सुरक्षा, साइकिल ने नीतीश को औरतों का दुलारा बनाया?

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बिहार विधानसभा चुनावों में महागठबंधन को बहुमत हासिल हुआ और माना जा रहा है कि महिलाओं के बीच नीतीश की लोकप्रियता से महागठबंधन को लाभ हुआ.

आंकड़ों से साफ़ होता है कि महिलाओं के बीच नीतीश की लोकप्रियता अन्य किसी भी उम्मीदवार के मुक़ाबले ज़्यादा है.

नीतीश के 10 साल के शासन में क़ानून व्यवस्था में सुधार हुआ है. स्कूली लड़कियों को साइकिल देने की योजना का भी इस लोकप्रियता में बड़ा योगदान है.

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इस बात के सीधे संकेत तो नहीं मिलते कि बिहार विधानसभा चुनावों में ज़्यादातर महिलाओं ने राजद-जदयू-कांग्रेस गठबंधन के पक्ष में वोट दिया.

सर्वेक्षणों से ये ज़रूर स्पष्ट होता है कि महिलाएं वोट तो खूब दे रही हैं, लेकिन उनके वोट भी पुरुष मतदाताओं की तरह बंटे हुए हैं.

इसलिए ये निर्णायक तौर पर कहना मुश्किल है कि महिलाओं ने इस चुनाव में नीतीश को जिताने और पिछले चुनावों में लालू को हराने के लिए वोट डाला. ये केवल धारणा है.

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इन चुनावों में महिलाओं का वोट प्रतिशत अधिक होने में अचंभित होने की बात नहीं है. ऐसा बिहार के विधानसभा चुनावों में पहली बार नहीं हुआ है.

महिला मतदाताओं के लिहाज से 2010 का विधानसभा चुनाव टर्निंग प्वाइंट था, जब महिलाओं का वोट प्रतिशत पुरुषों के मुक़ाबले तीन प्रतिशत बढ़ा.

यही ट्रेंड 2014 के लोकसभा चुनावों में भी था जब महिलाओं का वोट प्रतिशत दो से ढ़ाई प्रतिशत अधिक था.

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हाँ ये ज़रूर है कि 2015 के विधानसभा चुनावों में ये फ़ासला और बढ़ गया और पुरुषों के मुक़ाबले लगभग पाँच प्रतिशत अधिक महिलाओं ने वोट डाला.

महिलाओं के मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने की दो वजहें हैं. पहली ये कि महिलाओं में शिक्षा का स्तर धीरे-धीरे बढ़ रहा है और हमारे सर्वेक्षणों में ये साफ़ पता चलता है कि अब महिलाएं अपना वोट देने का फ़ैसला ख़ुद कर रही हैं.

दस साल पहले ये स्थिति नहीं थी, तब महिलाएं ऐसा कहती थीं कि उन्होंने दूसरे की सलाह पर वोट दिया. इस तरह की महिला मतदाताओं की संख्या कम हुई है जो दूसरों की सलाह पर वोट देती हैं.

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स्वतंत्र रूप से वोट देने का निर्णय लेने के कारण महिलाओं ने चुनावों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया.

दूसरा ये कि पंचायती राज में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण है, ये प्रावधान बिहार में बहुत पहले से चला आ रहा है.

इससे ये परिवर्तन देखने को मिला है कि महिलाएं राजनीतिक दृष्टिकोण से सशक्त हुई हैं.

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पंचायत के लगभग तीन-चार चुनाव हो चुके हैं और अब महिलाएं राजनीतिक रूप से अधिक मज़बूत हुई हैं.

उन्हें इस बात का आभास हुआ है कि वोटरों में उनकी आधी हिस्सेदारी है और उनकी हिस्सेदारी राजनीति में भी होनी चाहिए.

(बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन के साथ बातचीत पर आधारित)

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