असम में भूखों मर रहे हैं गजराज

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असम के प्रस्तावित संरक्षित वनांचल देव पहाड़ के जंगल में हाथियों की जान मुसीबत में है.

यहां के घने जंगल में मदमस्त घूमने वाले इन हाथियों के आने-जाने के रास्ते के बीच दो किलोमीटर लंबी दीवार खड़ी कर दी गई है.

दीवार का निर्माण गोल्फ कोर्स बनाने के लिए किया गया है.

सैकड़ों वर्ष पुराने इस नियमित कॉरिडोर से भटके हाथी न केवल हादसों का शिकार हो रहें हैं बल्कि नए रास्तों की तलाश में वनाचंल के पास बसे ग्रामीणों के साथ इनका टकराव भी बढ़ा है.

वन विभाग के अधिकारी बताते हैं कि पिछले 20 दिनों में नुमालीगढ़ और इससे सटे मोरांगी क्षेत्र में चार हाथियों की मौत हो गई है.

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हाथियों के मरने के कारणों में से एक कारण कॉरिडोर को बंद करना भी बताया जा रहा है.

देव पहाड़ के वनांचल से सटे नौपथार गांव में बसे ग्रामीणों का भी आरोप है कि दीवार के निर्माण से हाथियों के आने-जाने का रास्ता बाधित हुआ है.

गोलाघाट ज़िले के नुमालीगढ़ टाउनशिप से सटे देव पहाड़ के 133.5 हेक्टर प्रस्तावित संरक्षित वनांचल को पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र घोषित है.

यहां किसी तरह के निर्माण कार्य या फिर औद्योगिक इकाइयों के काम की कोई अनुमति नहीं है.

वन विभाग का आरोप है कि नुमालीगढ़ रिफाइनरी लिमिटेड (एनआरएल) के अधिकारी पांच एकड़ ज़मीन में एक गोल्फ कोर्स बनवा रहे हैं, लेकिन यह इलाका ‘नो डेवलपमेंट ज़ोन’ में पड़ता है.

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Image caption गोलाघाट डिवीजन के रेंजर प्राणेश्वर दास कहते हैं कि एनआरएल ने हाथियों के कॉरिडोर को बंद कर दिया है.

गोलाघाट डिवीजन के रेंजर प्राणेश्वर दास कहते हैं कि असम सरकार ने 18 अगस्त 1999 में देव पहाड़ के इस वनांचल को प्रस्तावित संरक्षित वनांचल के रूप में अधिसूचित किया था, जिसमें ‘एनएच 39 एक्सटेंशन टाउनशिप’ नामक हाथियों का कॉरिडोर भी शामिल है.

लेकिन एनआरएल ने ‘नो डेवलपमेंट ज़ोन’ के भीतर दो किमी लंबी दूरी तक ऊंची दीवार खड़ी कर हाथियों के कॉरिडोर को बंद कर दिया है.

हाथियों के मरने के कारणों पर वन अधिकारी दास का कहना है कि देव पहाड़ वनांचल में करीब 110 हाथी हैं और रात के समय हाथियों का अलग-अलग झुंड नियमित इस कॉरिडोर से होते हुए खाने की तलाश में कार्बी आग्लोंग ज़िले के नामबोर-दोईगरूंग वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी वाले संरक्षित इलाके तक जाते थे और फिर अपने स्थान तक लौट आते थे.

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लेकिन दीवार बना देने से कॉरिडोर बंद हो गया और अब खाने की तलाश में हाथियों को जंगल में इधर-उधर भटकना पड़ रहा है. ऐसे में हादसे हो रहें हैं. जंगल में तैनात वन सुरक्षा गार्डों को भी इन हादसों की समय पर ख़बर नहीं मिलती.

पिछले हादसे में मारे गए हाथी का जिक्र करते हुए वन अधिकारी ने कहा कि पिछले शुक्रवार को जिस हाथी की मौत हुई, पशु चिकित्सक ने उसका कारण भूख को बताया.

नुमालीगढ़ बीट आफिस में तैनात प्रभात सइकिया मानते हैं कि एनआरएल ने वन विभाग को बिना सूचित किए गोल्फ कोर्स के लिए गैर क़ानूनी रूप से पेड़ों की कटाई की है.

फिलहाल यह मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के पास विचारधीन है.

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नुमालीगढ़ रिफाइनरी की प्रवक्ता मधुचंदा अधिकारी ने बीबीसी से कहा कि मीडिया रिपोर्टों में कॉरिडोर को बंद करने के लिए चहारदीवारी निर्माण की बात प्रामाणिक और मान्य नहीं है. गोल्फ कोर्स का चहारदीवारी निर्माण से कोई लेनादेना नहीं है.

कंपनी ने 2011 में 67 बीघा ज़मीन पर चहारदीवारी का निर्माण किया था और ज़िला प्रशासन की अनुमति के बाद 2008 में यह ज़मीन हमें मिली थी. ज़मीन के राजस्व के नाम पर सरकार को कंपनी दो करोड़ रुपए दे रही है.

पर्यावरण व्यवस्था को बनाए रखते हुए गोल्फ कोर्स का निर्माण भी पर्यावरण के अनुकूल ही किया जा रहा है.

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