मुस्लिम पर्सनल लॉ के नियम महिला विरोधी हैं?

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लखनऊ की हिना के शादीशुदा जीवन में सब कुछ सही चल रहा था. अचानक एक दिन पता चला कि उनका तलाक़ हो गया है.

हिना ने बताया, "यह तलाक़ मेरी जानकारी में नहीं था. मैं मायके से ससुराल गई तो मेरी सास और पति ने मुझे बताया कि मेरा तलाक़़ हो चुका है."

ज़बानी तलाक़़, यानी तीन बार तलाक़ कहकर तलाक़ देने और दूसरे विवाह के लिए पहली पत्नी छोड़ने जैसे सवाल भारत के मुस्लिम समाज की एक बड़ी समस्या बने हुए हैं.

नायश हसन लखनऊ में महिलाओं के अधिकार के लिए 'तहरीक़' नामक एक ग़ैर सरकारी संगठन चलाती हैं.

वो कहती हैं, "1938 का शरीयत एप्लिकेशन ऐक्ट बहुत महिला विरोधी है और वह सामंती परम्पराओं की देन है. उसमें बदलाव चाहिए."

भारत में मुसलमानों के शादी और तलाक़ जैसे मामले मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बनाए हुए वर्षों पुराने क़ानूनों के तहत तय किए जाते हैं.

इस्लामी क़ानून

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राजनीतिज्ञ शाज़िया इल्मी कहती हैं कि ये क़ानून इस्लामी नियमों से मेल नहीं खाते.

उनके मुताबिक़, "मिस्र, तुर्की, मलेशिया हर जगह क़ानून में बदलाव हुआ है और तीन बार कह कर दिए जाने वाले तलाक़ पर पाबंदी लग चुकी है. लेकिन यहां पर धार्मिक लोग किसी बहस की भी इजाज़त नहीं देते."

नायश हसन का कहना है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में बदलाव की बहुत सख़्त ज़रूरत है, वो कहती हैं कि, "यह एक ग़ैर चुनी, अलोकतांत्रिक और महिला विरोधी संस्था है."

लेकिन पर्सनल लॉ बोर्ड का कहना है कि उसके क़ानून क़ुरान और इस्लाम के पैगम्बर के उपदेशों के आधार पर तैयार किए गए हैं.

बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य और प्रवक्ता डॉ सैयद क़ासिम रसूल इलियास का कहना है, "दिक्कत क़ानून में नहीं है. यह क़ानून न तो सामंतवादी दौर के हैं ना पुराने हैं. ये क़ुरान और सुन्नत की बुनियाद पर बनाए गए हैं."

'मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड'

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मुस्लिम महिलाओं का एक संगठन 'भारतीय मुस्लिम महिला' आंदोलन के एक देशव्यापी सर्वेक्षण के अनुसार, 90 प्रतिशत से अधिक महिलाएं शादी, तलाक़ और मेंटेनेंस के क़ानून में बदलाव चाहती हैं.

संगठन की एक पदाधिकारी ज़किया सुमन कहती हैं, "मुसलमानों के लिए संसद के द्वारा मंज़ूर किए गए क़ानून की ज़रूरत है. ऐसे कोडीफ़ाइड क़ानून चाहिए जिनसे महिलाओं को बराबरी का हक़ मिल सके. अब नई नस्ल ग़ैरबराबरी सहन करने के लिए तैयार नहीं हैं."

धार्मिक संगठनों पर आधारित मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अभी तक भारत के मुसलमानों के निकाह और तलाक़ तक का कोई संयुक्त मॉडल तैयार नहीं कर सका है.

मुस्लिम समाज में अब ये मांग बढ़ रही है कि शादी और तलाक़ जैसे अहम सामाजिक पहलुओं के लिए ऐसे क़ानून बनाए जाएं जो न केवल इस्लामी हों बल्कि जो इस युग की लोकतांत्रिक मान्यताओं से भी मेल खाते हों.

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