#100Women बेख़ौफ़ आंदोलनकारी औरतें (भाग-5)

#100Women में बीबीसी हिंदी ने चुनी हैं भारत की वो 100 दमदार औरतें, जिन्होंने नियम बदले, नए रास्ते खोले और मिसाल कायम कर दी, नहीं तो कम से कम समाज को झकझोरा तो है ही.

इस सिरीज़ में बात उन महिलाओं की जिन्होंने अपने आसपास की दुनिया को बदल दिया.

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  • 100 Women: Activist

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  • बीरूबाला राभा

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    एक महिला की कोशिशों के चलते सरकार को कानून बनाना पड़ जाए, ऐसा कम ही होता है लेकिन असम की 62 साल की बीरूबाला की कोशिशों को नतीजा है कि वहां की विधानसभा ने पिछले दिनों डायन हत्या निषेध विधेयक पारित किया है.

    बीरूबाला, डायन बताकर मार देने वाले अंधविश्वास के खिलाफ सालों से लड़ रहीं हैं और अब तक 42 से अधिक महिलाओं की जान को बचा चुकी हैं. इसके लिए उन्हें कई सम्मान भी दिए जा चुके हैं.

    1996 में जब उनके बेटे को मलेरिया हुआ तो गांव के लोगों की बताई 'देवधोनी' ने इलाज करने की बजाए कहा कि बेटा मर जाएगा. बेटा ज़िंदा रहा औऱ तभी से बीरूबाला ने अंधविश्वास के ख़िलाफ़ लड़ाई शुरू की.

  • दयामणि बारला

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    49 साल की दयामणि बारला झारखंड में आदिवासियों के संघर्ष का चेहरा हैं. उन्होंने कोयल कारो बांध बनाने के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई. अपने एक साथी के साथ बैंक लोन लेकर 'जन हक़ पत्रिका' का प्रकाशन शुरू किया ताकि आदीवासी परिपेक्ष से ख़बरें लिखी जा सकें.

    दयामणि बारला का सफर इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि अपनी पढ़ाई के लिए उन्होंने दूसरे के घरों में काम किया, चाय भी बेची. इसी के बूते पर रांची विश्वविद्यालय से मास्टर्स की पढ़ाई की और अब ‘प्रभात ख़बर’और अन्य बड़े अख़बारों के लिए लिखती हैं.

    साल 2014 में उन्होंने आम आदमी पार्टी की टिकट पर आम चुनाव लड़ा पर हार गईं. उन्हें पत्रकारिता के कई सम्मान भी मिल चुके हैं.

  • इरोम शर्मिला

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    28 वर्ष की उम्र में इरोम शर्मिला ने देश के कई हिस्सों में लागू सैन्य सशस्त्र बल अधिकार कानून (आफ़्सपा) को हटाने की मांग के साथ आमरण अनशन शुरू किया. 15 साल बाद वो अनशन अब भी जारी है.

    इरोम पर आत्महत्या की कोशिश का आरोप लगाकर उन्हें मणिपुर के एक अस्पताल में न्यायिक हिरासत में रखा गया है और जबरन नाक के ज़रिए आहार दिया जा रहा है. आफ़्सपा कानून को मणिपुर के कुछ इलाकों से हटाया गया है पर कई जगह ये अभी भी कायम है.

    इरोम के मुताबिक इस कानून की आड़ में कई मासूम लोगों की जान ली जा रही है. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इरोम के साथ हो रहे बर्ताव को मानवता के ख़िलाफ़ बताया है.

  • परवीना आहंगर

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    भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर की 58 साल साल की परवीना आहंगर ने बीते दो दशक के दौरान ऐसे सैकड़ों लोगों को एकजुट किया है जिनके परिजन सालों से लापता हैं.

    'एसोसिएशन ऑफ़ पैरेंट्स ऑफ़ डिसएपियर्ड पर्सन्स (एपीडीपी)' संस्था बनाने वाली परवीना इन लोगों के साथ हर महीने की दस तारीख को श्रीनगर के प्रताप पार्क में खामोशी से प्रदर्शन करती हैं.

    महज पांचवीं तक पढ़ीं परवीना के लिए 18 अगस्त, 1990 की रात काली रात बनकर आई. परवीना का आरोप है कि सेना के जवान 17 साल के उनके बेटे जावेद अहमद आहंगर को उठा कर ले गई और अब तक उनके बेटे का पता नहीं चल पाया है.

    परवीना का नाम 2005 में नोबेल शांति पुरस्कार के लिए शार्ट लिस्ट हो चुका है.

  • रोमा दास

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    दिल्ली में पली-बढ़ी रोमा दास दो दशकों से उत्तर प्रदेश के सोनभद्र इलाके में जनजातीय समुदाय, महिलाओं, दलितों और अन्य अल्पसंख्यकों के हितों के लिए काम कर रही हैं.

    उन्हें इस दौरान कई बार दमन का शिकार होना पड़ा है. कन्हार नदी पर बांध का विरोध करने के चलते 30 जून, 2015 में स्थानीय पुलिस ने उन्हें कई आरोप लगाकर जेल में डाल दिया. चार महीने जेल में रहने के बाद जिला अदालत ने रोमा को ज़मानत पर रिहा करने का आदेश दिया.

    इससे पहले, 2007 में वह राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, एनएसए, के तहत उत्तर प्रदेश में गिरफ़्तार होने वाली पहली महिला थीं. रोमा दास आल इंडिया यूनियन ऑफ़ फारेस्ट वर्किंग पीपुल की उप महासचिव भी हैं.

  • सोनी सोरी

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    बस्तर के समेली गांव की 40 साल की सोनी सोरी सितंबर 2011 में उस समय चर्चा में आईं, जब पुलिस ने आरोप लगाया कि वह एस्सार कंपनी से माओवादियों के लिए लेवी वसूलने का काम कर रही हैं.

    एक सरकारी स्कूल की शिक्षिका सोनी सोरी पर आठ मुकदमे दर्ज किये गये. दो साल बाद उन्हें छह मामलों में बाइज्जत बरी किया गया और दो में ज़मानत दे दी गई.

    कैद के दौरान सोनी सोरी ने पुलिस पर यौन प्रताड़ना का आरोप लगाया और भूख हड़ताल भी की. जेल से बाहर आने के बाद अब वो महिला कैदियों के अधिकारों के लिए लड़ रही हैं.

    साल 2014 में सोनी सोरी ने आम आदमी पार्टी की टिकट पर आम चुनाव लड़ा पर हार गईं.

  • सुधा वर्गीज

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    1965 में 15 साल की सुधा वर्गीज केरल से बिहार पहुंचीं. उन्होंने सुना था कि बिहार बहुत गरीब राज्य है और यहां मुसहर समाज के लोग चूहा पकड़कर खाते हैं.

    वो बस इन लोगों को देखने आई थीं लेकिन इनकी गरीबी ने उनके जीवन को बदल दिया. सुधा वर्गीज तब से इस महादलित समाज के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने की कोशिशों में लगी हैं. उन्होंने विवाह भी नहीं किया.

    दानापुर के आसपास ये साइकिल वाली दीदी के तौर पर मशहूर हैं. 4 से 7 साल के मुसहर बच्चों के लिए 10 आनंद शिक्षा केंद्र, 250 स्वयं सहायता समूह और 75 किशोरी संगठन बना चुकीं सुधा को 2006 में पद्मश्री मिल चुका है.

  • तीस्ता सीतलवाड़

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    तीस्ता सीतलवाड़ आतंकवाद और धार्मिक दंगों के पीड़ितों को क़ानूनी मदद देनेवाली संस्था, ‘सिटिज़न्स फॉर जस्टिस एंड पीस’ (सीजेपी) की सह-संस्थापक हैं.

    साल 2002 में गुजरात में हुए दंगों के बाद विजय तेंदुल्कर समेत कई मुंबईवासियों के साथ बनाई सीजेपी की बदौलत 126 मामलों में दोषियों को सज़ा मिली, 68 मामलों में उम्र कैद की सज़ा हुई है.

    करीयर की शुरुआत में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ जैसे अख़बारों के साथ काम करने के बाद तीस्ता ने 1993 में अपने पति के साथ मासिक पत्रिका, ‘कम्यूनलिज़म कॉमबैट’ शुरू की ताकि वो स्वतंत्र सोच से लिख सकें.

    1997 से तीस्ता ने ‘खोज’ अभियान की शुरुआत की जिसका उद्देश्य इतिहास और समाज ज्ञान की बेहतर समझ बनाने के लिए वैकल्पिक पाठ्यक्रम बनाना है. तीस्ता को 2007 में पद्म श्री से नवाज़ा गया.

  • ज़किया सोमन

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    साल 2007 में दिल्ली में एक कॉन्फ्रेंस में करीब 500 मुस्लिम महिलाओं ने अपने नागरिक और क़ुरानी अधिकारों की मांग रखी, तो उसी का नेतृत्व करते हुए ज़किया सोमन और डॉ. नूरजहां सफ़िया नियाज़ ने मिलकर ‘भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन’ की शुरुआत की.

    ज़किया सोमन और डॉ. नूर जहां सफिया निआज़ ने कौमी दंगों, घरेलू हिंसा और महिलाओं के साथ सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज़ बुलंद की.

    आंदोलन में इस्लाम में महिलाओं के लिए बराबरी के अधिकार, औरतों की शरीअत अदालतें, ज़ुबानी तलाक के खिलाफ राष्ट्रव्यापी मुहिम और भारत में मुस्लिम पारिवारिक कानून के विधिकरण के लिए कुरान पर आधारित कानून का ड्राफ्ट बनाया गया.

    भारत के 13 राज्यों में फैले इस आंदोलन में अब 70,000 से ज़्यादा महिलाएं हैं.

  • ज़मरोदा हबीब

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    भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर की 55 साल की अंजुम ज़मरोदा हबीब तीन दशक से सक्रिय अलगाववादी नेता हैं.

    2003 में उन्हें दिल्ली पुलिस ने पाकिस्तान से पैसे लेने के आरोप में गिरफ़्तार किया था. पांच साल तक तिहाड़ में रहीं ज़मरोदा ने 'कैदी नंबर 100' नाम से अपने अनुभवों को लिखा.

    कश्मीर में हिंसा के चलते विधवा हुई महिलाओं के बीच काम करने वाली ज़मरोदा जेलों में बंद राजनीतिक कैदियों की रिहाई की मुहिम भी चलाती हैं.

    वह कई मानवाधिकार संगठनों से भी जुड़ी हुई हैं.

    ज़मरोदाह ने अब तक शादी नहीं की है. इसकी वजह बताती हुईं ज़मरोदा कहती हैं कि कोई ऐसा मर्द नहीं मिला जो एक महिला अलगाववादी नेता से शादी करता.

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