ज़करबर्ग से मोदी का मिलना कितना सही था?

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नरेंद्र मोदी की अमरीका यात्रा के दौरान मार्क ज़करबर्ग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मिलने के पल को ऐसा माना जा रहा था मानो इसने दुनिया को हिला कर रख दिया हो.

सोशल मीडिया पर दुनिया के सबसे प्रभावशाली राजनेताओं में से एक माने जाने वाले भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने थोड़ा अचकचाए से मार्क ज़करबर्ग को गले लगाया था.

लेकिन मेनलो पार्क में जो कुछ हुआ वो असल में क्या था? कुछ लोग क्यों सोच रहे हैं कि ज़करबर्ग को गले लगाते हुए मोदी भारत के डिजिटल हितों की अनदेखी कर रहे थे?

भारत में 35.4 करोड़ आबादी इंटरनेट इस्तेमाल करती है, जिसकी वृद्धि दर इस साल की पहली छमाही में 17 फीसदी थी.

फ़ेसबुक ही नहीं बल्कि सिलिकॉन वैली की अन्य विशालकाय कंपनियों के लिए यह आबादी स्वाभाविक लक्ष्य है.

नेट न्यूट्रेलिटी पर आयशा पेरेरा-

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इन सभी कंपनियों के लिए ‘डिजिटल इंडिया’ का समर्थन करने से बढ़ कर कोई और खुशी नहीं हो सकती.

देश के डिजिटल बुनियादी ढांचे को मज़बूत करने के मकसद से भारत सरकार ने क़रीब 18 अरब डॉलर की ‘डिजिटल इंडिया’ प्रोजेक्ट की पहल की है.

गूगल ने 500 रेलवे स्टेशनों को फ़्री वाइफ़ाई से लैस करने और माइक्रोसॉफ़्ट ने पांच लाख भारतीय गांवों तक सस्ती इंटनेट सेवा पहुंचाने की घोषणा की है.

लेकिन इस भारी समर्थन और भारत में बढ़ती दिलचस्पी ने देश के अंदर चिंता बढ़ा दी है.

सोसायटी फ़ॉर नॉलेज कामन्स के चेयरमैन प्रबीर पुरकायस्थ ने बीबीसी को बताया, “क्या डिजिटल इंडिया भारत को ग्लोबल टेक कंपनियों की सेवाओं का केवल उपभोक्ता बनाने जा रहा है. निजी डाटा डिजिटल दुनिया में बहुत अहम. क्या हम इसे केवल फ़ेसबुक और गूगल के लिए विशालकाय मार्केट बनने के लिए सौंप देंगे.”

डिजिटल उपनिवेश

वो कहते हैं, “क्या हम फ़ेसबुक या गूगल का सिर्फ़ एक विशाल बाज़ार बनने के लिए झुकने जा रहे हैं? तकनीक की दुनिया में जिस तरह तिकड़म की जा रही है, उसे देखें. केवल चीन ही ऐसी कंपनियों के साथ उभरा है जो इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मुक़ाबला कर सकती हैं.”

उनके मुताबिक़, “अंग्रेज़ों ने दुनिया पर राज किया क्योंकि समंदरों पर उनका नियंत्रण था. क्या भारत महज डिजिटल उपभोक्ता बनने जा रहा है? एक बार फिर उपनिवेश बनने के लिए?”

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ख़ासकर फ़ेसबुक टाउनहाल की घटना के बाद, इस बारे में चर्चा शुरू हो गई है कि भारत को लेकर ज़करबर्ग की असल मंशा क्या है.

टाउनहॉल के कार्यक्रम के साथ ही मोदी और ज़करबर्ग ने एक ख़ास फ़ेसबुक फ़िल्टर के माध्यम से अपने प्रोफ़ाइल पिक्चर को भारतीय तिरंगे झंडे के रंग में अपडेट कर डिजिटल इंडिया के समर्थन की घोषणा की.

इसके बाद ‘डिजिटल इंडिया’ के समर्थन में भारतीयों के एक विशाल तबके ने अपनी टाइम लाइन पर प्रोफ़ाइल पिक्चर को तिरंगे के रंग में रंग डाला.

‘मासूम ग़लती’

लेकिन इसके तुरंत बाद एक तकनीकी वेबसाइट ने फ़ेसबुक सोर्स कोड का एक हिस्सा जारी कर दिया, जो ऐसा साबित करता नज़र आया कि ‘सपोर्ट डिजिटल इंडिया’ फ़िल्टर, असल में ‘सपोर्ट इंटरनेट डॉट ऑर्ग’ फ़िल्टर है.

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हालांकि फ़ेसबुक ने तेज़ी से इसका खंडन जारी किया और कहा कि तकनीकी ग़लती से उन शब्दों को शामिल कर लिया गया जिसे वो कोड के एक हिस्से के लिए संक्षिप्त नाम के रूप में इस्तेमाल करते थे.

लेकिन इस ‘ग़लती’ के साथ ही टेलीविज़न चैनलों और अख़बारों में इंटरनेट डॉट ऑर्ग के विज्ञापनों की बमबारी ने फ़ेसबुक की मंशा पर संदेह को और बढ़ा दिया.

भारतीय यूज़र्स के टाइम लाइन पर इंटरनेट डॉट ऑर्ग के लगातार आने वाले एक फ़ेसबुक पोल में 'नकारने का विकल्प' न दिए जाने की भी आलोचना हो रही है.

सर्वे में यूज़र्स से सवाल पूछा जा रहा है कि, क्या आप चाहते हैं कि भारत में बुनियादी सेवाएं निःशुल्क हों?

और इसके जवाब में ‘हां’ और ‘अभी नहीं’ के दो विकल्पों के अलावा तीसरा विकल्प नहीं है.

फ्री बेसिक्स यानी निःशुल्क बुनियादी सुविधाएं कहे जा रहे इंटरनेट डॉट ऑर्ग का लक्ष्य विकासशील दुनिया में इंटरनेट सुविधाओं का विस्तार करना है.

इसके तहत कुछ ख़ास ऐप और वेबसाइटों को उपभोक्ताओं के लिए मुफ़्त करने की पेशकश की जा रही है.

फ़ेसबुक के इन्फ़्रास्ट्रक्चर इंजीनियरिंग के वाइस प्रेसिडेंट जे पारिख इस पहल को वहन करने, बुनियादी ढांचे और पहुंच में आने वाली समस्या को हल करने और दुनिया की उस ‘दो तिहाई आबादी को जोड़ने की कोशिश’ का दावा करते हैं, जिसके पास इंटरनेट की पहुंच नहीं है.

पिछली फ़रवरी में जब फ़ेसबुक ने भारत में अपनी इस पहल को लांच किया था तो भारत के सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर विरोध शुरू हो गया था.

इनका कहना था कि यह कार्यक्रम अभिव्यक्ति की आज़ादी, निजता और नेट न्यूट्रैलिटी के सिद्धांत के लिए ख़तरा है.

लेकिन दूसरी तरफ़, भारतीय स्तम्भकार मनु जोसफ़ ने हिंदुस्तान टाइम्स में लिखे अपने लेख में नेट न्यूट्रैलिटी को लेकर ‘खुदगर्जी’ भरे रवैये की आलोचना की है.

वो लिखते हैं कि इस मुद्दे (नेट न्यूट्रेलिटी) पर जो चिंताएं हैं, उनसे पहले ग़रीबों को कुछ हद तक इंटरनेट उपलब्ध कराने के बारे में चिंता होनी चाहिए.

ग़लत संकेत

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भारत में नेट न्यूट्रैलिटी को ख़तरे में डालने वाली पहल के ख़िलाफ़ भारतीयों को आवाज़ बुलंद करने के लिए जो बड़े पैमाने पर अभियान चल रहा है उसने जनता में भी हलचल बढ़ी है.

यही वजह है कि देश में निष्पक्ष इंटरनेट की मांग को लेकर टेलीकॉम रेग्युलेटरी अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (ट्राई) को दस लाख से ज़्यादा ईमेल मिल चुके हैं.

इसका तत्काल प्रभाव इंटरनेट डॉट ऑर्ग की पहल पर पड़ा है.

ट्राई ने नेट न्यूट्रैलिटी पर एक प्रस्तावित नीति जारी की है लेकिन एक सवाल अभी भी पूछा जा रहा है. वो ये कि इस समय जब इस मुद्दे पर विचार विमर्श चल ही रहा है तो ऐसे में मोदी का फ़ेसबुक मुख्यालय का दौरा किया जाना सही था?

पुरकायस्थ का मानना है कि इससे बचा जा सकता था.

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वो कहते हैं, “वहां जाने के लिए यह सही समय नहीं था. अगर यह केवल पब्लिसिटी पाने के लिए था, तब भी नीति बनाने में शामिल अधिकारियों के लिए एक संकेत देता है.”

हालांकि सेंटर फ़ॉर इंटरनेट एंड सोसायटी से जुड़े सनी अब्राहम ने बीबीसी से बातचीत में कहा है कि फ़ेसबुक की मंशा संदेह के दायरे में है.

वो कहते हैं, “भारत फ़ेसबुक के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण बाज़ार है और प्रधानमंत्री के पास इतनी ताक़त है कि वो इसकी नीतियों में सकारात्मक बदलाव के लिए दबाव डाल सकें.”

उनका कहना है कि इन ग्लोबल प्लेयर्स को भारतीय बाज़ार से बाहर रखने से कुछ भी नहीं हासिल होगा.

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