महिलाओं के काम की गिनती ही नहीं

इमेज कॉपीरइट AFP

यूँ तो आँकड़ों में पूरी सच्चाई नहीं बसती. इंसान की क़ीमत तनख़्वाह नहीं है और देश के हालात जीडीपी की नब्ज़ पकड़ के नहीं समझे जा सकते.

फिर भी, आँकड़ों में सच्चाई का एक अंश तो मिल ही जाता है. हाल में मकिन्ज़ी ग्लोबल इंस्टिट्यूट की रिपोर्ट निकल आई, जिसमें अर्थव्यवस्था में महिलाओं की बराबर की हिस्सेदारी का मूल्यांकन किया गया है.

दुनिया भर में डॉलर 28 ट्रिलियन (28 करोड़ खरब डॉलर) का इज़ाफ़ा. अपने देश का जीडीपी कम से कम 60 फ़ीसदी बढ़ सकता अगर महिलाओं का योगदान 17 फ़ीसदी से बढ़ कर 50 फ़ीसदी हो जाए.

सुनने में सही लगता है. जीडीपी भी बढ़ जाएगा, लगे हाथ महिलाओं की बराबरी भी हो जाएगी.

लेकिन ग़ौर फ़रमाएं, रिपोर्ट ये नहीं कहती कि अपने यहाँ सिर्फ़ 17 फ़ीसदी महिलाएं काम करती हैं.

काम के मामले में शायद 50 फ़ीसदी से ज़्यादा की हिस्सेदारी हो. पर उनके काम की हमारी अर्थव्यवस्था में– यानी जीडीपी में– कोई तहरीर नहीं.

श्रम की क़ीमत नहीं

इमेज कॉपीरइट AP

किसान आदमी खेती करता है तो फ़सल की क़ीमत होती है. भैंस को चारा डालती उसकी बहन के काम की कोई क़ीमत नहीं.

जुलाहा साड़ी बुनता है तो साड़ी की क़ीमत होती है. उसके घर की औरतें धागे सुलझायें, रंगाई में हाथ बँटायें- कोई क़ीमत नहीं.

कोई कंपनी आपको नौकर रख ले, उसकी क़ीमत है क्योंकि आपकी गिनती कंपनी के ख़र्चों में होगी. आपकी माँ अगर नौकरी-पेशा ना हो, उनके श्रम की क़ीमत नहीं.

इसी तरह औरत की मज़दूरी की सूचिका अक्सर ख़ाली रही. घर के काम– सफ़ाई, सजावट, खाना पकाना इत्यादि, बच्चों की देख-रेख इनका वेतन नहीं मिलता, ना ही घंटों का कोई हिसाब.

अगर बीवी या माँ या बेटी ना करे, किसी ग़ैर को मज़दूरी देनी पड़ जाए और इसका बाक़ायदा हिसाब रखा जाए, तो वही काम अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन जाता है.

इंसाफ़ नहीं नापा जा सकता

इमेज कॉपीरइट Getty

मकिन्ज़ी रिपोर्ट के आँकड़े महिलाओं का योगदान नहीं बताते, ये बतलाते हैं जीडीपी के ज़रिए आर्थिक इंसाफ़ या हक़ नहीं नापा जा सकता.

मुश्किल ये है कि महिलाओं के श्रम का बाज़ारीकरण नहीं हुआ है. काम तो कर रही हैं. वेतन दे दो, बराबरी भी हो जाएगी.

पर अपने ही घर-परिवार से आर्थिक हक़ माँगना आसान नहीं. क़ीमत मकान की होती है, घर की नहीं. सबसे बड़ी बात, काम से इनकार नहीं कर सकती वो.

बच्चे, बूढ़े, जानवर– यह सिर्फ़ आर्थिक नाते नहीं हैं, उसकी ज़िंदगी हैं. इन्हें छोड़ भी नहीं सकती. इसी तरह औरत अक्सर मोहताज रही.

पैसों के बिना घरवालों की हिंसा से ख़ुद को या अपने बच्चों को बचा नहीं सकती. पैसों के बिना वो प्यार भी दिल खोल के नहीं कर सकती.

घर का काम ज़रूरी

इमेज कॉपीरइट EPA

शायद अर्थशास्त्री ठीक कहते हैं, "श्रम के बाज़ार में औरत को आदमी की बराबरी करनी चाहिए. नौकरी या कारोबार करना चाहिए. लेकिन यहाँ भी समस्या है."

श्रम के बाज़ार में उतरना तभी मुमकिन है जब घर के काम में फँसी ना हो.

वो तभी होगा जब आदमी आधा काम करने को तैयार हो. बे-वेतन, बे-हिसाब.

आँकड़ों की बात चली है तो एक आँकड़ा ये भी देखिए – ओसीईडी (ऑर्गनाइज़ेशन फ़ॉर इकोनोमिक को-ऑपरेशन आंड डेवेलपमेंट) की रिपोर्ट आई थी जिससे पता चलता है की भारतीय पुरुष

सामान्य रूप से दिन में 19 मिनट घर के काम-काज में ख़र्च करता है जबकि महिला 298 मिनट ख़र्च करती हैं. भारतीय पुरुष सबसे कम काम करता है 30 देशों के मुक़ाबले में.

इलाज क्या

इमेज कॉपीरइट AP

फिर, इलाज क्या है? शायद वही करना होगा जो आइस्लैंड की महिलाओं ने किया.

24 अक्तूबर, 1975 में आइस्लैंड की 90 फ़ीसदी महिलाओं ने काम करने से इनकार कर दिया. ना बच्चों को खिलाया, ना दफ़्तर गईं, ना फ़ैक्ट्री ना अस्पताल.

ये हड़ताल नहीं थी, एक दिन की 'छुट्टी' थी. एक ही दिन काफ़ी था. वेतन में पूरी बराबरी ना सही, लेकिन आज श्रम बाज़ार में आइस्लैंड की महिलाओं की भागीदारी सबसे ज़्यादा है.

भारतीय महिलाओं को भी अपने काम की क़ीमत जतानी होगी, क्योंकि जब तक उसके श्रम का 50 फ़ीसदी मूल्यांकन नहीं हो जाता, उसे 50 फ़ीसदी आज़ादी मिलना भी मुश्किल है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार