हर इक मकां में जला फिर दिया दिवाली का...

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ऐसे वक्त में जब त्यौहार भी नए रंग और नए अंदाज में रंग गए हैं, तब एक नज़र पलटकर उन्हें परंपरा के रंग में देखें तो आनंद दोगुना हो जाता है.

कुछ ऐसा ही किया है 18वीं सदी के मशहूर शायर नज़ीर अकबराबादी ने. उन्होंने शायरी की सामान्य परंपरा से हटकर हिंदू मुसलमान त्यौहारों का एकदम सादी अवामी जबान में निहायत दिलचस्प और खूबसूरत बयान किया है.

इन कविताओं ने अपने दौर की दीपावली की एक ज़िंदा तस्वीर आने वाली तमाम पीढियों के लिए सहेज कर रख दी.

इंसानी हुजूम के साथ इस तस्वीर में घर, बाज़ार, गली-मोहल्ला, हर दरो-दीवार के साथ इस पाक त्यौहार को पूरी शाइस्तगी के साथ मनाता हुआ नज़र आता है.

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हर इक मकां में जला फिर दिया दिवाली का

हर इक तरफ़ को उजाला हुआ दिवाली का

सभी के दिल में समां भा गया दिवाली का

किसी के दिल को मज़ा ख़ुश लगा दिवाली का

अजब बहार का है दिन बना दिवाली का

जहां में यारों अजब तरह का है ये त्यौहार

किसी ने नकद किया और कोई करे है उधार

खिलौने, खीलों, बताशों का गर्म है बाज़ार

हर एक दुकां में चिराग़ों की हो रही है बहार

सभी को फिक्र है अब जा बजा दिवाली का

खिलौने मिट्टी के घर में कोई ले के आता है

चिराग़दान कोई हंड़िया मंगाता है

सिवईं गूंजा व मटरी कोई पकाता है

दिवाली पूजे है हंस-हंस दिये जलाता है

हर एक घर में समां छा गया दिवाली का

जहां में वह जो कहाते हैं सेठ-साहूकार

दोशाला, शाल, ज़री , ताश, बादले की बहार

खिलौने, खीलों, बताशों के लग रहे अंबार

चिराग़ जलते हैं, घर में हो रहा सब गुलज़ार

खिला है सामने इक बाग़ सा दिवाली का

अब ज़रा नज़ीर के नज़र से देखिए मिठाई की दुकान.

मिठाइयों की दुकाने लगा के हलवाई

पुकारते हैं कि लाला दिवाली है आई

बताशे ले कोई बर्फ़ी किसी ने तुलवाई

खिलौने वालों की उनसे ज़्यादा बन आई

फिर ज़रा एक नज़र दिवाली पर जमने वाली जुए की फड़ भी देख लीजिए.

इधर यहां धूम, उधर जोश पर जुए ख़ाने

क़िमारबाज़ (जुआरी) लगे जा बजा से वां आने

अशर्फी, कौड़ी व पैसे-रुपे लगे आने

तमाम जुआरी हुए मालो ज़र के दीवाने

सभों के सर पे चढ़ा भूत सा दिवाली का

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इन सारे हंगामों के बीच नज़ीर बात करते इस सारे उत्सव के सबसे अहम हिस्से की. मतलब पूजा की.

मकान लीप के ठिलिया (गगरी) जो कोरी रखवाई

जला चिराग़ को, कौड़ी वह जल्द झनकाई

असल ज्वारी थे उनमे तो जान सी आई

ख़ुशी से कूद उछल कर पुकारे ‘ओ भाई!’

‘शगुन पहले करो तुम ज़रा दिवाली का’

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नज़ीर की एक ख़ास बात और भी है. उनके यहां दिवाली मात्र राम-सीता की कथा से आगे शुद्ध रूप से अच्छाई पर बुराई की जीत का एक सामाजिक उत्सव है.

एक ऐसा जश्न है जहां हर शख़्स दिल खोलकर अपनी ख़ुशियों का मज़ाहिरा अपने-अपने अंदाज़ में करता है, लेकिन सबके बीच भी ग़ज़ब की समानता है.

सब जगह एक सी ख़ुशी का अहसास होता है. यही बात नज़ीर को भाती और गुदगुदाती है.

नज़ीर की एक और बला की ख़ूबसूरत नज़्म है.

हमें अदाएं दिवाली की ज़ोर भाती हैं

कि लाखों झमकें हर एक घर में जगमगाती हैं

चिराग़ जलते हैं और लोएं झिलमिलाती हैं

मकां-मकां में बहारें ही झमझमाती हैं

खिलौने नाचे हैं तस्वीरें गत बजाती हैं

बताशे हंसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं

गुलाबी बर्फ़ियों के मुंह चमकते फिरते हैं

जलेबियों के भी पहिए ढुलकते फिरते हैं

हर एक दांत से पेड़े अटकते फिरते हैं

इमरती उछले है लड्डू ढुलकते फिरते हैं

खिलौने नाचे हैं तस्वीरें गत बजाती हैं

बताशे हंसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं

मिठाइयों के भरे थाल सब इकट्ठे हैं

तो उन पे क्या ही ख़रीदारों के झपटे हैं

नबात (मिश्री), सेव, शकरकंद, मिश्री गट्टे हैं

तिलंगी नंगी है गट्टों के चट्टे-बट्टे हैं

खिलौने नाचे हैं....

दुकां सब में जो कमतर है और लंडूरी है

तो आज उसमे भी पकती कचौरी पूरी है

कोई जली कोई साबित कोई अधूरी है

कचौरी कच्ची है पूरी की बात पूरी है

खिलौने नाचे हैं....

और चिराग़ों की दुहरी बंध रही कतारें हैं

और हर सू कुमकुमे कंदीलें रंग मारे हैं

हुजूम, भीड़, झमक, शोरो-गुल पुकारे हैं

अजब मज़ाहै, अजब सैर है, अजब बहारें हैं

खिलौने नाचे हैं....

अटारी, छज्जे दरो बाम पर बहाली है

दिवाल एक नहीं लीपने से खाली है

जिधर को देखो उधर रोशनी उजाली है

गरज़ मैं क्या कहूं ईंट ईंट पर दिवाली है

खिलौने नाचे हैं तस्वीरें गत बजाती हैं

बताशे हंसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं

दिवाली के इस ख़ुशनुमा बयान के साथ नज़ीर जुए की आदत पर लानत भेजना भी नहीं भूलते. कहते हैं ;

तुझे ख़बर नहीं खंदी यह लत वह प्यारी है

किसी ज़माने में आगे हुआ जो जुआरी है

तो उसने जोरू की नथ और इज़ार उतारी है

इज़ार क्या है, कि जोरू तलक भी हारी है

सुना है तूने नहीं यह माजरा दिवाली का

और जाते-जाते नज़ीर की यह बात भी सुनते जाएं.

‘नज़ीर’ इतनी जो अब सैर है अहा हा हा

फ़क़त दिवाली की सब सैर है अहा हा हा

निशात ऐशो तरब की सैर है अहा हा हा

जिधर को देखो अजंब सैर है अहा हा हा

खिलौने नाचे हैं तस्वीरें गत बजाती हैं

बताशे हंसते हैं और खीले खिलखिलाती हैं.

दीवाली मुबारक.

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