पौराणिक पात्रों को मंच पर लाते कलामंडलम अमलजीत

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कथकली कलाकार कलामंडलम अमलजीत का जन्म केरल के अल्लेपी में पारंपरिक परिवार में हुआ.

12 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने दादा चम्पकुलम् पाछू पिल्लै से कथकली नृत्य का प्रशिक्षण लेना शुरू किया.

इसके बाद अमलजीत ने केरल कलामंडलम से कथकली में 6 साल का डिप्लोमा व दो साल का पोस्ट डिप्लोमा किया.

2000 में उन्होंने दिल्ली के इंटरनेशनल सेंटर फॉर कथकली में बतौर शिक्षक व कलाकार प्रशिक्षण देना शुरू किया.

उन्होंने कई राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय मंचों पर रामायण व महाभारत के करदारों के अलावा शेक्सपियर का 'ऑथेलो एंड मैकबेथ', नाइजीरिया का नाटक 'सकारा' व फ़िनलैंड के लोकसाहित्य से 'कलेवाला' आदि का कथकली के ज़रिए मंचन किया है.

2010 में अमलजीत को संगीत नाटक अकादमी, दिल्ली द्वारा 'उस्ताद बिस्मिल्लाह खां' पुरस्कार, 2011 में डॉ गुरु गोपीनाथ ट्रस्ट (कोट्टयम ) द्वारा 'नटना प्रवीण' पुरुस्कार आदि प्राप्त हुए.

अमलजीत कोलकाता में अपने परिवार के साथ रहते हैं और कथकली का प्रशिक्षण भी देते हैं.

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Image caption कथकली नृत्य केरल प्रदेश का शास्त्रीय नृत्य नाटक है. कथकली का अर्थ है 'एक कथा का नाटक'.
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Image caption इस नृत्य शैली में अभिनेता रामायण व महाभारत से लिए गए चरित्रों का अभिनय करते हैं.
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Image caption मान्यता है 17 वीं शताब्दी में कोट्टारकरा तंपुरान राजा ने जिस रामनाट्टम का अविष्कार किया था उसी के विकसित रूप को आगे चलकर कथकली कहा गया. कथकली को आर्य और द्रविड़ सभ्यता के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है.
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Image caption कथकली अभिनय, नृत्य और संगीत से बनी सम्पूर्ण कला है.
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Image caption कथकली के हर पात्र की अपनी वेश-भूषा और शृंगार होता है. उनकी वेश-भूषा के आधार पर ही पात्र को पहचाना जाता है.
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Image caption कथकली का शृंगार पाँच भागों में बंटा होता है, पच्चा (हरा), कत्ति (छुरी), करी (काला), दाढ़ी और मिनुक्कु (मुलायम, शोभायुक्त). शृंगार में इस्तेमाल होनेवाले रंग प्राकृतिक होते हैं.
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Image caption कथकली में छोटे-छोटे भेदों को 'चिट्टकल' कहते हैं. नवरसों की नाट्य प्रस्तुति कथकली की विशेषता है.
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Image caption कथकली में दो गायक होते हैं. पहले एक गायक गाता है दूसरा उसको दोहराता है. पहले गायक को 'पोन्नानी' और दूसरे गायक को 'शिंकटी' कहते हैं.
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Image caption माना जाता है सोपान संगीत से कथकली संगीत का जन्म हुआ है. कर्णाटक संगीत व गीत गोविन्द का भी कथकली संगीत पर प्रभाव है. कथकली का रंगमंच जमीन से उठा हुआ चौकोर तख़्त होता है, इसे 'रंगवेदी' या 'कलियरंगु' कहते हैं. दीप जलाकर प्रत्येक पात्र प्रार्थना करता है उसके बाद नाटक का मंचन किया जाता है. धनाशी ' नाम के अनुष्ठान के साथ कथकली का समापन होता है.

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