जिसे दुनिया ने कहा, सिनेमा का नगीना

'सईद जाफ़री : अंतरराष्ट्रीय सिनेमा का एक नगीना' ब्रिटेन के एक जाने-माने अख़बार में सईद जाफ़री के बारे में छपी ये हेडलाइन ख़ुद ब ख़ुद बयां करती है कि भारत ही नहीं बल्कि देश के बाहर भी उनका क़द कितना ऊँचा था.

भारत में पंजाब के एक मात्र मुस्लिम बहुल इलाक़े मलेरकोटला में 1929 में सईद जाफ़री का जन्म हुआ. बचपन से ही वे फ़िल्मों के शौकीन थे और बड़े-बड़े एक्टरों की नकल किया करते थे.

यूँ ही नकल करते-करते वो ऑल इंडिया रेडियो तक जा पहुँचे और फिर 1951 में अंग्रेज़ी भाषा का अपना थिएटर ग्रुप शुरू कर डाला. थिएटर उन्हें अमरीका और लंदन ले गया, जहाँ उन्हें भारत के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर थिएटर और फ़िल्में करने का मौका मिला.

मुल्क़ के हालात से अंजान शतरंज के खेल में डूबे नवाबी अंदाज़ वाले रोशन लाल का रोल हो, रिचर्ड एटनबरो की गांधी में पटेल का किरदार, ए पैसेज टू इंडिया का हमिदुल्लाह या राम तेरी गंगा मैली का कुंज बिहारी, सईद जाफ़री ने अपने सरल, लेकिन जानदार अभिनय से हर रोल में जान फूँक दी.

इमेज कॉपीरइट SHAHEEN AGGARWAL FB PAGE

अमरीका में काम करने के बाद ब्रिटेन में अपने संघर्ष के दिनों में वो बीबीसी की उर्दू सेवा में काम किया करते थे. पैसे की ज़रूरत को पूरा करने के लिए लंदन के मशहूर और महंगे स्टोर हैरॉड्स में सेल्समैन का काम भी किया.

बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था, "मैं इंग्रिड बर्गमैन के साथ काम कर चुका था, जो बहुत बड़ी अभिनेत्री थीं. एक दिन जब मैं हैरॉड्स में बतौर सेल्समैन काम कर रहा था. जब मैंने उन्हें स्टोर में देखा तो मेरे ज़हन में ख्याल आया कि मुझे यहाँ देखकर उनको मेरे लिए बुरा न लगे. मैंने तुरंत अपनी टाई और जैकेट पहनी और जताया जैसे मैं कुछ खरीदने आया हूँ. उन्होंने मुझसे कहा कि अरे वाह तुम भी खरीददारी करने आए हो जबकि मेरे जेब में कोई दो पाउंड ही थे."

बाद में वो इंग्लैंड में ही रहने लगे और वहाँ टीवी और फ़िल्मों में काफ़ी काम किया.

आज भले ही कई भारतीय सितारे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम कर चुके हों लेकिन सईद जाफ़री उन पहले भारतीय अभिनेताओं में से थे जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई.

डेविड लीन, जेम्स आईवरी, माइकल केन, रिचर्ड एटनबरो, सत्यजीत रे जैसी नाम हस्तियों के साथ उन्होंने काम किया. वे इंग्लैंड के पहले एशियाई एक्टर बने जिन्हें महारानी की ओर से ऑर्डर ऑफ़ द ब्रिटिश अंपायर का सम्मान मिला, जो वहाँ के उच्च नागरिक सम्मानों में से एक है.

हालांकि उनकी निजी जिंदगी उथल-पुथल वाली रही. 50 के दशक में अपने थिएटर ग्रुप में काम के दौरान उन्हें मधुर बहादुर नाम की अभिनेत्री से प्यार हुआ. दोनों ने जल्द ही शादी कर ली और अमरीका में स्कॉलरशिप मिलने के बाद वे न्यूयॉर्क चले गए.

इमेज कॉपीरइट SHAHEEN AGGARWAL FB PAGE

लेकिन ये रिश्ता ज़्यादा दिन टिक न सका. सईद पर बेवफ़ाई के आरोप लगे. बीबीसी को 1999 में दिए इंटरव्यू में सईद जाफ़री ने कहा था, हमारी शादी ताश के पत्तों की तरह थी. हवा का पहला तेज़ झोंका आया और वो ढह गई.

तलाक़ के बाद ही वो इंग्लैंड आकर बस गए और बीच-बीच में हिंदी फ़िल्मों में भी काम करते रहे. ब्रिटेन में आज भी लोग टीवी और फ़िल्मों में उनके काम को चाव से याद करते हैं. 1986 में माई ब्यूटीफुल लॉन्डरेट के लिए उन्हें बाफ़्टा पुरस्कार में नामांकन मिला जो किसी एशियाई एक्टर के लिए उस समय बड़ी बात थी.

भारत की बात करें तो मासूम, आईना, जुदाई, दिल, राम लखन, चश्मे बद्दूर, मंडी और हिना जैसी फ़िल्मों में उन्होंने बेहतरीन अभिनय किया.

वे ख़ुद को 80-85 साल का जवान बताते थे और 86 साल की उम्र में इस जवान ने आख़िरकर दुनिया को अलविदा कह दिया...

शतरंज के इस खिलाड़ी ने ज़िंदगी की बिसात पर जो चालें चलीं वो लोगों को बरसों-बरस याद रहेंगी.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार