बिहार का फ़ैसला दूर तक और देर तक गूंजेगा

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इतवार को जब बिहार अपने वोट गिनवा रहा था, तब दुनिया के नीति-निर्माता और कॉरपोरेट हस्तियाँ इकॉनमिस्ट पत्रिका में छपे इस लेख को पढ़ रही होंगी. नतीजे आने से पहले लिखे गए लेख का अंत कुछ ऐसा हैः

“बिहार में सांप्रदायिक राजनीति करने का विकल्प चुनना और हिंदुत्व के नाम पर अपराधियों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई न कर पाना मोदी की नीयत को संदिग्ध बनाता है. ये तत्व उस मशीन का ज़रूरी हिस्सा हैं जो चुनाव और दूसरे कामों में उनके लिए उपयोगी हैं. ये बात विचलित करने वाली है कि बिहार में मोदी की संभावित हार या जीत, दोनों ही मोदी को अतिवादियों के और क़रीब ले जाएगी. उससे भी बुरी बात तो ये है कि वे शायद इन तत्वों से सहमत भी हैं.”

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लंदन की इस पत्रिका की तरह, बिहार की जनता ने भी नरेन्द्र मोदी की राजनीति पर एक निर्णायक सवालिया निशान कैसे लगा दिया, इसका विश्लेषण करने की कवायद शुरू हो चुकी है. पर इन नतीजों की वजह से बाकी जगह जो असर दिखलाई पड़ेंगे वे कुछ ऐसे हैंः

  • असहिष्णुता पर बहसः जिस बढ़ती असहिष्णुता की शिकायत को सरकार और उसके समर्थक खारिज किये जा रहे हैं, उस पर अब अतंरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता जताई जाने लगी है. इस पर मानवाधिकार संगठनों का ध्यान जाएगा. अपने दम पर चुनाव लड़ने और बुरी तरह हारने के बाद उनसे ये उम्मीद कम ही है कि वे परिवार के उद्दंड सदस्यों की नकेल कस सकेंगे. नकेल कसने के लिए उन्हें अपना वह कथानक बदलना होगा, जिसका ताना-बाना उन्होंने बहुत सहेजकर, बहुत मेहनत से बुना है.
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  • बदलती राय दुनिया कीः इकॉनमिस्ट और न्यूयॉर्क टाइम्स में मोदी को लेकर चिंता तब जताई जा रही है जब वे पहली ब्रिटेन यात्रा पर जाने वाले हैं. न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपने संपादकीय में लिखा है कि “सच तो ये है कि भारत में नफ़रत दरारें पैदा कर रही है और देश कुछ कट्टर हिंदुओं की असहिष्णु मांगों का बंधक बन रहा है. ये वह भारत नहीं है जो विशाल भारत के ज्यादातर लोग चाहते हैं. ये वह भारत भी नहीं है जहां पैसा लगवाने के लिए मोदी दुनिया भर के दौरों में बहुत मेहनत करते हैं.”
  • निवेश की सहूलियतः भारत में पैसा लगाने वाले भी ये ताड़ने की कोशिश करेंगे कि भारत में धंधा करने की सहूलियत कुछ रिपोर्ट में भले ही बढ़ी हो, पर बिहार चुनाव के नतीजे किस तरह उस पर रोड़ा लगाएंगे. अगर पार्टी वहां जीतती तो राज्यसभा में उसके सदस्य बढ़ने की उम्मीद जगती. जिसके बल पर वे अपने विधेयक बिना उन रोड़ों के पारित करवा लेती, जो विपक्ष राज्यसभा में बार-बार अटकाता रहा है. भारतीय जनता पार्टी जब विपक्ष में थी, तब उसने भी ऐसा ही किया था. अब उसके साथ भी यही हो रहा है. गतिरोध बने रहेंगे. जिस आधार पर मोदी निवेश की बात करते हैं, जब वह रास्ता ही मुश्किल होगा, तो विकास भी कैसे होगा. इतवार को चुनावी नतीजों के बाद से स्टॉक मार्केट इसीलिए सदमे में चला गया है.
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  • विकास का सवालः बिहार चुनावों के नतीजों ने ये भी तय किया कि मोदी का करिश्मा और विकास का नारा वैसे काम नहीं कर रहा जैसा डेढ़ साल पहले था. ये भी कि गुजरात मॉडल ने भले ही देश को एक सपना दिया हो पर पिछले डेढ़ साल में वह सच होता नहीं दिखा है. जुमलों का विकास उस विकास से अलग होता है जो लोगों ने ख़ुद अनुभव किया हो.
  • ध्रुवीकरण के खतरेः सबसे मुश्किल सवाल ये है कि इस हार के बाद दक्षिणपंथी राजनीति की उग्रता क्या कम होगी या और ज्यादा बढ़ेगी. क्या भारत अभी गाय और दूसरे सांप्रदायिक विभाजनकारी मुद्दों पर हिंसा और उग्रता देखेगा या फिर कुछ नरमी पड़ेगी. ख़ासतौर पर उस वक़्त में जब मध्य भारत के ज्यादातर ज़िले सूखे की चपेट में हैं.
  • व्यक्तिवादी राजनीतिः जो फ़रवरी में दिल्ली में दिखा था, एक बार फिर बिहार चुनाव से ये रेखांकित हो गया कि नरेन्द्र मोदी अपराजेय नहीं हैं. जैसे अयोध्या आंदोलन के दौरान लालकृष्ण आडवाणी का रथ बिहार में फंस गया था, वैसे ही नरेन्द्र मोदी का अश्वमेध दिल्ली के बाद बिहार में जा कर रुका है. उम्मीद की जानी चाहिए कि इस चुनाव के बाद सियासत की बिसात नई तरह से बिछाई जाएगी, जहां व्यक्ति से ज्यादा ज़रूरी और महत्वपूर्ण वे कार्यक्रम होंगे जिसके केन्द्र में देश की जनता होगी ना कि राजनेता. इसका इंतज़ार खुद भारतीय जनता पार्टी के दूसरे नेताओं को भी होगा, जो खुद को हाशिये पर पाते हैं. और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के घटक दलों का भी.
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भारतीय जनता पार्टी और नरेन्द्र मोदी के लिए ये एक दिलचस्प हासिल है कि उन्होंने कांग्रेस और नेहरू परिवार की तरह एक तरह की केंद्रीयता पा ली है. ये बात अलग है कि कांग्रेस कई दशक उस जगह पर रही. भाजपा का आईना डेढ़ साल में दूसरी बार दरकता दिख रहा है.

  • प्रतिपक्ष की रणनीतिः मोदी के पास साढ़े तीन साल बचे हैं. इस बीच कई और बड़े राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव ने कांग्रेस के साथ मिलकर जिस तरह भारतीय जनता पार्टी को बिहार में हराया है, ये साफ तौर पर उस रास्ते की तरफ इशारा करता है जो बाकी राज्यों में भी अपनाई जाएगी. रणनीति का ये बदलाव दोनों तरफ दिखलाई देगा. उधर महागठबंधन के ऊपर भी इस बात का बहुत जिम्मा होगा कि जनादेश पा लेने के बाद वे बिहार को किस तरह उन सारी तोहमतों से बचा लें, जो भारतीय जनता पार्टी के नेता लगाते रहे हैं. लालू प्रसाद यादव कह ही चुके हैं कि वे इस अभियान को देश भर में ले जाने वाले हैं. ये देखने वाली बात होगी कि आगामी चुनावों में बिहार वाली शतरंज ही खेली जाएगी, या फिर कोई और.
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  • बदलता हुआ आम आदमीः जिन कार्यक्रमों का ढिंढोरा राजनेता और पार्टियां अहसानों की तरह पीटती हैं, लोग अब उन्हें अपना हक समझते हैं. यह बात शायद ठीक से न कांग्रेस को समझ में आई और न मोदी को. अगर ऐसा होता तो कांग्रेस को उन सारे लोगों के वोट मिलते जिन्हें मनरेगा के जरिये गरीबी रेखा के ऊपर आने का मौका मिला था. जैसे जैसे भारत एक ग्लोबलाइज्ड दुनिया का हिस्सा बनता जा रहा है, लोगों को अहसान के टुकड़ों से ज्यादा तरक्की के उन मौकों की तलाश है, खास तौर पर नौजवान पीढ़ी को. प्रजा अपना राजा नहीं तलाश रही, बल्कि उसे अपनी जिंदगी, दुनिया और हालात बेहतर करने में हिस्सेदारी चाहिए. जो सरकारें ऐसा नहीं कर पाएंगी, मौका मिलते ही सबक सिखाने में कौन सा मतदाता चूकेगा.
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  • नकारात्मकता का शोरः चुनावी अभियान जब नकारात्मक और विभाजनकारी होने लगे, तो वे हर बार काम नहीं करते. खास तौर पर तब जब हर बात तथ्य और तर्क की कसौटी पर कसी जाती है. जब हर कोई मोबाइल पर बात कर रहा है और सोशल मीडिया पर अपनी राय रख रहा है. बिहार ने बता दिया कि न वहां गाय ने साथ दिया न पाकिस्तान ने. यह एक स्थाई प्रारूप नहीं हो सकता. नये मुहावरों की तलाश सबके लिए जरूरी है.

इस हफ्ते जब नरेन्द्र मोदी लंदन में होंगे, तो भारत में दिलचस्पी रखने वाले लोग फिर उनकी तरफ देख रहे होंगे, इस बार ज़रा ध्यान से.

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