ब्रिटेन क्यों नहीं जाना चाहते भारतीय छात्र?

भारतीय स्टूडेंट्स

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया ब्रिटेन यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच सुरक्षा, सहयोग और निवेश समेत कई मुद्दों पर बातचीत हुई.

लेकिन शिक्षा एक ऐसा क्षेत्र है जहां दोनों देशों के बीच सहयोग की काफी संभावनाएं मौजूद हैं.

हर साल भारत से हज़ारों छात्र ब्रिटेन में पढ़ने के लिए जाते हैं. लेकिन हाल के कुछ सालों में यह संख्या तेज़ी से घटी है.

उच्च शिक्षा के ब्रिटेन का रुख़ करने वाले छात्रों की संख्या में पिछले चार सालों में 50 प्रतिशत से भी ज़्यादा की कमी आई है.

साल 2009-10 में भारत से ब्रिटेन पहुंचने वाले छात्रों की संख्या 23,120 थी, जबकि 2013-14 में यह संख्या आधी से भी ज़्यादा गिर कर 11,270 रह गई.

संख्या में आई कमी के अलावा, जिन लोगों ने यहां से पढ़ाई की है वो भी बहुत ख़ुश नहीं हैं.

फ़िजियोथेरेपिस्ट श्रद्धा पारेख कहती हैं, “बहुत कम समय के लिए स्टूडेंट वीज़ा मिलने के कारण मुझे वापस आना पड़ा. जब मैंने मुंबई में अधिकांश अस्पतालों में नौकरी के लिए आवेदन किया तो लगभग हर इंटरव्यू में मेरे अनुभव के बारे में पूछा जाता था.”

असल में पोस्ट स्टडी वीज़ा के नियम ब्रिटेन में काफ़ी कड़े हैं और अध्ययन के बाद वहां रुकने के लिए अधिकतम चार महीने का ही वीज़ा दिया जाता है.

वहीं अन्य देशों में पोस्ट स्टडी वीज़ा की मियाद अधिक होती है, मसलन अमरीका में एक से दो वर्ष का वीज़ा दिया जाता है.

ऑस्ट्रेलिया में यह वीज़ा दो साल के लिए और कनाडा में तीन साल के लिए दिया जाता है.

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भारतीय छात्रों में उच्च शिक्षा के लिए सबसे पसंदीदा जगह अमरीका के बाद ब्रिटेन ही है. इसकी दो बड़ी वजहें हैं, एक तो शिक्षा का उच्च स्तर और दूसरे अंग्रेज़ी भाषा में पढ़ाई.

अंग्रेज़ी की वजह से भारतीय छात्रों को ब्रिटेन में पढ़ने में कोई ख़ास मुश्किल नहीं आती.

लेकिन वीज़ा नीति में बदलाव के कारण अब ये धारणा बनती जा रही है कि उच्च शिक्षा के लिए ब्रिटेन जाना कोई बढ़िया विकल्प नहीं है.

ब्रिटिश यूनिवर्सिटी मिनिस्टर जो जॉन्सन कहते हैं, “मैं बहुत निश्चित होकर नहीं बता सकता कि भारतीय छात्रों की संख्या क्यों कम हो रही है. लेकिन मैं समझता हूँ कि हमारी नीतियों को लेकर किसी क़िस्म की ग़लतफ़हमी हो सकती है. मैं ये बताना चाहता हूँ कि भारतीय छात्रों की संख्या को लेकर कोई लिमिट नहीं है.”

पिछले महीने अभिनेता शाहरुख़ ख़ान को एडिनबरा यूनिवर्सिटी ने डॉक्ट्रेट की उपाधि दी थी.

हो सकता है कि इससे भारतीय छात्रों का ध्यान उधर गया हो.

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