गीता की कहानी तो अभी शुरू हुई है...

गीता का असली नाम गीता नहीं है. उसके घर वालों का अब तक भरोसे के साथ पता नहीं चला है. जिस तस्वीर से उसने 'अपने माता पिता' की पहचान की है उसमें दिखने वाले जो भी लोग हैं, उससे गीता की शक्ल नहीं मिलती. उसकी सही उम्र का अनुमान नहीं ... "भारत की बेटी" घर तो आ गई है लेकिन सच यह है कि यह यात्रा अब बस शुरू हुई है.

गीता न बोल सकती है और न सुन सकती है, लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों के बीच सदभाव का एक प्रतीक बन गया है और इससे एक "कूटनीतिक मौका" भी मिला है जिसका दोनों देशों की सरकारें लाभ उठाना चाहती हैं.

दिल्ली हवाई अड्डे पर पाकिस्तानी उच्चायोग के उच्च अधिकारियों ने उसका स्वागत किया, जिसके बाद भारतीय विदेश मंत्रालय में मंत्री सुषमा स्वराज से उसकी मुलाकात हुई.

इसके बाद डीएनए टेस्ट होंगे....उसने अपने माता पिता के रूप में जिनकी पहले पहचान की, उन्हें वो दिल्ली आने पर पहचान नहीं पाई.

लेकिन अगर वह वास्तव में उसके माता पिता साबित होते हैं, तो गीता को मालूम होगा कि वह एक माँ है, जिसका एक ग्यारह साल का बच्चा है और एक पति भी, जो पंजाब में मजदूरी करता है.

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वैसे यह गरीब परिवार बिहार से ताल्लुक रखता है. सासाराम शहर से तीस किलोमीटर की दूरी पर एक कच्चा रास्ता एक नदी तक पहुंचाता है.

फिर नाव से नदी के दूसरे पार, फिर ढाई किलोमीटर पैदल और आप इस गांव में पहुंच जाते हैं जहां गीता को लगता है कि उसका घर हो सकता है. न बिजली न सड़कें, यह गांव भारत के पिछड़े क्षेत्रों की तुलना में भी पिछली सदी में जी रहा है.

लेकिन जब स्वागत घटनाक्रम समाप्त हो जाएं, तब भी कुछ सवाल बाकी रह जाएंगे. गीता की उम्र कितनी है, वह किन परिस्थितियों में पाकिस्तान पहुंची, यदि वह वास्तव में शादीशुदा है और उसका बच्चा भी है तो यह बात उसने ईधी परिवार के उन लोगों को क्यों नहीं बताई जो इतने लंबे समय से उसकी देखभाल कर रहे थे?

हो सकता है कि इन सवालों का जवाब डीएनए टेस्ट से मिले और हो सकता है कि यह उसके परिजन न हों. हो सकता है कि उसने केवल भारत लौटने के लिए एक फोटो का चयन किया हो, ये भी हो सकता है कि उसके बचपन की यादें समय के साथ धुंधली पड़ गई हों.

लेकिन अगर सीमा पार करने से पहले उसकी वास्तव में शादी हो चुकी थी, वह माँ बन चुकी थी, तो वह इतनी छोटी तो नहीं रही होगी कि अपने माता पिता और भाई बहनों को पहचान न सके.

और ऐसा क्यों है कि तीन परिवार उसे अपना बता रहे हैं? क्या वह अपनी बेटी को नहीं पहचानते?

एक दो सप्ताह में तस्वीर कुछ स्पष्ट होगी. हो सकता है कि गीता को उसके बिछड़े हुए माता पिता मिल जाएं, और यह कहानी भी बजरंगी भाई जॉन की तरह एक सुख भरे अंजाम तक पहुंच जाए.

लेकिन यह कहानी जितनी गीता की है उतनी ही ईधी परिवार की भी है. भारत की इस बेटी की परवरिश पाकिस्तान में हुई है. इस लड़की ने खुद अपना नाम गीता नहीं रखा था.

यह नाम उसे सीमा पार मिला था. उसके कमरे में हिंदू देवी देवताओं के वो चित्र जिनके सामने पूजा करते हुए वह अक्सर भारतीय टीवी चैनलों पर नजर आती थी, वह परिवेश भी उसे उसी देश में मिला जहां से कई हिंदू नागरिक भाग कर भारत में शरण ले रहे हैं.

गीता न सुन सकती है और न बोल सकती है. लेकिन उसका सफ़र एक अद्भुत यात्रा- सहिष्णुता और परोपकार की एक जगमगाता हुआ उदाहरण बन गया है...एक संदेश जो साफ़ सुनाई देता है.

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