लड़ाई में फँस गए हैं लालू के तेजस्वी?

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पटना से राघोपुर जाना एक स्टार विधानसभा क्षेत्र के अलावा और भी रोमांचक अहसास है. रोमांचक इसलिए क्योंकि आपको गंगा नदी नाव से पार कर राघोपुर पहुँचना होता है.

नाव पर अपनी टैक्सी लादकर हम भी पहुँचे राघोपुर. शांत से दिखने वाले राघोपुर में हर व्यक्ति अपने वोट के ज़रिए एक संदेश देने को बेताब दिखा.

महिलाएँ ज़्यादा खुलकर बोलती हैं, तो पुरुष रिकॉर्ड पर कुछ भी बोलने से हिचकते हैं. लेकिन इन सबके बीच राघोपुर का अंकगणित सिर्फ़ और सिर्फ़ जातीय समीकरणों पर टिका दिखता है.

वैशाली ज़िले का राघोपुर विधानसभा क्षेत्र सालों से सुर्ख़ियों में रहा है. यहाँ से राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद और उनकी पत्नी राबड़ी देवी विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं.

लालू यादव ने 1995 और 2000 में यहाँ से जीत दर्ज की थी. उसके बाद उन्होंने ये सीट अपनी पत्नी राबड़ी देवी को सौंप दी. वो यहां 2005 का चुनाव जीतीं. लेकिन 2010 में उन्हें राघोपुर में हार का मुँह देखना पड़ा.

इस बार लालू प्रसाद यादव ने अपने बेटे तेजस्वी यादव को यहाँ के चुनाव मैदान में उतारा है. लालू प्रसाद यादव को उम्मीद है कि यादव बहुल राघोपुर में इस बार 2010 जैसा नतीजा नहीं निकलेगा.

लेकिन पहली बार चुनाव मैदान में उतरे तेजस्वी यादव के लिए लड़ाई उतनी भी आसान नहीं है. राघोपुर में विकास का नारा बनावटी ज़्यादा दिखता है. लोग खुलकर जाति-बिरादरी की बात करते हैं.

दरअसल भाजपा उम्मीदवार सतीश कुमार भी यादव हैं. इसका मतलब है यादव मतों का बँटवारा.

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लालू यादव के समर्थक खुल कर उनके लिए बोल रहे हैं. गणित भी समझा रहे हैं. जातिगत समीकरण के दाँव-पेंच बता कर अपना दम दिखा रहे हैं.

वहीं सतीश कुमार के समर्थकों का अपना तर्क है. वो यह तो मानते हैं कि ज़्यादातर यादव वोट तेजस्वी यादव के खाते में जाएँगे. लेकिन वो इतने पर ही ख़ुश हैं कि उनके खाते में भी उनसे ज़्यादा नहीं तो बहुत कम वोट भी नहीं आएँगे.

इसके अलावा सतीश कुमार के समर्थक अगड़ों और दलितों के वोट पर दावा जता रहे हैं. वो अति पिछड़ों के वोट में भी सेंधमारी करने का दम भर रहे हैं.

दूसरी ओर चुनाव प्रचार के दौरान तेजस्वी यादव का पूरा ध्यान उन वोटरों पर रहा जिन्हें वे अपनी ओर खींच सकते हैं.

कुछ यादव वोटरों से बात करने पर पता चला कि उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कई बयानों पर ऐतराज़ है, जिनमें लालू यादव को निशाना बनाया गया है.

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वहीं कुछ लोग मीसा भारती पर प्रधानमंत्री की टिप्पणी को उचित नहीं मानते हैं.

तेजस्वी यादव के लिए यह अच्छी ख़बर हो सकती है कि यादव वोट उनके लिए एक बार फिर एकजुट हो रहा है.

दूसरी तरफ़ सच्चाई यह भी है कि यादवों का एक छोटा तबक़ा विकास के मुद्दे पर लालू परिवार को घेरने की कोशिश कर रहा है. कुछ लोग सवल उठाते हैं कि राबड़ी देवी एक बार जीतीं और एक बार हार गईं, लेकिन इलाक़े का कोई विकास नहीं हुआ.

जातिगत आंकलनों में यादव के अलावा राजपूत वोटरों की भी चर्चा है, क्योंकि राघोपुर विधानसभा क्षेत्र में साठ हज़ार से ज़्यादा राजपूत वोटर हैं. लेकिन समाजवादी पार्टी (सपा) के उम्मीदवार राकेश रौशन राजपूत वोट काट रहे हैं.

जानकारों का कहना है कि राजद का ध्यान इस पर भी है कि अगर राजपूत वोट बड़ी संख्या में सपा की ओर जाते हैं, तो राजद की स्थिति और मज़बूत होगी.

लेकिन सतीश कुमार के समर्थक कहते हैं कि सबको पता है कि राकेश रौशन रेस में नहीं हैं, इसलिए राजपूत अपने मतों को बर्बाद नहीं करेंगे. अगर राजपूत वोट अच्छी ख़ासी संख्या में भाजपा के पक्ष में गए तो लड़ाई रोचक हो जाएगी.

हालांकि राघोपुर के दलित मुखर तो नहीं हैं. लेकिन अनौपचारिक बातचीत में उनका रुझान भाजपा की ओर दिखता है. दरअसल पूरे बिहार में ये चुप्पा वोटर ही नतीजों की डोर पकड़े हुए हैं.

राघोपुर के मतदाता बुधवार को अपना मत ईवीएम में दर्ज कर चुके हैं. मतगणना में तीन-चार फ़ीसद वोट जिस भी गठबंधन की ओर गया, उसका पलड़ा भारी हो जाएगा.

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