आरएसएस और जमात-ए-इस्लामी, भाई-भाई!

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जब एक विचारधारा को लेकर कोई सत्तासीन होता है तो अनेक पेचीदगियां पैदा हो जाती हैं. वो इसलिए कि विचारधारा की कही-अनकही समझ ये होती है कि वही सर्वश्रेष्ठ है.

मिस्र में 2012 में हुए चुनाव में फ्रीडम और जस्टिस पार्टी सत्ता में आई. पार्टी की स्थापना एक साल पहले ही की गई थी.

इस्लामवादी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड चुनाव नहीं लड़ सकता था शायद इसलिए एक सियासी पार्टी की स्थापना की गई.

कहने को तो फ्रीडम एंड जस्टिस पार्टी सत्ता पर विराजमान थी लेकिन इसकी असल बागडोर मुस्लिम ब्रदरहुड के हाथों में थी.

चुनाव के दौरान मुहम्मद मोर्सी कहते थे उनकी पार्टी लोकतंत्र और इंसाफ के आधार पर मिस्र के सभी समुदायों के लिए काम करेगी.

सब का विकास होगा. लेकिन सत्ता में आने के बाद इस्लाम और शरिया से प्रेरित क़ानून लाए जाने लगे. यहाँ तक कि नया संविधान शरिया क़ानून से काफी मिलता-जुलता था.

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दूसरे शब्दों में मुस्लिम ब्रदरहुड ने फ्रीडम और जस्टिस पार्टी के नाम पर नए संविधान की आड़ में अपना एजेंडा लागू करना शुरू कर दिया. अल्पसंख्यकों को नज़र अंदाज़ किया जाने लगा.

मिस्र में मुस्लिम बहुसंख्यक हैं लेकिन वहां 12 प्रतिशत आबादी कोप्टिक ईसाईयों की भी है. दोनों सदियों से मिलजुल कर रहते आ रहे हैं.

संविधान का विरोध हुआ. लोग सड़कों पर उतर आए. राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी की कुर्सी हिली और फ़ौज ने उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया.

इस तरह मिस्र में इस्लामी विचारधारा का सत्ताकाल एक साल में समाप्त हो गया.

भारत में जमात-ए-इस्लामी नाम की संस्था काफी पुरानी है और इसकी सोच मिस्र की मुस्लिम ब्रदरहुड से सौ प्रतिशत मिलती है.

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सालों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारकों से बातें करके मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि आरएसएस हिंदुओं की जमात-ए-इस्लामी है.

जमात के प्रचारक कुछ कहे बग़ैर भारत के मुसलमानों को इस बात का एहसास दिलाते हैं कि इस्लाम के जिस ब्रांड का वो पालन और प्रचार करते हैं वही सबसे सर्वश्रेष्ठ इस्लाम है.

संघ के लोग भी यही समझते हैं कि हिन्दू धर्म के जिस ब्रांड का वो प्रचार करते हैं वही सही है. गौ हत्या पर प्रतिबंध का मामला हो या हिन्दू समाज की कल्पना वो ये जताने की कोशिश करते हैं कि उनके विचारों से पूरा हिन्दू समाज सहमत है.

आरएसएस और जमात-ए-इस्लामी के नेताओं में समानता है इसे खुद दोनों संगठनों के नेताओं ने एक ऐतिहासिक अवसर पर स्वीकार भी किया था.

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जब इंदिरा गांधी ने 1975 में देश पर इमरजेंसी थोपी तो दोनों संगठनो के नेताओं को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया. जेल में इन दो विचारधारा वाले लोगों की पहली बार मुलाक़ात हुई.

जेल के अंदर उन्हें एहसास हुआ कि दोनों के विचार बहुत अलग नहीं है और ये कि दोनों का लक्ष्य मिलता जुलता है.

संघ हिन्दू समाज में सुधार लाने के लिए चरित्र निर्माण और हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए काम कर रहा है.

जमात भी मुसलमानों के चरित्र निर्माण, मुस्लिम समाज में सुधार और 'सही' इस्लाम की स्थापना का प्रचार कर रही है. जेल से छूटने के बाद भी दोनों दलों के नेताओं की दोस्ती बनी रही.

अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण अडवाणी जमात के कुछ समारोहों में मेहमान भी रह चुके हैं.

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लेकिन धीरे-धीरे समय के साथ इनकी दोस्ती दूरियों में बदलती गई और अाडवाणी के राम मंदिर आंदोलन ने इसे ख़त्म कर दिया.

आज जमात अपने वजूद के सब से कठिन दौर से गुज़र रही है लेकिन संघ फल-फूल रहा है.

अगर कोई संगठन जब ये समझने लगे कि उसकी विचारधारा ही सबसे श्रेष्ठ है तो दूसरों के प्रति उसकी सहिष्णुता और स्वीकार्यता कम हो जाती है.

आरएसएस के प्रचारकों से बातें करके लगता है हिन्दू धर्म का आरएसएस अकेला नेतृत्व करने की क्षमता रखता है और राष्ट्रीयता का पाठ केवल वही दे सकता है. उनसे जो सहमत नहीं वो हिन्दू नहीं, भारतीय नहीं.

अब तक आरएसएस के इन विचारों को अक्सर लोग गंभीरता से नहीं लेते थे. लेकिन अब आरएसएस सत्ता के गलयारों में है.

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पिछले साल आम चुनाव के बाद भारत में मिस्र जैसा माहौल बनता दिखाई देता है. तकनीकी रूप से केंद्र में भाजपा की सरकार है. संघ राजनीति से परे रहने का दावा करके खुद को एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन बताता है. आम धारणा भी यही है.

आम चुनाव से पहले कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा था कि चुनाव में मुक़ाबला सीधा कांग्रेस और आरएसएस के बीच है, बीजेपी आरएसएस का केवल एक मुखौटा है.

इसमें ग़लत क्या है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या गृह मंत्री राजनाथ सिंह या रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर सभी आरएसएस के पुराने प्रचारक रहे हैं. मोदी मंत्रिमंडल में कई मंत्री संघ से ही आते हैं.

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मुहम्मद मोर्सी भी मुस्लिम ब्रदरहुड के प्रचारक रह चुके थे लेकिन चुनाव में वो फ्रीडम और जस्टिस पार्टी से खड़े हुए. यहाँ आरएसएस वहां ब्रदरहुड. यहाँ बीजेपी तो वहां फ्रीडम और जस्टिस पार्टी.

मिस्र के बहुलतावाद से छेड़छाड़ करके ब्रदरहुड को भारी नुकसान हुआ. कहीं आरएसएस भी वही ग़लती तो नहीं कर रहा?

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