क्या है बिहार चुनाव के नतीजों के मायने ?

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बिहारियों ने, जिन्हें हममें से ज़्यादातर लोग 'पिछड़े' और 'गंवार' की तरह देखते हैं, नफ़रत और दुर्भावना को नकार दिया है. हममें से अधिकांश लोग इस नफ़रत और दुर्भावना के आगे पस्त हो गए हैं.

यही इन चुनावों का सबसे अहम पहलू है. साम्प्रदायिकता के दम पर चलने वाले रथ की ऐतिहासिक सी लगने वाली अपरिहार्यता अब संदेह में है.

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इन चुनावों का दूसरा मतलब यह है कि अब प्रधानमंत्री मोदी कैसे राज करेंगे. बिहार चुनावों में उन्होंने सबसे अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया. उन्होंने कहा था कि नीतीश कुमार के डीएनए में कुछ ग़लत है. उन्होंने कहा कि लालू यादव शैतान हैं. उन्होंने कहा कि दो बिहारी और राहुल गांधी मिलकर थ्री इडियट्स हैं.

ऐसी भाषा के बाद मोदी विकास के अपने एजेंडे पर कैसे लौट सकते हैं, यह जानते हुए कि उन्हें बड़े राज्यों के मुख्यमंत्रियों को साथ लेकर चलना होगा. यह देखना दिलचस्प होगा कि जिन्हें मोदी अपना राजनीतिक दुश्मन बना रहे हैं उनके साथ वह कैसे काम करते हैं.

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तीसरी बात यह है कि क्या पाकिस्तान में पटाख़े फोड़े जा रहे हैं. बिहार चुनावों में जिस तरह का प्रचार देखने को मिला उसके उदाहरण हमारी राष्ट्रीय राजनीति में कम ही मिलते हैं.

हम सभी इस बात के आदी हैं कि अब तक देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टी रही कांग्रेस किस तरह से अपने स्वार्थ के लिए धर्म का इस्तेमाल करती रही हैं. लेकिन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह की ज़हर बुझी और कड़वी बातें कही है उसका दुष्प्रभाव लंबे समय तक हमारे तानेबाने पर बना रहेगा.

आप यह उम्मीद नहीं कर सकते कि मोदी और शाह ने चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह का ज़हर बोया है उसके बाद चीज़ें फिर बेहद आसानी से सामान्य हो जाएंगी. ऐसा नहीं होगा और भारत को इसकी क़ीमत चुकानी पड़ेगी.

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हमने 1992 में (बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद) ये देखा है और हमें फिर इसक़ी क़ीमत चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए.

इन चुनावों का चौथा पहलू यह है कि भाजपा के लिए यह हार (यह देखना भी दिलचस्प होगा कि कितने लोग इसे लालू-नीतीश की जीत के बजए मोदी की हार क़रार देते हैं ) उसके सहयोगी दलों को मुखर बनाएगी.

भाजपा को नीचा दिखाने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ने वाली शिवसेना ने भी कहा है कि प्रधानमंत्री ने एक राज्य के चुनावों में अपनी गरिमा गिराई है. शिवसेना ने कहा है कि मोदी को संयम दिखाने की ज़रूरत थी. शिवसेना की बातों से असहमत होना मुश्किल है.

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पांचवीं बात यह है कि रविवार को लाल कृष्ण आडवाणी का 87वां जन्मदिन था. उन्हें एक शानदार तोहफ़ा दिया गया. मोदी ने तीन ट्वीट करके उन्हें अपना सबसे अच्छा शिक्षक, और निस्वार्थ सेवा का सबसे बड़ा प्रतीक बताया. लेकिन मेरा मतलब इस तोहफ़े से नहीं है. आडवाणी एक बार फिर उस पार्टी में प्रासंगिक बनने की तैयारी में हैं जिसे उन्होंने खड़ा किया है.

भाजपा में फ़िलहाल जो नेता मोदी के पूर्ण रूप से पार्टी और सरकार पर क़ब्ज़े के कारण पूरी तरह हाशिए पर चले गए हैं वे अब उनकी छत्रछाया से बाहर निकल आएंगे.

गृहमंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और बाक़ी नेता जो दो साल पहले तक ख़ुद को मोदी के बराबर का मानते थे, मोदी के लिए अब उन्हें सिर्फ़ हाथ के इशारे से नियंत्रण करना आसान नहीं होगा.

ऐसे नेता अब अपनी उपस्थिति ज़ाहिर करने पर ज़ोर लगाएंगे और विद्रोह का बिगुल भले ही खुले तौर पर न बजे लेकिन कहानियां लीक होनी शुरू होंगी. शत्रुघ्न सिन्हा जैसे छुटभैये नेता भी खुलकर सामने आने लगे हैं. प्रधानमंत्री का ख़ौफ़ कम होना शुरू हो गया है और अब यह उन पर निर्भर करता है कि वह फिर कैसे अपनी प्रभुसत्ता क़ायम करते हैं.

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छठी बात यह है कि बिहार चुनावों का राष्ट्रीय राजनीति पर नकारात्मक असर होगा. संसद में काम बाधित होगा और संजीवनी प्राप्त कांग्रेस संसद में और अधिक आक्रामक रुख़ दिखाएगी. भाजपा के हर मुद्दे को विपक्ष ख़ारिज करते रहेगा.

इन चुनावों का सातवां निहितार्थ यह है कि कभी विश्वसनीय माने जाने वाले अधिकांश एग्जि़ट पोल ग़लत साबित हुए हैं. चाणक्य ने भाजपा के लिए 150 सीटों की भविष्यवाणी की थी लेकिन उसका एग्जि़ट पोल ग़लत निकला. लगभग 75000 नमूने लेने वाले एनडीटीवी का सर्वे भी ग़लत साबित हुआ. यह संख्या उल्लेखनीय है क्योंकि अमरीकी राष्ट्रपति चुनावों में क़रीब 9000 का सैंपल लिया जाता है.

आठवां पहलू यह है कि जिस तरह परिणाम घोषित किए गए उससे मीडिया की कमज़ोरी सामने आ गई है. ख़ासकर जिस लापरवाह तरीक़े से विश्लेषकों ने डेटा पर अपनी राय रखी. शुरुआती रुझानों के आधार पर ही भाजपा की लहर बता दी गई.

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ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि पोस्टल बैलट से आए मध्य वर्ग के मत भाजपा के पक्ष में गए. इससे भाजपा की ज़र्बदस्त जीत का अनुमान लगाया गया और शेखर गुप्ता जैसे वरिष्ठ पत्रकार समेत कई लोग यहां तक कह गए कि नीतीश कुमार ने कुछ भारी ग़लती की है.

नौवां पहलू यह है कि हिंदुत्व और चुनावी राजनीति में इसकी भूमिका पर भाजपा और आरएसएस के अंदर बहस होगी. हिंदुत्ववादी ताक़तों को आडंबर में महारत हासिल है. हमें जल्दी ही मीडिया में उनके हमदर्दों से यह सुनने को मिल जाएगा कि यह व्यापक आंदोलन किस तरफ़ बढ़ रहा है ज़्यादा दुर्भावना और रोष की तरफ़ या फिर असली राष्ट्रीय हित की ओर.

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दसवां निहितार्थ यह है कि जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद कहते रहे हैं कि कम से कम अगले एक दशक तक राष्ट्रीय राजनीति में मोदी का कोई विकल्प नहीं है.

यह दलील दी जा सकती है कि वो ऐसा इसलिए कहते हैं कि जिस गठबंधन की वह अगुवाई कर रहे हैं उसमें भाजपा शामिल है लेकिन मेरा मानना है कि वह सही हैं. जो उनकी बात से सहमत नहीं हैं या इसे पसंद नहीं करते हैं उन्हें भी इस सच्चाई के साथ रहना पड़ेगा कि अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी हार के बाद भी मोदी इस समय देश के सबसे विश्वसनीय, ऊर्जावान और प्रतिभाशाली राजनेता हैं.

मोदी को अब अपनी हार को एक तरफ़ रखकर जल्द ही इस बात की ओर ध्यान देना होगा कि उनकी सरकार के एजेंडा पर सबसे महत्वपूर्ण चीज़ें क्या हैं.

सिर्फ़ उम्मीद ही की जा सकती है चाहे बेकार ही सही कि मोदी सरकार के एजेंडा पर अब ये नहीं होगा कि हम क्या खाते हैं और हमारी आस्था क्या है.

(लेखक एमनेस्टी इंटरनेशनल के कार्यकारी निदेशक हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)

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