बेहतर ज़िंदगी की तलाश में भारत आए पाकिस्तानी हिन्दू

पाकिस्तानी हिंदू

माला दास मुश्किल से केवल अपना नाम भर लिख सकती हैं. लेकिन 16 साल की हो चुकी माला के जीवन की यह अबतक की सबसे बड़ी उपलब्धि है.

वो जोशीले अंदाज़ में कहती हैं, "मैं यहाँ जब आई उस समय बिलकुल अनपढ़ थी. आज मैं अपना नाम लिख सकती हूँ."

वो कहती हैं कि गिनती गिनने और नंबरों की पहचान में अब भी गड़बड़ हो जाती है. जब मैंने उनसे पूछा दिल्ली कौन से साल में आई थीं, तो वो इसका जवाब न दे सकीं.

मोदी से हिंदू शरणार्थियों को फ़ायदा नहीं

माला 2011 में अपने परिवार और पड़ोसियों के साथ पाकिस्तान के हैदराबाद से दिल्ली आई थीं.

अब ये लोग दिल्ली के जहांगीरपुर इलाक़े में एक खुले मैदान में झोपड़पट्टियों में रहते हैं. उन्होंने बताया कि पाकिस्तान छोड़ने के कारण कई थे, इनमें हिन्दू होने की वजह से होने वाला भेदभाव प्रमुख था.

वो सुरक्षा के अभाव में अपनी जवान बेटियों को स्कूल नहीं भेज सकते थे.

पढ़ें विस्तार से

दिल्ली के इस कैंप में 250 पाकिस्तानी हिन्दुओं ने पनाह ले रखी है. इनमें से 71 लोग तीन हफ़्ते पहले ही भारत आए हैं.

इनमें से एक 13 साल की राजवंती भी है. वो कभी स्कूल नहीं गईं. वो कहती हैं, "यहाँ सभी पढ़े-लिखे हैं. मुझे यहाँ अनपढ़ और गंवार कहा जाता है. मैं भी स्कूल जाना चाहती हूँ."

वीडियो देखें : पाकिस्तानी हिन्दुओं की उम्मीद

राजवंती अनपढ़ ज़रूर हैं, लेकिन तेज़-तर्रार और चतुर हैं. उसकी तमन्ना है हिन्दू धर्म के बारे में हर तरह की जानकारी हासिल करने की है.

पाकिस्तान से आए हिन्दुओं का कहना है वो अपने धर्म के बारे में बहुत अधिक नहीं जानते हैं.

पढ़ाई की कमी पाकिस्तान से दिल्ली आए हिन्दू बच्चों की एक बड़ी समस्या नज़र आती है.

इन शरणार्थी हिन्दुओं की कच्ची बस्ती में एक स्कूल ज़रूर है, लेकिन उसमें केवल बुनियादी स्तर की पढ़ाई होती है.

कड़वी यादें

भगवान दास भी तीन हफ़्ते पहले ही दिल्ली आए हैं. वो पाकिस्तान में एक ग़रीब किसान थे.

उनके दो बच्चे भी अनपढ़ हैं. उनका कहना था, "बच्चों को स्कूल न भेजने का कारण ये था कि वहां हिन्दू बच्चों का मज़ाक उड़ाया जाता है. हमारे ऊपर ताने कसे जाते हैं और हमारी लड़कियां सुरक्षित नहीं हैं."

राजवंती कहती हैं वो स्कूल इसलिए नहीं गईं कि वहां हिन्दू बच्चों को 'कलमा' पढ़ाया जाता है.

माला दास को दिल्ली आने के बाद ये देख कर ताज्जुब हुआ कि यहाँ के हिन्दू कितनी आज़ादी से पूजा करते हैं.

वो कहती हैं, "भारत के हिन्दू खुले तौर पर अपने धर्म का पालन करते हैं. पाकिस्तान में हम छुप कर करते थे. मंदिर जाते तो पड़ोसियों की निगाहों से बच कर जाते थे."

धार्मिक आज़ादी

ईश्वरलाल पांच महीने दिल्ली आए हैं. वो 18 साल के हैं लेकिन अब तक स्कूल की शक्ल नहीं देखी है, लेकिन वो यहाँ आकर ख़ुश हैं. वो कहते हैं, "यहाँ धर्म की आज़ादी है. यहाँ के मुस्लिम पाकिस्तान के मुसलमानों से कहीं बेहतर हैं. यहाँ मैं आज़ाद माहौल में सांस लेता हूँ."

ईश्वर अब कमाने लगे हैं, लेकिन उन्हें इस बात का दुख है कि वो पढ़-लिख नहीं सके.

उम्मीद और शिकायतें

भारत में पनाह लेने वाले पाकिस्तानी हिन्दुओं की संख्या का कोई सरकारी आंकड़ा नहीं है. लेकिन पिछले पांच सालों में पाकिस्तान हिन्दुओं का भारत आने का सिलसिला लगातार जारी है.

दिल्ली में इनके तीन कैंप हैं. अर्जुन सिंह इनके लीडर हैं. वो कहते हैं दिल्ली में एक हज़ार से 12 सौ तक पाकिस्तानी हिन्दू शरण लिए हुए हैं.

हरियाणा और राजस्थान में भी पाकिस्तानी हिन्दू आबाद हैं. उन्होंने भारत की नागरिकता लेने के लिए आवेदन कर रखा है.

भारत सरकार के मुताबिक़ 2011 से इस साल सितंबर तक 1403 पाकिस्तानियों को नागरिकता दी गई है, जिनमें से क़रीब सभी हिन्दू हैं.

सरकार से नाराज़गी

अर्जुन दास भारत सरकार से मायूस हैं. वो कहते हैं कि बीजेपी पाकिस्तानी हिन्दुओं से सहानुभूति ज़रूर दिखाती है. लेकिन सब पार्टियां एक जैसी हैं. कोई अलग नहीं है.

वहीं पहलाज कहते हैं सरकार तो छोड़िए उनके ख़ेमे में अब तक कोई स्थानीय हिन्दू भी नहीं आया है, किसी ने हमारा स्वागत नहीं किया. इसका बहुत अफ़सोस है.

पाकिस्तान के अधिकतर हिन्दू सिंध प्रांत में आबाद हैं. भगवान दास के मुताबिक़ जो भारत आए हैं वो मुठ्ठी भर हैं. वो कहते हैं, "पाकिस्तान के लाखों हिन्दू भारत आने के लिए बेक़रार हैं."

पाकिस्तान से आए क़रीब सभी हिन्दुओं ने कहा कि भारत ही उनका असल देश है, क्योंकि ये हिन्दुओं का देश है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार