बिजली के अभाव ने बना दिया कुँवारों का गाँव..

माखनपुर गाँव

अगर आपको 1957 की 'मदर इंडिया' का गाँव देखना है, तो बांदा के गाँव माखनपुर चलें. माखनपुर जैसे गाँव 2015 में भी हो सकते हैं और ये कोई हैरानी की बात नहीं है.

मगर लालटेन की रोशनी में जी रहे माखनपुर में सिर्फ़ घुप अंधेरा ही नहीं पसरा रहता. बिजली के अभाव ने इस गाँव का सामाजिक तानाबाना भी बदल डाला है.

जब मैं उत्तर प्रदेश के इस गाँव में रात 11 बजे पहुँचा, तो समूचे गाँव में अंधेरा था. तारों की रोशनी ने हमें गाँव तक पहुँचने का वो रास्ता दिखाया जिस पर आप शायद दिन में भी चलना पसंद न करें.

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कालिंजर को जाने वाले रास्ते पर गाँव में घुसने का वही एकमात्र रास्ता है. क़रीब दो-तीन फ़ीट गहरे गड्ढों से बनी, धूल की मोटी पर्त से अंटी एक कच्ची पगडंडी.

सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव के नेतृत्व में चल रही संवेदना यात्रा की टोली के साथ हम इस गाँव में पहुँचे.

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गाँव के जिस घर में रात को हम रुके, वहां की बहू नीलम यादव ने हमें हक़ीक़त से रूबरू कराया.

नीलम ख़ुद बीए और बीएससी पास हैं और अपने आसपास के माहौल को लेकर काफ़ी जागरूक हैं.

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बांदा शहर की रहने वाली नीलम शादी के बाद पांच साल लगातार गाँव में रहीं, मगर अब बच्चों के भविष्य की ख़ातिर शहर में रहती हैं.

वो बताती हैं, ''हमें लगा कि हमारे बच्चे भी इसी हाल में पलेंगे तो हमें अच्छा नहीं लगा. तो हम चले गए. 2005 में हमारी ननद बीमार हुईं, तो इतनी बुरी हालत हुई कि खटिया बनाई गई और नदी पारकर उन्हें ले जाना पड़ा. हम अपने माता-पिता से कहते थे कि आपने मुझे कहां डाल दिया.''

न बिजली न पानी

उनका दर्द उनकी आंखों की कोर से टपकने को बेताब आंसुओं में छिपा था. ढाई हज़ार की आबादी वाले, 900 वोटरों के गाँव माखनपुर में आज भी रात को घरों में लालटेन की रोशनी में लोग खाना खाते हैं.

बहुतों के पास मोबाइल फ़ोन नहीं. जिनके पास हैं वो उन्हें चार्ज कराने गाँव के बाहर एक दुक़ान पर जाते हैं.

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गाँव में बिजली नहीं तो पीने का पानी भी नहीं और न कोई स्वास्थ्य केंद्र....रही-सही कसर सूखे ने पूरी कर दी है. कई कुएँ सूख चुके हैं. हैंडपंपों का पानी 100 फ़ीट से नीचे है.

मुसीबतों के इस गाँव में बिजली के अभाव ने अगर सबसे ज़्यादा कहर ढाया है तो वो हैं कुँवारे.

'कोई बेटी देने को तैयार नहीं'

नीलम की ज़ुबानी ही सुनिए- ''जब मैं यहां शादी होकर आई तो यहां विश्वकर्मा बिरादरी की महिलाएं कहा करती थीं कि आपके यहां कोई लड़की हो तो हमारे लड़कों के लिए बताएं. हम सोचते थे कि यहां कौन शादी करेगा, ये तो हम ही फँस गए हैं. कभी कभी यहां लोग खरीदकर लड़की ले आते हैं. पिछले दिनों एक ऐसी लड़की भाग गई थी.''

नीलम की बात सही थी. गाँव के एक बुज़ुर्ग के मुताबिक़ गाँव में क़रीब डेढ़ सौ कुँवारे लोग हैं, जिनमें से ज़्यादातर 65 से 35 साल की उम्र के हैं.

बिजली न होने और पीने का पानी न होने से गाँव को कोई अपनी बेटी देने को तैयार नहीं. हालांकि लड़कियों की शादी तुरंत हो जाती है.

शिवबदन के छोटे भाई की शादी हो चुकी है. जब मैंने 42 साल के शिवबदन से पूछा तो उनका कहना था, ''जुगाड़ तो बहुत लगाया कि शादी हो जाए पर हुई नहीं. बीच में रिश्तेदार शादी की बातचीत काट देते हैं.''

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कुआंरों का गाँव

शिवबदन के सिवाय कोई ये मानने को तैयार नहीं कि उन्हें लड़की नहीं मिली. बाक़ी लोग कहते हैं कि उन्होंने ख़ुद ही शादी नहीं की है.

45 साल के मलखान सिंह कहते हैं, ''शादी हमने नहीं कराई. न कोई साधन है आने-जाने का, न लाइट है. कोई व्यवस्था है नहीं. माता पिता ने शादी की कोशिश तो बहुत की, बात भी चलाई मगर हमने मना कर दिया.''

मूल रूप से महाराष्ट्र के रहने वाले 60 साल के नाना भाऊ महाराष्ट्र ने बताया कि उन्हें काम नहीं मिला तो उनकी शादी भी नहीं हो सकी.

राम मिलन (40) के मुताबिक़ उनकी शादी इसलिए नहीं हुई क्योंकि ''गाँव में खाने-पीने की तकलीफ़ है. झुरहा (सूखा) पड़ता है.''

ग़रीबी से जूझ रहे रमाशंकर (40) विकलांग हैं. कहते हैं कि उन जैसे ग़रीब को कौन बेटी देगा. जब मैंने पूछा कि आप शादी करना चाहते हैं तो मुस्कराने लगे.

बिजली ने काटे रिश्ते

70 साल के बद्री के कुँवारे होने के पीछे भी बिजली वजह बनी.

अब वो अपनी बाक़ी ज़िंदगी को ऐसे ही गाँव में गुज़ार देना चाहते हैं.

उनका कहना है कि जब मेरे अपने पेट का पूरा नहीं पड़ता तो कैसे दूसरे की बेटी को 'फंसा' दें.

क्या बिजली किसी समाज के ढांचे में मूलभूत बदलाव ला सकती है?

1957 के भारत में ऐसा न हुआ हो पर 2015 में ये हो रहा है.

और ये वो देश है जिसमें पूरे एशिया में पहली बार बिजली की चमक दिखाई दी थी और जो आज़ाद होकर 68 साल का हो चुका है.

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