भाजपा की इस 'बग़ावत' में कितना दम है?

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बिहार विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की हार ने न सिर्फ़ अंधेरे में सांसें गिन रहे विपक्ष में जान फूंक दी है, बल्कि हाशिए पर पड़े पार्टी के बुज़ुर्ग नेताओं को भी मुस्तैदी के साथ खड़ा कर दिया है.

जो बातें दिल्ली के परिणामों के बाद सामने नहीं आई थीं, अब आ रही हैं. ऐसा आभास हो रहा है कि किसी और स्कोर को सेटल करने के लिए बिहार के परिणामों की प्रतीक्षा की जा रही थी.

बिहार से पार्टी सांसदों ने जिस तरह दुख और नाराज़गी ज़ाहिर की है उसे दिल्ली में अपने-अपने घरों में बैठे नेताओं के असंतोष के साथ जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. दोनों के इरादे अलग-अलग हैं.

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Image caption राष्ट्रीय जनता दल, जेडीयू और कांग्रेस के गठबंधन में बिहार में शानदार जीत दर्ज की

तात्कालिक तौर पर ऐसा आभास हो रहा है कि बिहार को लेकर वैसी ही कोई बग़ावत पार्टी में होने जा रही है जैसी कि किसी समय कांग्रेस में इंदिरा गांधी के खिलाफ़ हुई थी और पार्टी दो फाड़ हो गई थी. माना जाना चाहिए कि भाजपा में वैसा कुछ भी नहीं होने जा रहा है.

बिहार के सांसदों की चिंता आगामी लोकसभा चुनावों में अपने भविष्य को लेकर हो सकती है, कि जैसा सफ़ाया विधानसभा में हो गया अगर वैसा ही 2019 में भी हो गया तो वो क्या करेंगे.

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Image caption भापजा के वरिष्ठ नेताओं एलके आडवाणी, एमएम जोशी, यशवंत सिन्हा और शांता कुमार ने पार्टी नेतृत्व की आलोचना की है

दूसरी ओर, वरिष्ठ नेताओं का ग़ुस्सा उनके राजनीतिक पुनर्वास से जुड़ा हुआ हो सकता है.

पूछा जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को निशाना बनाते हुए जिस तरह के हमलों की शुरुआत कर दी गई है, उसका अंतिम नतीजा क्या निकलेगा. शायद कुछ भी नहीं. कोई नतीजा निकल भी नहीं सकता.

कारण कि जो लोग मोदी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं उनके साथ न तो पार्टी का आम कार्यकर्ता दिखाई दे रहा है और न ही ऐसा मानने के कोई कारण हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उसके पीछे है. कम से कम आज तो ऐसी स्थिति नहीं है.

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अभी ये साफ़ होना बाक़ी है कि अचानक से फूट पड़े इन वरिष्ठ नेताओं का असली इरादा अगर यह स्थापित करना है कि दिल्ली और उसके बाद बिहार में हार की ज़िम्मेदारी सबकी 'सामूहिक' है तो फिर निर्णय लेने की प्रक्रिया भी सामूहिक ही होनी चाहिए और पार्टी के भीतर आंतरिक प्रजातंत्र ज़्यादा मज़बूत होना चाहिए तो शायद बात नीचे तक पहुंचेगी.

'बग़ावत' के पीछे इरादा ज़्यादा यही नज़र आ रहा है कि बिहार की हार की आड़ में मोदी और उनकी अन्तरंग टीम को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा किया जा सके.

मोदी अगर हार की ज़िम्मेदारी स्वीकार कर लें तो उन्हें आगे क्या क़दम उठाना चाहिए, यह बात साफ़ होनी चाहिए. एक वक्त था जब पार्टी के अंगुलिओं पर गिनने जितने ही सांसद चुनकर आ सके थे. तब किस नेता को किसने निशाने पर लिया था, उसे भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए.

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Image caption प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार में दर्जनों चुनावी सभाएं कीं

बिहार चुनाव परिणामों को लेकर भाजपा की असली ज़रूरत मोदी और उनकी टीम को हार की ज़िम्मेदारी लेने के लिए बाध्य करने के बजाय प्रधानमंत्री को अपने निर्णयों में अन्य नेताओं की भागीदारी बढ़ाने, अपनी कार्य पद्धति को अधिक पारदर्शी बनाने और वैचारिक रूप से असहमति रखने वालों को भी साथ लेकर चलने की ज़रूरत समझाने की है जैसा प्रयोग नीतीश कुमार ने लालू यादव के सन्दर्भ में बिहार में किया.

ऐसा अगर नहीं हुआ और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी 2014 में मिले बहुमत के हाथी पर सवार रहकर आगे के चुनाव लड़ती रही तो उसका हश्र दिल्ली और बिहार से अलग नहीं होगा.

वो तमाम लोग जो अपनी ज़ंग लग चुकी बंदूकों में गीली बारूद भरकर निशाना साध रहे हैं, उनसे भी पूछा जा सकता है कि दिल्ली और बिहार में हार की ज़िम्मेदारी लेते हुए नरेंद्र मोदी अगर अपना इस्तीफ़ा पेश कर देते हैं तो उनके स्थान पर किसे नेता बनाया जाना चाहिए.

ज़रूरत इस समय शायद इस बात की है कि नरेंद्र मोदी को अंदर और बाहर से अपने आप को बदलने और देश को उनका बदलाव दिखाई देना चाहिए. पर सवाल ये है कि प्रधानमंत्री ऐसा करना चाहेंगे भी कि नहीं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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