'संगीत में फ्यूज़न हो कन्फ्यूज़न नहीं'

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मामे ख़ान राजस्थान के पारंपरिक माँगणियार समुदाय के लोक संगीत गायक व संगीतकार हैं. माँगणियार समुदाय के कलाकार कई पीढ़ियों से इस लोक कला का प्रदर्शन करते आ रहे हैं.

मामे ख़ान इस संगीत परंपरा की 15वीं पीढ़ी का नेतृत्व कर रहे हैं उनके वालिद राणा ख़ान भी अपने वक़्त के प्रसिद्ध लोक गायक थे.

मामे ख़ान की संगीत यात्रा की शुरुआत जैसलमेर के सत्तो नामक गाँव से हुई. मँगणियार लोक संगीत की एक विशेष शैली है जिसे 'जांगड़ा' कहा जाता है.

इसमें जीवन के हर अवसर जैसे त्योहारों, शादी, बच्चे का जन्म, राजस्थान की धरती के गीत गाए जाते हैं.

मामे ख़ान इस परंपरा को एक क़दम आगे लेकर गए हैं और सूफी, फ्यूज़न व नए युग के संगीत के साथ मिलकर उन्होंने माँगणियार लोक संगीत को नयी उंचाईयों तक पहुँचाया है.

कोक स्टूडियो के लिए उन्होंने गाया जिसे खासा सराहा गया. कई राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुति देने के अलावा उन्होंने बॉलीवुड फ़िल्मों के लिए भी गीत गाए. हाल ही में 'डेज़र्ट सेशंस' नाम से उनका म्यूजिक एल्बम भी लॉन्च हुआ है.

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Image caption मामे ख़ान ने पहली बार 10 वर्ष की उम्र में 15 अगस्त के मौके पर दिल्ली में राजीव गाँधी के लिए लोकगीत गाया था.
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Image caption मांगणियार लोक गायिकी मौखिक गायकी है, यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में चलती आ रही है, जिससे कई लोक गीत विलुप्त हो गए हैं. मामे ख़ान इन गीतों को लिखित रूप में संजोने का भी प्रयास कर रहे हैं.
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Image caption अपनी पारंपरिक शैली को बरक़रार रखने वाले मामे ख़ान का कहना है संगीत में फ्यूज़न होना चाहिए कन्फ्यूज़न नहीं.
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Image caption माँगणियार समुदाय के लोग मूलतः सिंध प्रान्त के मुस्लिम समुदाय से हैं, लेकिन वो पीढ़ियों से हिंदू त्योहारों व वैवाहिक कार्यक्रमों में संगीत गाते रहे हैं.
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Image caption इस गायन शैली में 6 रंग और 36 रागिनियों का प्रयोग होता है.
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Image caption मामे खान मानते हैं राजस्थानी पृष्ठभूमि से आने की वजह से शुरू में उन्हें भाषा की दिक्कत हुई, पर जल्दी ही उन्हें एहसास हो गया कि संगीत भाषा की सीमा से बँधा नहीं होता, उसकी अपनी भाषा होती है.
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Image caption संगीत के अलावा मामे ख़ान को बागवानी का शौक है, बचपन में जब उनके बाबा राजस्थान से बाहर जाते थे तब वे उनसे पौधे मंगवाते थे.
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Image caption मामे ख़ान देश विदेश में 150 से अधिक समारोहों व महोत्सवों में शिरकत कर चुके हैं. इस गायन शैली के प्रमुख वाद्य कमायचा व खड़ताल है.
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Image caption वो जैसलमेर की जांगड़ा व सूफी शैली के माहिर कलाकार हैं. उनका प्रयास है की लोक कलाकारों को ज़्यादा से ज़्यादा अपनी प्रतिभा दिखने के लिए मंच मिले.

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