'मोदी आपकी मर्ज़ी से बोलें तभी ठीक'

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बात की शुरुआत इस बात से कि किसी को भी, किसी के भी द्वारा, किसी भी कारण से मारा जाना नितांत ग़लत है और ऐसा करने वालों को क़ानून के लिहाज़ से सज़ा होनी ही चाहिए.

इसमें किसी किन्तु-परन्तु की गुंजाइश नहीं है. किसी को भी क़ानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए.

लेकिन सारे घटनाक्रम को व्यापक दृष्टि से देखें, तो दिक़्क़त यही है कि इस 'किसी को भी' की दो परिभाषाएं इस देश में चल रही हैं.

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जो फ़ौजदारी अपराध में लिप्त रहे होने के अभियुक्त हैं, वे क़ानून की गिरफ़्त में हैं, लेकिन जिन्होंने आसमानी और सुल्तानी क़ानून अपने हाथ में लिया हुआ है, वे न केवल क़ानून से खिलवाड़ कर रहे हैं, बल्कि उसकी बेहद निर्मम हत्या भी कर रहे हैं.

प्रथम दृष्टि में, वे सिर्फ़ सुनी-सुनाई बातों पर, पुलिस, जज और जल्लाद सारी भूमिकाएं अपना लेते हैं और वह फ़ैसला सुना डालते हैं, जो उनके मन में पहले से कुलबुला रहा होता है, जिसे बस बहाने की तलाश होती है.

इस तरह पूरी क़ानूनी प्रक्रिया को अपने हाथ में लिया जा रहा है? फिर से याद कीजिए, 'किसी को भी क़ानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए.' कौन से वाले 'किसी' को?

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नयनतारा सहगल का मामला देखिए. 'रिच लाइक अस' उपन्यास के लेखन पर उन्हें 1986 में, 1984 में एक बड़ा पेड़ गिरने के दो साल बाद, साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था, जिसे उन्होंने दादरी घटना के विरोध में 2015 में लौटाने का ऐलान किया है. वैसे उसकी एक्सपायरी डेट क्या होती होगी?

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फ़ैसला पहले से कैसे कुलबुला रहा होता है? ऐसे कि 'धार्मिक असहिष्णुता की राजनीति' बढ़ रही है और इंडिया में मोदी सरकार बनने के बाद से बढ़ रही है– इस सिद्धांत का हाल ही में, मीडिया के एक प्रत्याशित वर्ग में उस समय अचानक विस्फोट हुआ, जब पश्चिम बंगाल के रानाघाट में एक 70 वर्षीय बुज़ुर्ग नन के साथ दुराचार की ख़बर आई.

तब तक शायद ज़रूरी बारूद एकत्र हो चुका होगा, रानाघाट सिर्फ़ चिंगारी था. बड़े धार्मिक पदाधिकारी, कैथोकिल बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष, देश भर के अंग्रेज़ी टीवी चैनल और न जाने कौन-कौन हर तरह की बातें करने लगे थे, दादरी की तरह रानाघाट 'सेक्युलर टूरिज़्म' का केन्द्र बन गया था.

माने धमाका उस बारूद में किया गया था, जिसका पलीता भी फुस्स था. लेकिन शोर मच गया कि तोप चल गई, तोप चल गई. किस तरफ़ चली?

लेकिन इसकी पूरी तरह अनदेखी करके मीडिया की तोपें फिर दूसरी चिंगारी तलाशने लगीं.

फ़ैसला

वापस दादरी पर लौटते हैं, पहले एक शब्द नयनतारा सहगल पर. उन्होंने अवार्ड लौटाने का ऐलान करती हुई जो तक़रीर पेश की है, वह सुप्रीम कोर्ट की परिपूर्णतम पीठ के अंतिम फ़ैसले जैसी है.

दादरी घटना पर फ़ैसला है, उसके लिए मोदी के ज़िम्मेदार होने का फ़ैसला है, राज्य सरकार को बिना पेशी, बिना इल्ज़ाम बरी करने का फ़ैसला है और इन घटनाओं को महान नरसंहार की पदवी दिए जाने का फ़ैसला है— "इन मैमोरी ऑफ़ द इंडियन्स हू हैव बीन मर्डर्ड"!

और कौन से इंडियंस? सारे वे, जिनकी हत्याओं की क़ानूनी जांच अभी जारी है. लेकिन फ़ैसला लिया जा चुका है. एक भी आरोप अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा है. लेकिन फ़ैसले बाज़ार में हैं.

वास्तव में यह 'धार्मिक असहिष्णुता की राजनीति' नहीं बढ़ रही है, बल्कि 'राजनीतिक असहिष्णुता का धर्म' बढ़ रहा है. दादरी घटना पर, जिसके कम से कम चार भिन्न पहलू मीडिया में, राष्ट्रीय, लेकिन हिन्दी, अख़बारों में आ चुके हैं, दिल्ली की केजरीवाल सरकार का रेडियो विज्ञापन देखिए.

यह विज्ञापन राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए या विज्ञापनों के लिए आबंटित अरबों रुपयों को जल्द से जल्द ख़र्च कर डालने के लिए दिया गया, इसका फ़ैसला करना आसान नहीं है.

आप इसे सिर्फ़ अकारण माफ़ कर सकते हैं.

केजरीवाल का उल्लेख महत्वपूर्ण है. केजरीवाल दादरी गए थे और फिर उन्होंने मांग की थी कि इस पर मोदी कुछ क्यों नहीं बोलते. यह बेहद संगीन मामला है.

'मोदी को भटकाने की कोशिश'

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अगर देश में कोई अपरिपक्व सरकार हो तो देश के अंदर से ही पनपती ऐसी अराजकता देश का गंभीर नुक़सान चंद महीनों में कर सकती है. 'कुछ बोलें' का अर्थ यह कि वह कुछ बोलें, जो हम कहलवाना चाहते हैं.

दूसरा यह कि हमारी ही तरह देश के प्रधानमंत्री भी जांच का, प्रणाली का, अदालत का तिरस्कार करें और फ़ैसला सुना दें. तीसरा यह कि गृहमंत्री का, वित्त मंत्री का बोलना कोई मायने नहीं रखता- यह संदेश देश में जाए.

चौथा यह कि प्रधानमंत्री उन विषयों की, उस एजेंडा की चिंता करें, जो देश की समग्र अराजकता चाहती है, वह अपने एजेंडा पर न चलें.

अगर अखिलेश यादव सरकार की तरह केन्द्र सरकार भी पुलिस, विधि, प्रणाली और अदालतों का अपमान, एक बार उकसावे में आकर ही सही, कर दे, तो आप इस व्यवस्था को कितने समय तक अक्षुण्ण देख सकेंगे?

ऐसी अराजकता हर नाज़ुक मौक़े पर पेश आई है. 26 जनवरी के ऐन पहले इंडिया गेट पर धरना, दिल्ली चुनाव के ऐन पहले चर्च पर हमले का हल्ला (हाँ, क्या निकला उसमें?), संसद सत्र के पहले ललित मोदी का हल्ला, राजस्थान-मध्यप्रदेश में स्थानीय निकाय चुनावों के पहले व्यापमं का हल्ला.

और अब जब बिहार में वोट बैंक राजनीति को औवेसी की ख़तरनाक, लेकिन क़ानूनन जायज़ चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, तो फिर एक बार साम्प्रदायिक नज़रिए का हल्ला.

सारी बातें अपने स्थान पर हैं, लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि हर अच्छी-बुरी घटना को साम्प्रदायिक नज़रिए से देखने की प्रवृत्ति तेज़ हो गई है. इसे वैचारिक विमर्श का हिस्सा माना जा सकता, तो अच्छा होता.

वैचारिक लड़ाई या कुछ और

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अफ़सोस कि बात है कि ऐसी भी नहीं है. जिन बुद्धिजीवियों के नाम पर इसे वैचारिक लड़ाई जताया जा रहा है, उनके नामों पर ग़ौर करें, तो दूसरा ही नज़ारा सामने आता है.

एक विद्वान नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति थे, एक अन्य विद्वान भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष थे, एक अन्य विद्वान ललित कला अकादमी के अध्यक्ष थे, एक अन्य सज्जन, जो एक सम्प्रदाय के नेता के रूप में ज़्यादा जाने जाते हैं, और विद्वान होने का दावा शायद उन्होंने भी कभी नहीं किया, सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य थे, एक अन्य विदुषी, जो रानाघाट कांड की तरह की 'वैचारिक लड़ाई' 'काफ़ी पहले से' लड़ती आ रही हैं और अब घपलों के आरोपों में ज़मानतों का प्रयास कर रही हैं, 2007 में पद्मश्री से विभूषित की गईं थीं.

और भी हैं, होंगे और हो सकते हैं.

इन विद्वानों की यह पीड़ा समझी जानी चाहिए कि एक तो उन्हें अब सरकारी प्रश्रय उपलब्ध नहीं रहा है और दूसरे यह कि सरकार उस मार्क्सवादी विश्व दृष्टि से बाहर झांक रही है, जिसे उन्होंने इतनी मेहनत से गढ़ा था.

नारा उदारवाद का, लेकिन सहिष्णुता जनता का बहुमत फ़ैसला स्वीकारने की भी नहीं.

लेकिन इस निजी पीड़ा के लिए देश का क़ानून अपने हाथ में नहीं लिया जाना चाहिए.

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