सहिष्णुता: 190 बुद्धिजीवियों का पीएम के नाम पत्र

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भारत से जुड़े विषयों पर काम करने वाले 190 विदेशी और भारतीय मूल के बुद्धिजीवियों ने देश में राजनीतिक माहौल, परंपरागत सहिष्णुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नुकसान पहुँचाने की कोशिशों पर चिंता जताई गई है.

इन इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों ने एक खुला पत्र लिखा है और साथ ही इसे भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, विभिन्न राज्यों के मंत्रियों, राज्यपालों, उच्चतम और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों और अन्य न्यायधीशों को भी भेजा गया है.

एमोरी यूनिवर्सिटी के इतिहासकार ज्ञानेंद्र पांडेय के साथ इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में शिकागो यूनिवर्सिटी की वेंडी डॉनिगर, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के होमी भाभा और कैलिफ़ॉर्निया विश्वविद्यालय के लॉरेंस कोहेन भी हैं.

बुद्धिजीवियों ने लिखा है कि नेता ग़ैर ज़िम्मेदाराना बयानों से ये स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं कि भारत अंतत: 800 या हज़ार साल की ग़ुलामी से आज़ाद हो गया है.

और ऐसे बयान दिए जा रहे हैं कि अब हिंदू राष्ट्र का गौरव लौटेगा और इससे लाखों नागरिकों को 'बाहरी' (विदेशी) ठहराकर उनके मन में भय पैदा किया जा रहा है.

पत्र में ये लिखा गया है कि स्थिति तब और दुखद हो जाती है जब प्रधानमंत्री और सत्तासीन दल के नेता इस तरह की आपराधिक हिंसा के ख़िलाफ़ तत्काल मज़बूती से आवाज़ नहीं उठाते हैं.

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विदेश में भारतीय इतिहास और समाज के शोध और शिक्षण से जुड़े इतिहासकारों और समाज विज्ञानियों ने कहा कि वे अपना ये बयान 26 अक्तूबर को इसी मकसद से पत्र लिखने वाले बुद्धिजीवियों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए जारी कर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि भारत में हाल में हुई घटनाओं से कलात्मक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असर पड़ा है और इससे भारत जैसे सहिष्णु और लोकतांत्रिक देश में असहिष्णुता का ख़तरनाक माहौल बनना शुरू हुआ है.

इस पत्र में यह सवाल भी उठाया गया कि एक लोकतांत्रिक और सहिष्णु परंपरा वाले देश में सामाजिक परंपराओं के कथित उल्लंघन के नाम पर किसी को ज़िंदा जला देना या मार देना क्या दर्शाता है.

उन्होंने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, न्यायपालिका से समाज के सभी वर्गों की सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने की गुहार लगाई.

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