इन महिलाओं के सामने टाटा को भी 'झुकना' पड़ा

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यह कहानी है एक ऐसी अनोखी बग़ावत के बारे में, जिसमें क़रीब छह हज़ार महिला मज़दूरों ने दुनिया की सबसे ताक़तवर कंपनियों में से एक के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया.

आंदोलन में शामिल अधिकांश महिलाएं मुश्किल से ही पढ़ी लिखी हैं.

एक ऐसा देश जो लैंगिक भेदभाव से ग्रस्त है, वहां इन महिलाओं ने पुरुष प्रधान ट्रेड यूनियनों और राजनीति की दुनिया को चुनौती दी और अपने आंदोलन में पुरुषों को हावी होने देने से इनकार कर दिया.

इसके बावजूद वो अपनी लड़ाई में जीत हासिल की.

ये महिलाएं केरल की चाय बागान में काम करने वाली मज़दूर हैं और एक बड़ी कंपनी कानन देवन हिल्स प्लांटेशन के लिए काम करती हैं.

इस कंपनी पर भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनी टाटा का नियंत्रण है और टेटली टी पर भी इसी का मालिकाना हक़ है.

जिस वहज से महिला मज़दूरों का विरोध प्रदर्शन फूटा, वो था पत्तियां तोड़ने वाले मज़दूरों के बोनस में कटौती का फैसला, लेकिन यह विरोध बहुत आगे गया.

Image caption बीबीसी ने कुछ महीने पहले असम के चाय बगानों में मज़दूरों की हालत की पड़ताल की थी.

भारत में चाय बागान के मज़दूरों की हालत बहुत अच्छी नहीं है. पिछले महीने जब हमने असम के चाय उद्योगों की पड़ताल की थी तो हमने पाया था कि मज़दूरों की रहने और काम करने की स्थितियां बहुत ही बुरी हैं.

उनकी मज़दूरी इतनी कम है कि मज़दूर और उनका परिवार कुपोषण का शिकार रहता है और जानलेवा बीमारियों से घिरा रहता है.

ऐसा लगता है कि केरल में भी हालात इससे अलग नहीं हैं.

इन महिला मज़दूरों की शिकायत है कि वो एक बिस्तर वाले घर में रहती हैं, जहां टॉयलेट और बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं और, हालांकि वो असम के चाय बागान मज़दूरों से अधिक कमाती हैं फिर भी एक दिन की दिहाड़ी में 230 रुपये पाती हैं जो कि केरल में एक दिहाड़ी मज़दूर के मुक़ाबले आधी मज़दूरी है.

लेकिन जब पिछले सितम्बर की शुरुआत में महिलाओं ने बोनस को बहाल करने, मज़दूरी में बढोत्तरी और जीने की बेहतर स्थितियों की मांग की तो यह केवल कंपनी के लिए ही नहीं बल्कि ट्रेड यूनियनों के लिए भी चुनौती बन गई, जिन्हें मज़दूरों का प्रतिनिधि माना जाता है.

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महिला मज़दूरों का कहना है कि ट्रेड यूनियन के पुरुष नेताओं का कंपनी प्रबंधन के साथ साठ गांठ है और वो महिलाओं को उनके हक़ से अलग रखते हैं, जबकि उनकी कोशिश होती है कि ऊंचे ओहदे उनके पास ही रहें.

महिलाओं का तर्क है कि कुछ साल पहले जब चाय की क़ीमतें गिरीं और कुछ मालिकों ने अपने चाय बागान को खाली कर दिए तो यूनियन नेता अपनी नौकरियां बचा ले गए.

उनका ये भी कहना है कि ट्रेड यूनियनों ने उन आदमियों की शराब पीने की लत छुड़ाने के लिए पर्याप्त कोशिशें नहीं कीं, जो अपने बच्चों की शिक्षा या अपने परिवार के इलाज की बजाय अपना पैसा शराब में उड़ा देते हैं.

और उन्होंने ये दिखा दिया कि बिना ट्रेड यूनियन की मदद के वो एक असरदार आंदोलन शुरू कर सकती हैं.

जब 6,000 महिलाओं ने कंपनी के मुख्यालय की मुख्य सड़क को जाम कर दिया तो यह प्रदर्शन भी महिलाओं ने खुद संगठित किया था.

इनमें से अधिकांश महिलाओं का विरोध प्रदर्शनों का कोई इतिहास नहीं है.

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वो खुद को ‘पेम्पिलई ओरुमाई’ कहती हैं, जिसका अर्थ है महिला एकता.

इन महिलाओं ने केरल के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक मुन्नार की घेराबंदी कर दी, जिससे व्यापार और पर्यटन लगभग ठप से पड़ गए.

इनके नारे भी यूनियन नेताओं को निशाने पर लेने वाले थे. एक नारे में लिखा था, “हम पत्तियां तोड़ते हैं और अपने कंधों पर थैला लाते हैं, तुम नोटों से भरा थैला ले जाते हो.”

एक अन्य नारे में लिखा था, “हम टीन शेड में रहते हैं, तुम बंगले में मौज करते हो.”

जब ट्रेड यूनियन के पुरुष नेताओं ने प्रदर्शन में शामिल होने की कोशिश की तो उन्हें भगा दिया गया.

एक पूर्व ट्रेड यूनियन नेता पर तो महिलाओं ने सैंडिल से हमला कर दिया. पुलिस को उसे बचाना पड़ा.

एक अन्य घटना में महिलाओं ने ट्रेड यूनियन के कार्यालयों के बाहर लगे झंडे फाड़ डाले.

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इन्होंने उन स्थानीय नेताओं को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया जो अपना समर्थन जताना चाहते थे.

महिलाएं इस बात पर अड़ी रहीं कि वो तबतक प्रदर्शन जारी रखेंगी जबतक उनकी मांगे मान नहीं ली जातीं.

पहले तो कंपनी ने अनसुना कर दिया लेकिन नौ दिनों के प्रदर्शन और मुख्यमंत्री की देखरेख में चली मैराथन बातचीत के बाद उसने घुटने टेक दिए.

यह चौंकाने वाली जीत थीः कम पढ़ी लिखी महिलाओं के एक समहू ने राज्य में एक बड़ी हैसियत रखने वाली कंपनी के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला और जीत हासिल की.

बातचीत में महिलाओं ने ही मज़दूरों की ओर से प्रतिनिधित्व किया और 20 प्रतिशत बोनस को बहाल किए जाने की अपनी मांग को प्रबंधन को मानने पर मजबूर किया.

इस बीच ट्रेड यूनियन के पुरुष नेताओं को अपनी बेइज्जती बर्दाश्त करनी पड़ी और उस समझौते पर हस्ताक्षर करना पड़ा जो महिलाओं ने किया था.

लेकिन यह लड़ाई अभी ख़त्म नहीं हुई है.

मज़दूरी बढ़ाने का मुद्दा अलग से सुलझाया जाना था और जब महिलाओं की इस मांग को नहीं माना गया तो यूनियनों ने मज़दूरी को 232 रुपये से 500 रुपये प्रति दिन किए जाने की मांग को लेकर अनिश्चित अभियान शुरू कर दिया.

महिलाओं के आंदोलन की सफलता के बाद, एक तरह से यह उनकी पहलक़दमी को पीछे धकेलने की कोशिश थी.

लेकिन महिलाओं ने यूनियन के अभियान में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया और मज़दूरी बढ़ाए जाने की मांग को लेकर अलग प्रदर्शन शुरू कर दिया.

इस महीने की शुरुआत में कथित तौर पर यूनियन के कुछ पुरुष कार्यकर्ताओं ने महिलाओं के प्रदर्शन पर पत्थरबाजी की. इस हमले में छह लोगों को मामूली चोटें आईं.

लेकिन महिलाएं इससे डिगी नहीं और उन्होंने प्रदर्शन जारी रखा.

पेम्पिलई उरुमाई की एक नेता लिसी सनी ने समाचार वेबसाइट कैच को बताया, “हमारे पास खोने को कुछ नहीं है.”

उन्होंने कहा, “भूख और दुख हमारी ज़िंदगी का हिस्सा है. अगर हम भूखों मर जाएं, तो इसकी भी चिंता नहीं है.”

सनी के मुताबिक़, “लेकिन हमारा शोषण किए जाने की हम किसी को इजाजत नहीं देंगे. बहुत हो चुका.”

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