आख़िर वोट क्यों नहीं देते लोग?

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बेगूसराय के 26 साल के कन्हैया इन दिनों पटना में रहकर मज़दूरी करते हैं. वो वोट नहीं देते हैं.

कन्हैया बेगूसराय के मंझौल गांव के हैं जहां वो पटना से चार घंटे में पहुंच सकते हैं. लेकिन कन्हैया वोट देने गांव नहीं जाते.

वोट क्यों नहीं देते? इस सवाल पर वो कहते हैं, ''काहे दें वोट. पैसा बरबाद करें जाने-आने में, वोट देने जाएं तो एक दिन की मज़दूरी जाएगी. कोई हमारे सुख दुख का भागी है क्या, जो हम वोट देकर उनको कुर्सी दिलाएं. जीतने के बाद वो गाड़ी में घूमेंगे और हम यूं ही भूखे मरते रहेंगे.''

आख़िर लोग वोट क्यों नहीं देते, इस सवाल ने चुनाव आयोग को 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद बहुत परेशान किया.

आयोग ने 2010 के विधानसभा चुनाव से पहले पटना के अनुग्रह नारायण संस्थान की मदद से कम मतदान की वजह जानने के लिए एक सर्वेक्षण कराया था.

पलायन का दंश

साल 2009 के लोकसभा चुनाव में बिहार में केवल 44.46 फ़ीसद मतदान हुआ था. इससे पहले अक्तूबर 2005 के विधानसभा चुनाव में केवल 45.85 फ़ीसद मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था.

सर्वेक्षण के मुताबिक़, 25 फ़ीसद लोग मतदान के समय अपने गांव या शहर में मौजूद नहीं रहते.

वहीं 29 फ़ीसद लोगों का मानना था कि वोट देने का कोई फायदा नहीं होता. वहीं यह भी पता चला कि वोटिंग के लिए लंबी कतार, बूथ पर पीने के पानी की कमी, रैम्प आदि न होने की वजह से भी लोग मतदान के लिए नहीं जाते.

हालांकि वोटर कार्ड बनवाने की बड़ी वजह दूसरी सरकारी सुविधाओं में उसके इस्तेमाल से जुड़ा है.

आयोग को सुझाव

सर्वेक्षण में मिले आंकड़ों के आधार पर अनुग्रह नारायण संस्थान ने चुनाव आयोग को त्योहारों के आसपास मतदान करवाने, बूथ पर एक महिला सहायिका की नियुक्ति, रोशनी की उचित व्यवस्था और वोटरों के बीच जागरूकता कार्यक्रम ज़ोरशोर से चलाने का सुझाव दिया था.

इन सुझावों पर आयोग ने अमल किया. इसकी वजह से 2010 के विधानसभा चुनाव में मतदान का फ़ीसद बढ़कर 52.71 हो गया.

इसके बाद अनुग्रह नारायण संस्थान ने एक बार फिर सर्वेक्षण कराया.

इसके नतीजों से पता चला कि 21.4 फ़ीसद मतदाता वोटिंग के समय अपने गांव या शहर में नहीं थे. वहीं 1.3 फ़ीसद मतदाताओं ने कहा कि वोट करने जाते तो मज़दूरी चली जाती.

नेताओं से निराशा

सर्वेक्षण में शामिल 2.4 फ़ीसद लोग पार्टी या उम्मीदवार से निराश थे. वहीं 50.5 फ़ीसद मतदाताओं ने मतदान न करने की कोई वजह नहीं बताई.

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साफ़ है कि अभी भी तस्वीर बहुत अच्छी नहीं है.

वैशाली ज़िले के चकफत्ते निवासी और कपड़े धोने का काम करने वाली 40 साल की सुनीता भी वोट नहीं देने जातीं हैं.सुनीता के दो बच्चे हैं. उनकी बड़ी लड़की बीए की पढ़ाई कर रही है.

सुनीता कहती हैं, ''सरकार हमको कुछो देबो ना करेगी, तब हम वोट काहे करेंगे.''

दिलचस्प है कि वोट न देने वालों की कतार में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले लोग भी शामिल हैं.

नेताओं पर सवाल

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जया 25 साल की हैं. वो अनुग्रह नारायण संस्थान में ही रिसर्चर हैं. वो बिना किसी झिझक के बताती हैं कि वो वोट नहीं करतीं.

वो कहती हैं, ''मैं मतदान ज़रूर करूंगी, लेकिन तभी जब अपनी बात पर क़ायम रहने वाला नेता मुझे मिल जाए. ये नेता जब अपनी बात पर ही क़ायम नहीं रहते हैं, तो हम उन्हें वोट किस बात पर दें.''

जया का सवाल हमारे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए बेहद अहम है. लेकिन इसका जवाब कौन देगा?

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