कुचिपुड़ी को विश्व में पहचान दिलाई

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कुचिपुड़ी नृत्य की मशहूर जोड़ी पद्मश्री राजा और राधा रेड्डी भारतीय शास्त्रीय नृत्य का जाना-पहचाना नाम है.

1943 में आंध्रप्रदेश के एक खेतिहर रेड्डी परिवार में जन्मे राजा को गांव में आई नृत्य मंडली का कुचिपुड़ी भागवतम इतना पसंद था कि वह कई बार उस नृत्य मंडली के साथ चले जाते थे.

कुचिपुड़ी नृत्य सीखने की ललक उन्हें उनके गुरु वेदांतम प्रहलाद शर्मा तक ले गई. उस समय कुचिपुड़ी सिर्फ ब्राह्मणों को ही सिखाया जाता था और सिर्फ पुरुष यह नृत्य करते थे.

राजा की पत्नी राधा को भी नृत्य में गहरी रूचि थी, जब राजा और राधा रेड्डी दोनों ने अपने गुरु से कुचिपुड़ी सीखने की इच्छा जाहिर की तो वे मान गए.

साल 1966 में आंध्रप्रदेश सरकार ने स्कॉलरशिप देकर उन्हें दिल्ली कोरियोग्राफी सीखने के लिए भेजा, यहाँ उन्होंने गुरु माया राओ के नाट्य बेले सेंटर में कोरियोग्राफी सीखी.

आगे चलकर उन्होंने दिल्ली में नाट्य तरंगिनी नाम से कुचिपुड़ी संस्थान की स्थापना की जहां आज भी कई देशी-विदेशी विद्यार्थी कुचिपुड़ी नृत्य की बारीकियां सीख रहे हैं.

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Image caption कुचिपुड़ी नाटकीय नृत्य शैली है, इसमें नृतक पात्र का रूप धारण कर नाट्य प्रस्तुत करता है.
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Image caption कुचिपुड़ी आंध्रप्रदेश की प्रसिद्ध नृत्य शैली है. इस नृत्य का नाम कृष्णा जिले के कुचिपुड़ी गांव के नाम पर पड़ा है, जहां के ब्राह्मण इस नृत्य को करते थे.
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Image caption वैष्णववाद के प्रभाव की वजह से इसका विषय 'महाभागवत' से लिया गया है. कुचिपुड़ी में कर्णाटक संगीत का प्रयोग किया जाता है व इसमें तांडव व लास्य की प्रमुख भूमिका होती है.
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Image caption कुचिपुड़ी नृत्य में संगीत के लिए मृदंगम, वायलिन, बांसुरी, तंबूरा व मंजीरे का प्रयोग होता है.
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Image caption 1976 में कुचिपुड़ी को देश-विदेश तक पहुंचाने के उद्देश्य से राजा, राधा रेड्डी ने नाट्य तरंगिनी नाम से नाट्य संस्थान की स्थापना की.
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Image caption राजा रेड्डी की दोनों बेटियाँ यामिनी रेड्डी और भावना रेड्डी भी कुचिपुड़ी की प्रसिद्ध नृत्यांगना हैं. बड़ी बेटी यामिनी रेड्डी शादी के बाद हैदराबाद में रहती हैं व नाट्य तरंगिनी हैदराबाद कुचिपुड़ी नृत्य संस्थान चला रही हैं.
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Image caption राजा रेड्डी की छोटी बेटी भावना रेड्डी कुचिपुड़ी नृत्यांगना है, साथ ही भावना ने कर्णाटक संगीत व पाश्चात्य संगीत की भी शिक्षा ली है.

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