'गो हत्या करने वाले का वध पाप नहीं'

पांचजन्य

दादरी में अख़लाक की हत्या और साहित्यकारों की ओर से पुरस्कार लौटाने पर 'पांचजन्य' के स्तभंकार तुफ़ैल चतुर्वेदी का कहना है कि दादरी की घटना 'क्रिया की प्रतिक्रया' है.

'पांचजन्य' को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुखपत्र माना जाता है. हालांकि आरएसएस इससे इनकार करता है.

तुफ़ैल ने बीबीसी से कहा, ''वेदों में साफ़-साफ़ लिखा है कि गो हत्या करने वाले पातकी का वध पाप नहीं है.''

'प्राचीन काल में हिन्दू गोमांस खाते थे'

उन्होंने बताया कि गो वध करने वालों को सजा देने के बारे में यजुर्वेद में 30.18 पर दिया गया है. वहीं अथर्ववेद में इसका जिक्र 10.1.27 और 8.3.24 पर इसका जिक्र है.

तुफ़ैल ने बताया कि उन्होंने ये सभी जानकारियां अपने फ़ेसबुक पेज पर भी दे रखी हैं.

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राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सटे दादरी के बिसाहड़ा गांव में गाय का मांस खाने के अफ़वाह में सितंबर के अंतिम हफ़्ते में अख़लाक नाम के एक व्यक्ति को उग्र भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला था.

अख़लाक के घर में फ्रिज में मिले मांस को गो मांस बताया जा रहा था. हालांकि बाद में फ़ारेंसिक रिपोर्ट में वो बकरे का गोश्त साबित हुआ.

भारत में गोहत्या कब, कैसे पाप बना

तुफ़ैल चतुर्वेदी इस रिपोर्ट को ग़लत ठहराते हुए कहते हैं, ''ये निश्चित रूप से ग़लत है और सरकारी काम है.''

उन्होंने 'पांचजन्य' के अपने में लेख में कहा है, ''मदरसे और भारत का मुस्लिम नेतृत्व भारत के मुसलमानों को अपनी हर परंपरा से नफ़रत कराना सिखाता है. इन्हीं करतूतों के फलस्वरूप शायद अख़लाक गाय की क़ुर्बानी कर बैठा.''

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हज़ारों साल पहले लिखे गए वेदों में लिखी बातें आज कितनी प्रासंगिक हैं? इस सवाल पर वो कहते हैं, ''यहां वैदिक क़ानून नहीं चलता, इस मायने में ये प्रासंगिक नहीं हैं. लेकिन वेद का क़ानून कभी नहीं चला है.''

उनके मुताबिक़, ''समाज में नियम-क़ायदे वेदों के मुताबिक़ नहीं बल्कि स्मृतियों के आधार पर चलते चले आए हैं.''

'पांचजन्य' के सम्पादकीय में दादरी कांड के विरोध में पुरस्कार लौटाने वाले साहित्यकारों को 'बुद्धि के स्वयंभू ठेकेदार' और 'सेकुलर ग्रंथि से पीड़ित' बताया गया है.

(तुफ़ैल चतुर्वेदी से बीबीसी संवाददाता विनीत खरे की बातचीत पर अाधारित)

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