कोर्ट तय करेगा अजन्मे शिशु का भविष्य

इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच के दो जजों के सामने एक अजन्मे बच्चे का भविष्य तय करने का मामला सामने आया है. इस पर वो जल्द फ़ैसला सुनाने वाले हैं. लेकिन उनकी दुविधा अब भी बनी हुई है.

मामला है लखनऊ के नज़दीक बाराबंकी शहर के मसौली गाँव में एक 13 साल की लड़की और उसके गाँव के एक नाबालिग़ लड़के का. दोनों ग़रीब परिवार के हैं. कुछ महीने पहले लड़की एक मेले में गई जहाँ उसके साथ इस नाबालिग़ लड़के ने कथित रूप से बलात्कार किया.

लड़की ने डर और शर्म के मारे परिवार को इस घटना के बारे में कुछ नहीं बताया. लेकिन जल्द ही उसने पेट में दर्द की शिकायत करनी शुरू कर दी. लड़की के वकील मोहसिन इक़बाल के मुताबिक़ परिवार ने समझा कहीं पेट का कोई रोग तो नहीं हो गया. उसे जब अस्पताल ले जाया गया तो पता चला कि वो 21 हफ़्ते से गर्भवती है.

ग़ैरक़ानूनी गर्भपात

मामला पुलिस तक पहुंचा. लड़की के बयान के बाद गाँव के एक 17 साल के लड़के को बलात्कार के आरोप में गिरफ़्तार किया गया. लड़की के पिता ने अदालत से अपील की कि उनकी बेटी को गर्भपात की इजाज़त दी जाए. हालांकि नियमों के मुताबिक़ 20 हफ़्ते के बाद गर्भपात ग़ैरक़ानूनी है.

इमेज कॉपीरइट THINKSTOCK

अदालत ने तीन डॉक्टरों की एक टीम गठित की जिसने सलाह दी कि गर्भपात संभव नहीं है, ख़तरा माँ और बच्चे दोनों को है.

डॉक्टरों के इस फ़ैसले के बाद लड़की के परिवार ने अदालत से कहा कि उनकी बेटी केवल 13 बरस की है. अभी वो ख़ुद बच्ची है तो पैदा होने वाले बच्चे को कैसे संभालेगी?

मोहसिन इक़बाल ने कहा कि अदालत ने परिवार की इस अपील पर ग़ौर करने का फ़ैसला किया, जिसमें कहा गया था कि पैदा होने वाले बच्चे को किसी को गोद दे दिया जाए.

लखनऊ की अदलत के दोनों जज शबीहुल हसनैन और देवेंदर कुमार उपाध्याय के सामने दुविधाएं कई हैं. पैदा होने वाले बच्चे के अधिकार क्या होंगे? उस बच्चे की क्या ग़लती? क्या उसे माता-पिता के नामों से जोड़ना उचित होगा?

हालांकि फ़ैसला अभी नहीं आया है. लेकिन इस मामले में वकील भी एकमत नहीं हैं.

आमराय नहीं

इमेज कॉपीरइट Other

मोहसिन इक़बाल कहते हैं कि परिवार ने डीएनए टेस्ट कराने से मना किया है. इस टेस्ट से बच्चे के पिता का पता चलेगा.

इक़बाल कहते हैं, "अगर बच्चे के पिता का पता चलते ही, उसके पिता की पहचान हो जाएगी जिससे उसे बच्चे के पिता की संपत्ति समेत सभी अधिकार देने पड़ेंगे. दूसरी तरफ़ लड़की के परिवार ने साफ़ कह दिया है कि वो अपनी बेटी को उसी समय घर पर रखेंगे जब बच्चे को गोद दे दिया जाए". इसलिए लड़की का परिवार चाहता है कि ये टेस्ट न हो.

दूसरी तरफ़ अगर डीएनए टेस्ट न हुआ तो होने वाले बच्चे के पिता की पहचान नहीं हो सकेगी तो उस हाल में बलात्कार का जुर्म कैसे साबित किया जाएगा? इक़बाल के मुताबिक़ बलात्कार के कई पुख़्ता सबूत अदालत के सामने हैं.

वकील प्राची मिश्र कहती हैं कि जजों ने अगर बच्चे को उसकी पैदाइश के बाद अनाथ आश्रम भेज दिया तो भी उसके अधिकार कम नहीं होंगे, क्योंकि बच्चों के पैदा होते ही उनके अधिकार उन्हें क़ानूनी तौर पर मिलते हैं. प्राची कहती हैं कि नाबालिग़ अभियुक्त के ख़िलाफ़ जुर्म साबित होने के बाद ये ख़ुद साबित हो जाएगा कि वो उस बच्चे का पिता है. डीएनए की ज़रुरत ही नहीं पड़ेगी. और एक बार पिता की शिनाख़्त हो गई तो उसे अपने बच्चे को पूरे अधिकार देने होंगे.

बच्चे का अधिकार

प्राची मिश्र ने एक अहम पहलू की ओर इशारा करते हुए कहा कि बलात्कार के कारण पैदा होने वाले बच्चे को क़ानून की निगाह में नाजायज़ बच्चा नहीं कहेंगे. इस तरह के बच्चों के अभिभावक अदालत होती है. उनके अधिकारों की रक्षा करना उनका कर्तव्य है.

इमेज कॉपीरइट Reuters

फ़िलहाल लड़की का परिवार और उनके वकील मोहसिन इक़बाल को उम्मीद है कि अदालत बच्चे की पैदाइश के बाद उसे एडॉप्शन के लिए अनाथालय भेज देगी.

वकीलों के मुताबिक़ यह एक कठिन मुक़दमा है. लखनऊ बेंच में इस तरह का मामला पहले कभी नहीं आया. अब सबकी निगाहें जजों पर टिकी हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार