मंत्री बिहार प्रचार पर थे तो काम कौन कर रहा था?

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मोदी सरकार पर आरोप लग रहा है कि उन्होंने बिहार चुनावों के प्रचार में अपने मंत्रियों की फौज उतार दी थी, तो सरकार काम कैसे कर रही थी?

सवाल ये भी है कि मंत्रालय अपना कामकाज कैसे निपटा रहे थे और इतने सारे मंत्री जब अपना काम छोड़ प्रचार अभियान में जुटे थे तो सरकार पर इसका कितना असर पड़ा.

एक नज़र से देखें तो निश्चित तौर पर जब इतने सारे मंत्री (20 से अधिक) राज्य में चुनाव प्रचार करेंगे तो काम तो प्रभावित होगा ही, लेकिन असलियत शायद ये नहीं है.

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केंद्रीय मंत्रालयों में काम की रफ्तार सुस्त है. हालाँकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इरादे नेक हैं, लेकिन इरादों और इन्हें अंजाम तक पहुँचाने में बड़ा फासला है. जब प्रधानमंत्री कार्यालय सशक्त होता है तो लेट लतीफी पर झाड़ पिलाने लगता है.

मंत्रालय फ़ैसला लेने से डरते हैं, वे जानते हैं कि उन पर लगातार नज़र रखी जा रही है और उनके उठाए क़दम उन्हें वाहवाही की बजाय झाड़ पिला सकते हैं.

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वास्तव में, विपक्ष जब ये कहता है कि मोदी सरकार में मंत्री अब ‘गौरवान्वित क्लर्क’ भर रह गए हैं, तो वो बहुत ज़्यादा ग़लत नहीं होते. मंत्रियों के पास बहुत अधिक ताक़त नहीं है.

उन्हें हमेशा इस बात का डर है कि मोदी उन्हें देख रहे हैं. इस तरह के कई चुटकुले भी चलन में आए हैं. मसलन एक केंद्रीय मंत्री अपनी पहली विदेश यात्रा पर जाने के लिए हवाई अड्डे जा रहे थे कि तभी उनका मोबाइल घनघना उठा और ये कॉल किसी और की नहीं, बल्कि खुद प्रधानमंत्री की थी.

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उनसे कहा गया कि उनका पहनावा ठीक नहीं है. हवाई यात्रा सहज रहे इसके लिए उन्होंने जींस पहनी थी. मंत्री तुरंत अपने घर लौटे और कुर्ता पायजामा पहना.

एक अन्य घटना में, एक और केंद्रीय मंत्री जब एक पांच सितारा होटल में एक उद्योगपति के साथ दोपहर का भोजन कर रहे थे, तभी प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें फ़ोन पर हिदायत दी कि होटल में खाने का लुत्फ छोड़ पहले ऑफिस का काम निपटाएं.

मोदी सरकार के मंत्रियों के पास तो इतने भी अधिकार नहीं हैं कि वे अपने निजी सचिव नियुक्त कर सकें.

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यहाँ तक कि सुषमा स्वराज को विदेश मंत्रालय में अपने निजी सचिव के लिए कई महीनों का इंतज़ार करना पड़ा.

प्रधानमंत्री मोदी ने नौकरशाहों से कहा था कि यदि उनके काम में कोई वरिष्ठ अधिकारी यहाँ तक कि मंत्री भी अड़चन डालते हैं तो वे सीधे उनसे मिल सकते हैं. इसने मंत्रियों के अधिकार और उनके रूतबे को कम किया है.

पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी का ये कहना कि मोदी का प्रधानमंत्री कार्यालय सबसे कमज़ोर पीएमओ है और लोगों ने अब पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को याद करना शुरू कर दिया है. ऐसा ही होता है जब आप सारी शक्तियां अपने हाथ में ले लेते हैं और सरकार को एक पत्थर के खंभे की तरह चलाने की कोशिश करते हैं. यही वजह है कि मंत्री फ़ैसले लेने में बहुत ज़्यादा दिलचस्पी नहीं लेते.

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समस्त ताकतों को अपने पास समेटने का नुक़सान ये हुआ है इसने मंत्रियों को महज़ कन्वेयर बेल्ट बनाकर रख दिया है. ये प्रधानमंत्री के लिए आफ़त और चुनौती दोनों ही हैं.

आख़िरकार प्रधानमंत्री मोदी कोई सुपरमैन तो हैं नहीं जो सभी मंत्रियों का काम देख सकें. यदि मामला ये है तो मंत्री हैं ही क्यों? संयोग से, ये प्रधानमंत्री कार्यालय ही था, खेल मंत्रालय नहीं, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं के लिए खिलाड़ियों की सूची तैयार की थी.

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गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में, मोदी राज्य सरकार के हर फैसले को लेने में कामयाब हो पाए थे. लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि गुजरात एक छोटा राज्य था, इसके मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर कामयाबी के साथ नहीं दोहराया जा सकता.

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