'कोर्ट ने संवैधानिक व्यवस्था को नज़रअंदाज़ किया'

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केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि जजों की नियुक्ति संबंधी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में भारत की वृहद संवैधानिक व्यवस्था को नज़रंदाज़ किया गया है.

सुप्रीम कोर्ट ने इस महीने की 16 तारीख़ को सरकार की ओर से जजों की नियुक्ति के लिए बनाए गए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) को रद्द कर दिया था.

अदालत ने कहा था कि जजों की नियुक्ति पुराने तरीक़े- कॉलिजियम सिस्टम से ही होगी.

कांग्रेस ने संकेत दिए हैं कि न्यायिक फ़ैसले के बाद वो इस मसले को संसद में दोबारा लाए जाने के पक्ष में नहीं है.

केंद्रीय मंत्री की निजी राय

केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने फ़ेसबुक पर लिखी एक पोस्ट में ये विचार व्यक्त किए हैं. इस पोस्ट को उन्होंने अपनी निजी राय बताया है.

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केंद्रीय मंत्री ने कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता निसंदेह रूप से संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है और इसे बचाए रखने की ज़रूरत है.

उन्होंने आगे लिखा है- "लेकिन फ़ैसले में इस बात की अनदेखी की गई कि इसकी अन्य विशेषताएं भी हैं जिससे संविधान बनता है. भारतीय संविधान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है संसदीय लोकतंत्र. संविधान का एक और हिस्सा है चुनी हुई सरकार, जो संप्रभुता के संकल्प का प्रतिनिधित्व करती है."

उनके मुताबिक प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और क़ानून मंत्री भी संविधान के महत्वपूर्ण घटक हैं, वो केंद्रीय मंत्रिपरिषद का हिस्सा हैं जो संसद के प्रति ज़वाबदेह है.

भारतीय लोकतंत्र

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केंद्रीय वित्त मंत्री ने लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट की पीठ में बहुमत की चिंता न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर थी, जो समझ में आता है. वो ये भी कहते हैं- "संविधान की अन्य संरचनाओं को ख़ारिज करना या उन्हें केवल 'राजनीतिक नेता' कह कर, फ़ैसला इस आधार पर सुनाना कि भारतीय लोकतंत्र को इसके चुने हुए प्रतिनिधयों से बचाना चाहिए..."

जेटली के अनुसार यही इस न्यायिक फ़ैसले की मूल ग़लती है.

उन्होंने लिखा है कि फ़ैसले ने संसदीय लोकतंत्र, एक चुनी हुई सरकार, मंत्रिपरिषद, एक चुने हुए प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता जैसे संविधान के पांच बुनियादी घटकों के महत्व को कम किया है.

उनका कहना है कि यह वह मुख्य ग़लती है, जिसे बहुमत ने किया है.

उन्होंने कहा है कि भारतीय लोकतंत्र ग़ैर चुने हुए लोगों का निरंकुश तंत्र नहीं हो सकता है. अगर चुने हुए प्रतिनिधियों को कमज़ोर किया गया तो लोकतंत्र अपने आप ख़तरे में पड़ जाएगा.

उन्होंने कहा है कि अदालत केवल व्याख्या कर सकती है, वह किसी क़ानून को दोबारा लिखने के लिए विधायिका का तीसरा सदन नहीं बन सकती है.

महत्वपूर्ण है कि इस प्रतिक्रिया जताते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा, "जेटली जी, भारतीय लोकतंत्र ग़ैर चुने हुए लोगों को निरंकुश तंत्र नहीं हो सकता. हम भी तो दिल्ली में इसी की मांग कर रहे हैं."

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