मंहगी होती रही दाल, 'पीएमओ रहा सुस्त'

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दाल की क़ीमतों में लगातार जो तेज़ी आ रही है उसके कई कारण हैं.

असल वजह है दाल उत्पादन के प्रमुख इलाकों में बारिश की कमी.

पश्चिमी महाराष्ट्र, तेलंगाना जैसे कई इलाक़ों में, जो पैदावार के परंपरागत इलाक़े रहे हैं, उत्पादन में 2 मिलियन टन की कमी हुई है.

आमतौर पर हर साल दाल का उत्पादन 18-19 मिलियन टन होता है. इस बार इसमें 10 फीसदी की कमी आई है. ये बहुत बड़ी कमी है.

भारत सरकार ने दाल की बढ़ती कीमतों से निपटने के लिए 5-10 हजार टन आयात की योजना बनाई है.

लेकिन इससे मौजूदा कमी दूर नहीं होगी.

दालों के उत्पादन में कमी का एक और बड़ा कारण खाद्यान्नों पर बहुत अधिक मात्रा में सब्सिडी का दिया जाना है.

सरकार की ओर से अनाज पर कम से कम 15 हज़ार रुपए प्रति एकड़ की सब्सिडी दी जाती है.

सब्सिडी और मुनाफ़े के कारण अधिकांश किसान अपनी जमीन पर दाल की जगह अनाज उगाना ही पसंद करते हैं.

इसकी वजह से दाल उत्पादन ऐतिहासिक रूप से उपेक्षित होता रहा है.

आज भारत में दाल का उत्पादन मात्र 18 मिलियन टन तक सिमट चुका है.

अप्रैल में ही मौसमविज्ञानियों की ओर से भविष्यवाणी कर दी गई थी कि कई कारणों से इस बार बरसात कम होने वाली है.

सूखाग्रस्त क्षेत्रों और उन इलाकों की भी पहचान की गई जिन इलाकों में बारिश कम होगी.

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ऐसे में सरकार को पहले से ही इन परिस्थितियों से निपटने की तैयारी कर लेनी चाहिए थी. दाल का भंडारण करना चाहिए था.

लेकिन तब सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया और अंतरराष्ट्रीय बाजार की ओर भी रुख नहीं किया.

और जब तक हम अंतरराष्ट्रीय बाजार पहुंचे उन्हें भारत में दाल की कमी की खबर लग गई. नतीजा ये हुआ कि दाल के दाम और बढ़ गए.

यही नहीं दाल के उत्पादन और वितरण से जुड़े नागरिक आपूर्ति, कृषि, वित्त और वाणिज्य इन चारों मंत्रालयों में समन्वय की कमी है.

मंत्रालयों के बीच तालमेल बिठाने में पीएमओ यानी प्रधानमंत्री कार्यालय की अहम भूमिका होती है. पीएमओ अगर सुस्त है तो तालमेल कठिन हो जाता है.

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स्थिति ये है कि 15 दिन पहले तक कोई कदम नहीं उठाया गया. और अब आपात स्तर पर दालों का आयात किया जा रहा है.

लेकिन फिलहाल आयात के लिए जितनी सीमा निर्धारित की गई है वो पर्याप्त नहीं है.

5 हजार टन और 2 मिलियन टन में बहुत अंतर है. इससे कुछ नहीं होगा.

(बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी से बातचीत पर आधारित)

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