'सही कर रहे हैं लेखक, विरोध का यही तरीक़ा है'

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प्रतिष्ठित कन्नड़ लेखक केएस भगवान का कहना है कि साहित्य अकादमी के ख़िलाफ़ लेखकों का विरोध 'प्रशंसनीय' है और अभिव्यक्ति की आज़ादी और भारत में लोकतंत्र को बचाने के हित में है.

केएस भगवान हाल के समय में उन चंद पहले साहित्यकारों में से थे जिन्होंने अभिव्यक्ति की आज़ादी पर ख़तरे की ओर तब इशारा किया था जब डॉक्टर एमएम कलबुर्गी की हत्या के बाद उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलने लगी थीं.

कुछ दक्षिणपंथी संगठनों के कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर उन्हें धमकी दी थी कि अगला नंबर उनका होगा.

'लोकतंत्र पर असर पड़ेगा'

कर्नाटक के कई इलाक़ों में केएस भगवान के ख़िलाफ़ हिंदू समुदाय की 'भावनाओं को आहत करने' के लिए कई मुक़दमे दर्ज करवाए गए हैं.

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उन पर 'भावनाओं को आहत करने' के नाम पर हमले फ़रवरी में मैसूर विश्वविद्यालय में एक बैठक को संबोधित करने के बाद से हो रहे हैं.

केएस भगवान के आलोचक कहते हैं कि उनके विचार हिंदुओं की मान्यताओं पर हमला हैं.

उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "मुझे नहीं पता कितने हैं. लोग कहते हैं कि 32 या 42 मामले दर्ज हैं लेकिन मुझे पुलिस से कोई सूचना नहीं मिली है."

वो कहते हैं कि लेखकों ने अपना विरोध जताने के लिए जो 'रास्ता' चुना है वह सही रास्ता है.

उन्होंने कहा, "लेखकों का सरकार से कोई सीधा संपर्क नहीं है. सिर्फ़ साहित्य अकादमी ही उनकी भावनाएं सरकार तक पहुंचा सकती है."

वह आगे कहते हैं, "यह विरोध इसलिए है क्योंकि अभिव्यक्ति की आज़ादी किसी सभ्य समाज की, किसी लोकतंत्र की धड़कन है. अगर इसे दबाया जाएगा तो लोकतंत्र पर असर पड़ेगा, संस्कृति पर असर पड़ेगा और स्वस्थ समाज नहीं बचेगा."

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वो यह नहीं मानते कि जब एमएफ़ हुसैन पर हमले हुए और उनके आलोचकों ने उन्हें देश से बाहर भेज दिया तो लेखक चुप रहे थे.

'पर्याप्त नहीं बोले पीएम'

अगर किसी को नाराज़ करने का अधिकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में शामिल है तो किस हद तक एक लेखक या शोधकर्ता किसी को नाराज़ कर सकता है?

केएस भगवान कहते हैं, "उन्हें क्या अधिकार है कि वो यह कहकर हमारा अपमान करें कि शूद्र ब्राह्मण का गुलाम है. क्या हम ऐसे बयानों से नाराज़ नहीं होंगे?"

"वे कहते हैं कि अगर एक ग़ैर ब्राह्मण वेद पढ़े तो उसकी जीभ काट ली जाए. क्या इससे हमारा अपमान नहीं होता. मैंने सिर्फ़ यह बताया है कि इस व्यवस्था में क्या अमानवीय है."

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केएस भगवान इसलिए भी नाराज़ हैं क्योंकि उनके मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'बहुत हल्के ढंग से (दादरी मुद्दे पर) बात की जो पर्याप्त नहीं है.'

"पूरा माहौल ज़हरीला कर दिया गया था और प्रधानमंत्री होने के नाते उनका यह कर्तव्य था कि इसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करते. ठीक है कि यह राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है. उन्हें राज्य के मुख्यमंत्री को निर्देश देना चाहिए था कि वह दोषी को सज़ा दें. यह नहीं किया गया."

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