जिन्होंने किया मांझी को चारों खाने चित

इमेज कॉपीरइट bbc

बिहार में पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी को हराने वाले सूबेदार दास की अब तक की पहचान राष्ट्रीय जनता जद के एक मामूली से कार्यकर्ता की रही है.

सच्चाई तो यह है कि मांझी के खिलाफ उम्मीदवार बनाए जाने के बाद ही उनके बारे में लोगों को जानकारी हुई. लेकिन वही सूबेदार दास आज मांझी को हराकर सुर्खियों में हैं.

सूबेदार दास को टिकट मिलने की कहानी भी रोचक है. सूबेदार दास टिकट के प्रयास कर रहे थे. टिकट बंटवारे के दिनों में पटना में ही जमे हुए थे. लेकिन बताया जाता है कि जब लालू यादव को इस विधानसभा के सामाजिक आकलन के बाद लगा कि सूबेदार जीतनराम मांझी को टक्कर दे सकते हैं तो उन्होंने सूबेदार को खुद फोन कर बुलाया और टिकट दिया.

माना जा रहा है कि सूबेदार की जीत के पीछे क्षेत्र का सामजिक समीकाण है जो कि महागठबंधन के पक्ष में पहले से था और चुनाव के दौरान महागठबंधन के पक्ष में और भी सामाजिक गोलबंदी हुई.

सामाजिक उपस्थिति की बात करें कि महागठबंधन के कोर वोट बैंक यानी कि यादव, मुस्लिम, कुर्मी के अलावे इस सुरक्षित विधानसभा क्षेत्र में कुशवाहा और रविदास समुदाय की अच्छी तादाद है. खुद सूबेदार दास भी रविदास समुदाय से आते हैं. जबकि कुशवाहा भी अनुमान के मुताबिक महागठबंधन के साथ रहे.

सूबेदार दास 1990 से लालू के साथ लगातार हैं. वे 2001-2006 के बीच जिला पार्षद सदस्य भी रहे. लालू उनके लिए प्रचार करने दो बार उनके इलाके में गए भी थे. हालांकि नीतीश उनके लिए वोट मांगने नहीं आए.

इमेज कॉपीरइट Manish Saandilya

इस बीच में उन्हें एक स्टिंग में कथित तौर पर पैसे लेते हुए दिखाया गया था. सूबेदार इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं. सूबेदार के मुताबिक उन्हें साज़िश के तहत फंसाया गया है.

सूबेदार ने बीते दिनों बीबीसी से बात-चीत में बताया था कि आरक्षण के सवाल पर मोहन भागवत के बयान का उन्हें राजनीतिक फायदा मिलता दिख रहा है.

वे अपनी जीत का श्रेय कार्यकर्ताओं से अपने जुड़ाव को देते हैं. साथ ही सूबेदार के मुताबिक हर जाति-बिरादारी के साथ उनका लगाव है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार