इप्टाः साज़ उठाया तो थम गया ग़म-ए-दिल

ग़ुलाम अली

­­­­ पिछले दिनों मुंबई में गज़ल गायक गुलाम अली के शो को शिव सेना के विरोध के बाद रद्द कर दिया गया. लेकिन सालों पहले यही संगीत था जिसे एक संस्था ने लोगों को साथ लाने और एकजुट होकर अपने विरोध को स्वर देने के लिए इस्तेमाल किया.

रेलवे कर्मचारियों की हड़ताल के दौरान शैलेंद्र ने लिखा, 'हर ज़ोर ज़ुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है!' और इस गीत ने पूरे देश के मज़दूरों को जोड़ने का काम किया.

इंडियन पीपल्स थिएटर असोसिएशन ने इस बात को साबित किया कि संगीत अक्सर हमें आज़ाद करता है, हदें तोड़ता है, लोगों को साथ लाता है, हारे को उठने की ताकत देता है और संघर्ष का जज़्बा जगाता है.

हर संस्कृति का संगीत उसके इतिहास की छाप लिए होता है. इप्टा ने संगीत को अपने नाटकों का अभिन्न अंग बनाया. जहां इन नाटकों में 1857 की क्रांति की याद दिलाते हुए उत्साह भरे जोशीले गाने होते थे, वहीं ये गाने भारत के तमाम क्षेत्रों के लोकगीतों का सुर भी लिए होते थे.

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गायक और अकादमीशियन सुमंगला दामोदरन ने 'द हिंदू' को दिए एक साक्षात्कार में बताया कि ज़रूरी नहीं है कि ये गाने राजनीतिक रंग लिए ही हों. ये विरह, प्रेम, उदासी और हताशा के गाने भी थे, जो भारतीय लोक गीतों की थीम रही है.

वरिष्ठ रंगकर्मी लोकेंद्र त्रिवेदी कहते हैं कि इप्टा के नए गीतों की खासियत ये थी कि वे जोशीले थे, लोगों को प्रवोक करते थे. उनकी धुनें उत्साहवर्द्धक थीं सरल थीं और साथ रह जाती थीं. कई गीत मार्चिंग बीट्स पर लिखे गए, जो अक्सर सेना की परेड में बजती है.

लोकेंद्र बताते हैं कि ये बीट्स पश्चिमी संगीत से प्रेरित थीं. एक तरह से इस संगीत की ताल पूरी तरह से पश्चिमी होती और धुन विशुद्ध भारतीय. इस गुर को आगे चल कर हिंदी फिल्मों के मशहूर संगीतकारों ने भी अपनाया जिनमें मदन मोहन, शंकर जयकिशन और ओपी नैयर प्रमुख हैं.

इप्टा के इस संगीत में ग्रामीणता का पुट था तो शहरी नफासत भी, गुलामी की व्यथा थी तो विद्रोह का आह्वान भी, मिट्टी की सौंधी गंध थी तो अपने ही देश में ग़ैरों की तरह रह कर अपने हकों के लिए लड़ने का क्षोभ भी. और इन सबके बीच लगातार संघर्ष का जज़्बा था.

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यही वजह है कि जब शैलेंद्र, फ़ैज़, साहिर लुधियानवी जैसे गीतकारों ने रचनाएं लिखीं तो वे आम लोगों में इतनी मशहूर हुईं कि नारों की तरह इस्तेमाल होने लगीं. ‘हर ज़ोर ज़ुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है,’ या ‘तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत पर यक़ीन कर, अगर कहीं भी स्वर्ग है उतार ला ज़मींन पर’, या, सलिल चौधरी कृत ‘धेउ उठछे, कारा टुटछे’, या फ़ैज़ की नज्म- ‘हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे’.. ये सभी गीत ना सिर्फ विरोध के सुरों के रूप में मशहूर हुए बल्कि वे आज भी एक समाज और व्यक्ति के टूटे हुए मनोबल में उत्साह की सांस फूंकने का काम करते हैं.

गीतों की भाषा में भी ग्रामीण शब्दावली और तत्कालीन प्रसंगों का अद्भुत मेल देखने को मिलता है. इस तरह भाषा में देसी चटखपन, संवेदनशीलता और शहरी प्रायोगिकता का ऐसा तालमेल हुआ जिसने कई कालजयी रचनाएं और कॉम्पोज़िशन्स को जन्म दिया.

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मुंबई इप्टा की संचालक शैली सैथ्यू कहती हैं कि इस सांस्कृतिक आंदोलन से पहले भारतीय संगीत में कोरस यानी सामूहिक गान का इतना महत्व नहीं था.

लोकगीतों में ये परंपरा ज़रूर थी. इप्टा ने सामूहिक गान को मुख्यधारा के संगीत का अहम हिस्सा बनाया.

लोकनाटकों में जिस तरह का गायन होता था उसी में थोड़ी तबदीली लाई गई और उन्हें नुक्कड़ नाटकों का प्रमुख हथियार बनाया गया.

ज़ाहिर है कि नुक्कड़ नाटकों के संवाद इतने प्रभावी नहीं होते थे कि याद रह जाएं लेकिन इनके गीत और सिचुएशन्स हृदयस्पर्शी बनाई जाती थी.

खासकर गीत नाटकों के मंचन के महीनों बाद तक लोगों के ज़ेहन और ज़बान दोनों पर रहते थे.

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13वीं सदी के विद्वान और संत अमीर ख़ुसरो ने उत्तर भारत के लोकगीतों और उनकी धुनों का संकलन करने का महत्वपूर्ण काम किया था.

उसके बाद इप्टा ने ये काम पूरे भारत में किया.

तो एक तरह से ना सिर्फ इप्टा ने संगीत को एक नया तेवर दिया बल्कि परंपरागत संगीत को संरक्षित करने का काम भी किया.

आज भी जब फिल्म 'उसने कहा था' का ये गीत बजता है, 'जाने वाले सिपाही से पूछो, वो कहां जा रहा है'(मख़दूम), तो युद्ध की विभीषिका में एक सिपाही का अकेलापन रोंगटे खड़े कर जाता है.

साहिर की ये नज़्म आज भी दबे कुचले जीवन में विरोध के स्वरों को मज़बूत कर जाती है- भड़का रहे हैं आग लबे नग़्मागार से हम, ख़ामोश क्या रहेंगे ज़माने के डर से हम.

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