सूखे वाले इलाक़े में करोड़ों लीटर का वाटर बैंक

अगर आप गूगल मैप में दो मील की ऊंचाई से शोलापुर और पंढरपुर के बीच झांकें तो कुरुल नामक जगह से कुछ आगे सड़क के किनारे अंकोली गांव के पास एक बेहद हरा-भरा हिस्सा नज़र आएगा.

नक़्शे को और बड़ा करेंगे तो यह हिस्सा साफ़ होने लगता है और आपको पेड़ों के घने जंगल के बराबर एक लगभग गोल तालाब दिखाई देता है.

'अकाल यात्रा' के दूसरे रिपोर्ताज यहां पढ़ें.

सूखा प्रभावित इलाक़े की इस धरती पर पांच करोड़ लीटर का यह जलाशय एक अकेले शख्स का कारनामा है.

स्वराज अभियान की ओर से आयोजित संवेदना यात्रा के साथ हम शोलापुर से होते हुए अंकोली गांव तक पहुँचे थे. महाराष्ट्र के दूसरे हिस्सों में सूखे से दरकती ज़मीन देखने के बाद वैज्ञानिक-किसान अरुण देशपांडे की इस हरी-भरी दुनिया को देखना काफ़ी सुकून भरा था.

अरुण पांडे इसे 'वर्चुअल कॉन्टेंट ऑफ़ वॉटर' कहते हैं और अपने इस प्रोजेक्ट को महात्मा गांधी इंजीनियरिंग का नाम देते हैं.

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1980 के दशक में अरुण अपने परिवार के साथ शहर छोड़ अपने पुश्तैनी गांव चले आए थे जहां उन्होंने महिलाओं के एक स्वयं सहायता समूह के ज़रिए पानी का बैंक बनाने की शुरुआत की.

वे मशहूर वैज्ञानिक श्रीपाद दाभोलकर के प्रयोग-परिवार से जुड़े जो प्रयोग करने वाले किसानों का एक समूह है. अरुण देशपांडे मानते हैं कि पानी के मामले में हम ग़रीब नहीं हैं.

वह कहते हैं, ''जो पानी हमारे पास आता है, वह हमारी ज़रूरत से तीन गुना ज़्यादा है. यह हम सिद्ध कर सकते हैं. यहां से पानी बाहर जा रहा है, शहरों की तरफ़ और विदेशों की ओर जाता है. एक लीटर दूध जब यहां से पैदा करने के लिए 10 हज़ार लीटर पानी लगता है जिसे वर्चुअल कॉन्टेंट ऑफ़ वॉटर कहते हैं इन प्रोडक्ट एंड सर्विस. उसी तरह कोयले की बिजली का एक यूनिट पैदा करने के लिए 4000 लीटर पानी लगता है. आप समझिए कि पांच यूनिट खर्च करने वाला शहरी कितना पानी पीता है.''

अरुण कहते हैं कि उन्होंने इतने पेड़ लगाए हैं कि उनकी ज़मीन स्पॉन्ज बन चुकी है और सारा पानी कुएं और टैंक में जाकर इकट्ठा होता है.

मैंने उनसे पूछा कि वह इस पानी का क्या करते हैं तो उनका कहना था कि वह पानी के सबसे बड़े निर्यातक बन चुके हैं.

वे कहते हैं, ''हम हर साल यहां चार करोड़ घन लीटर पानी बाज़ार में भेजते हैं. यह पानी सड़क के रास्ते, ट्रेन और हवाई जहाज़ से जाता है. मसलन एक अंडा यहां 600 लीटर पानी से बनता है, वह जाता है तो वहां से एक रुपया मिलता है लेकिन उसके लिए हमें एक हज़ार लीटर पानी ख़र्च करना पड़ता है. हम यहां गन्ना उगाते हैं. यहां से एक किलो चीनी जाती है यानी 4000 लीटर पानी चला जाता है.''

देशपांडे का कहना था, ''गन्ने का किसान पानी नहीं पीता. उसका वाटर फ़ुटप्रिंट बहुत कम है. उसे गालियां देना ठीक नहीं. उसके मुक़ाबले एक शहरी का वाटर फ़ुटप्रिंट बहुत ज़्यादा है. अगर उसकी पत्नी रेशम की साड़ी पहनती है तो उसे बनाने में 20 लाख लीटर पानी लगता है. क्योंकि वह कीड़े से बनता है जिसे पालने-पोसने और तूती लगाने में पानी देना पड़ता है. इसे वर्चुअल कॉन्टेंट ऑफ़ वॉटर इन प्रोडक्ट कहते हैं.''

क़रीब 330 तरह की जैव विविधता वाली ज़मीन के मालिक अरुण देशपांडे का मानना है कि सूखे और पानी की कमी से निपटने का एक ही तरीक़ा है.

वे कहते हैं, ''हमारा कहना है कि जो शहरों में चले गए हैं वो वापस आ जाएं. वैसे भी पेट्रोलियम और कोयला ख़त्म होने के बाद वो वापस आने वाले हैं. उन्हीं के लिए हम यहां यह तैयार कर रहे हैं.''

वह बताते हैं कि यह उनका एक सपना था कि वह गांव में रहें. दूसरा सपना था ''मुझे मिट्टी की सुगंध साल भर मिलनी चाहिए और तीसरा सपना था कि मैं मई महीने में भी किसी भी कुएँ में कूद जाऊं क्योंकि इसी महीने में मैंने तैरना सीखा था.''

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