महाराष्ट्रः चुनाव न होता तो विरोध भी न होता

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भाजपा के पूर्व नेता सुधींद्र कुलकर्णी के चेहरे शिव सैनिकों द्वारा कालिख पोते जाने के बाद दोनों पार्टियों के बीच महाराष्ट्र में तनाव आ गया है.

लेकिन क्या इस घटना से राज्य में भाजपा और शिवसेना के गठबंधन की उलटी गिनती शुरू हो गई है.

वरिष्ठ पत्रकार कुमार केतकर ऐसा नहीं मानते हैं. उनके मुताबिक यह घटना ये दिखाती है कि मराठी हितों का झंडाबरदार कौन सबसे अधिक है.

शिवसेना द्वारा की गई इस कार्रवाई का मतलब ये है कि वो भाजपा से अधिक लोगों के साथ हैं और मराठी लोगों और उनके हितों के प्रति अधिक आवाज़ उठा सकते हैं.

पढ़ें कुमार केतकर का विश्लेषण

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ये दोनों पार्टियों के बीच की आंतरिक प्रतिस्पर्द्धा है. वैसे भी राज्य में दोनों पार्टियों के बीच कोई राजनीतिक गठबंधन नहीं है, न कोई वैचारिक और सांगठनिक गठबंधन है. इनके बीच सिर्फ सत्ता का गठबंधन है.

दोनों ही पार्टियां सत्ता में बने रहने के लिए जितना ज़रूरी है उतना करती हैं.

साल 2017 में मुंबई म्युनिसिल कार्पोरेशन का चुनाव होने वाला है और तब तय होगा कि दोनों में किसकी बढ़त है.

जब क़रीब 50 साल पहले शिवसेना का गठन हुआ था तब मुंबई में 45 प्रतिशत मराठी लोगों की आबादी थी. लेकिन इतने लंबे समय में आबादी में काफी बदलाव आ चुका है. अब वो उनकी आबादी 33 प्रतिशत से भी कम हो चुकी है.

अब यहां उत्तर भारतीय हैं, पंजाबी हैं, गुजराती हैं.

इसीलिए भाजपा को लगता है कि वो गैर मराठी इलाक़ों में वोट हासिल कर सकती है और मराठी वोटों पर जीती जाने वाली सीटों को एक हद तक सीमित कर सकती है और शिव सेना को भी वहीं तक सीमित कर सकती है.

यानी भाजपा जब सत्ता में आएगी तो ज़रूरत होगी तो उन्हें ले लेगी और ज़रूरत न होने पर नहीं भी ले सकती है.

अगले महीने है चुनाव

इससे पहले शिवसेना ने गुलाम अली के कार्यक्रम का भी विरोध किया था और अंततः वो रद्द हो गया.

लेकिन अगर गुलाम अली पर विवाद नहीं भी होता तो कोई दूसरा विवाद खड़ा होता.

सबसे बड़ी बात ये है कि गुलाम अली विवाद के महज दस दिन पहले ही पाकिस्तान के एक गायक के कार्यक्रम में आदित्य ठाकरे मुख्य अतिथि थे.

अभी तक शिवसेना ने इस बारे में कोई सफाई नहीं दी कि आदित्य ठाकरे वहां कैसे मौजूद थे?

इसका मतलब है कि मुंबई के उत्तरी इलाके कल्याण डोंबीवली नगर निगम का अगले महीने होने वाले चुनाव में शिवसेना खुद को मराठी मानुष के हितों की झंडाबरदार के रूप में पेश करना चाह रही है.

अगर ये चुनाव नहीं होता तो गुलाम अली का विरोध भी नहीं होता.

(वरिष्ठ पत्रकार कुमार केतकर से बीबीसी संवाददाता सुशीला सिंह की बातचीत के आधार पर.)

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