खाने को चावल नहीं तो शादी कैसे करूं?

तेलुगु में कल्लकल्लु का मतलब है- काला पत्थर. इस गांव का नाम चाहे जैसे पड़ा हो, पर यहां की सूखी ज़मीन पर नमी सिर्फ़ वहीं दिखती है जहां काला केमिकल बह रहा है.

संवेदना यात्रा के दौरान जब हम तूपरान मंडल के इस गांव में पहुँचे तो काफ़ी सरगर्मी थी. लोग चिल्ला-चिल्लाकर अपनी बात रखने को बेताब थे.

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असल में कल्लकल्लु और उसके साथ तीन और गांवों की क़रीब 300 एकड़ ज़मीन सरकार ने 2007 में स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन के लिए ली थी, जो कई कंपनियों को अलॉट की गई. कुछ ही किसानों को ज़मीनों का मुआवज़ा मिला.

वायदा ख़िलाफ़ी

वायदा फ़रामोशी की कहानियां यहां हर किसी की ज़ुबान पर हैं.

सबसे पहले यहां मैं किसान मिलाराम नरसिम्हुलु से मिला. जिनकी खेत में कभी 50 से ज़्यादा लोगों को रोज़गार मिलता था. अब ज़मीन नहीं है. उन्होंने एक कंपनी में नौकरी की थी जो अब बंद हो चुकी है.

वो बताते हैं, ‘‘जिनसे ज़मीन ली गई थी उन्हें कंपनी में नौकरी देने, ज़मीन देने वाले हर किसान को 5 लाख रुपए, 200 गज में घर बनाने और बोरवैल के लिए 50 हज़ार रुपए देने का वादा हुआ था. अभी तक सिर्फ़ दो कंपनियों की फ़ैक्ट्री बनी हैं, बाक़ी बैंकों से लोन लेकर, गेट लगाकर और ताले डालकर चले गए हैं. किसी गांव वाले को नौकरी नहीं दी गई.’’

चावल नहीं तो शादी नहीं!

क़रीब चार हज़ार वोटरों वाले इस गांव के ज़्यादातर नौजवान बेरोज़गार हैं, जिनमें कई गांव छोड़ रहे हैं.

जब मैंने नरसिम्हुलु की निजी ज़िंदगी की बात छेड़ी तो वो फट पड़े.

कहने लगे कि पहले वह ज़मीन से पैदा करके चावल खाते थे, अब राशन की दुकान से खरीदकर खाते हैं.

‘‘मेरी बेटी शादी लायक हो गई है, खाने को चावल नहीं है तो शादी कैसे करूंगा. सोचें तो नींद नहीं आ रही है. मैं एक कंपनी में काम करता था वो बंद हो गई. मैं सड़क पर आ गया हूं. मेरे जैसे और लोग हैं.’’

पास खड़े हनुमंत राव ने मुझसे साफ़ कहा कि वह ख़ुदकुशी करना चाहते हैं.

मेरे ‘क्यों’ पर उनका जवाब ऐसा था जिसे आप झुठला नहीं सकते– ‘‘तीन एकड़ ज़मीन सेज़ में चली गई है. कुछ ज़मीन अब लीज़ (बँटाई) पर ली है, जिससे गुज़र-बसर हो रही है. इस ज़मीन पर भी मशरूम की फैक्ट्री है, जिससे निकला केमिकल का पानी खेती ख़राब कर रहा है. बोरवैल का पानी भी ख़राब हो गया है. इस साल सूखे के बाद फ़सल ही नहीं हो रही. अब मैंने भैंसों का काम (डेयरी) शुरू किया पर भैंसों के लिए चारा ही नहीं है. इसे देखकर मन करता है कि ख़ुदकुशी कर लूं.’’

मो. अज़ीमुद्दीन की कहानी भी अलग नहीं. उनकी दो एकड़ ज़मीन भी इंडस्ट्रियल पार्क के लिए ली गई थी.

पर उन्हें मुआवज़े के पांच लाख रुपए नहीं मिले क्योंकि उनके पास इस बात का सुबूत नहीं कि वही इसके मालिक थे.

अज़ीमुद्दीन पूछते हैं कि 40 साल से उनके बाप-दादे ज़मीन जोत रहे थे तो वह कैसे उसके मालिक नहीं हैं? उन्होंने बताया कि वह प्रशासन और मंत्रियों तक गए पर किसी ने नहीं सुनी. बचे हुए उनके तीन एकड़ पर लगा धान भी बर्बाद हो गया है.

वो बताते हैं, ‘‘बारिश न होने से हम मार खा गए. चारा न होने से जानवर बेच रहे हैं. फ़ैक्ट्रियों में बाहर के लोगों को काम पर ले रहे हैं. हमने पूछा तो कहा कि गांव वाले काम नहीं करते. बाहर वालों को ले लेते हैं. एक बेटा है मेरा. नौजवान खाली फिर रहे हैं. बीते साल की फ़सल से काम चला रहे हैं.’’

2009 में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने मेडक ज़िले में लागू सरकारी अधिग्रहण नीति पर नाराज़गी जताई थी और कहा था कि किसानों की ज़मीनें ली गईं पर कोई उद्योग नहीं लगाए गए.

तब कोर्ट ने कहा था, ‘‘ऐसे मामले कम नहीं जहां इंडस्ट्रियल पार्कों या स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन के लिए हज़ारों एकड़ ज़मीनें ली गईं और जिसमें पहला शिकार खेती बनी और जहां मुश्किल से ही कोई उद्योग लगाया गया.’’

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