबी संघर्ष और तनाव की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं.

इमेज कॉपीरइट Akhilesh Yadav

लेकिन लगता है कि अखिलेश यादव की सरकार इन घटनाओं से बेपरवाह है और शांति को पैसे के दम पर ख़रीदना चाहती है. पहले, अखिलेश ने अख़लाक़ के परिवार को हवाई मार्ग से लखनऊ बुलाया और घटना के बाद से मुआवज़े की रकम का ऐलान तीन बार कर उन्हें न्याय और सुरक्षा का भरोसा दिलाया.

आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी घटना के लगभग एक हफ्ते बाद गांव पहुँचे और पहले आरोप लगाया कि पुलिस उन्हें गांव नहीं जाने दे रही है, इसके बाद जब वह गाँव पहुँचे तो तमाम पार्टियों पर वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया.

सब कुछ ख़त्म नहीं

भारतीय वायु सेना के प्रमुख अरुप राहा ने भी प्रतिक्रिया दी कि कि वह अख़लाक़ के परिवार को वायुसेना के निकटतम इलाक़े में लाने पर विचार कर रहे हैं.

इमेज कॉपीरइट MOD

उन्होंने मोहम्मद सरताज के बारे में कहा, “हम उनके साथ हैं और हमारे लोग उनके परिवार की सहायता करने के लिए वहाँ हैं.”

रविवार को एक टॉक शो में सरताज ने ‘सारे जहाँ से अच्छा, हिंदोस्तां हमारा’ गाया और कहा, “कुछ लोगों की ग़लती के लिए बहुसंख्यकों को क्यों दोष देना चाहिए.”

उम्मीदें बाक़ी

भीड़ जब अख़लाक़ के घर में दाखिल हुई तो उससे पहले उन्होंने मदद की आख़िरी गुहार एक हिंदू परिवार से ही लगाई थी.

इमेज कॉपीरइट AFP

यही नहीं, कई हिंदू परिवारों के अपने पड़ोसी मुसलमानों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाने से उम्मीदें अभी ज़िंदा हैं. राजनीतिक मनोविज्ञानी आशीष नंदी कहते हैं, “दादरी घटना पर पार्टियों की प्रतिक्रिया भारत की राजनीतिक कल्पनाशीलता की विफलता है.”

विश्वनाथन कहते हैं, “हर पार्टी हर मुद्दे को राजनीतिक चश्मे से देखती है.” उनका मक़सद बस चुनाव जीतना भर रह गया है. यानी चुनावी लोकतंत्र वास्तव में भारत के लिए लोकतंत्र विरोधी बन गया है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार