'मैं जो कुछ भी हूं फ़ेसबुक की वजह से हूँ'

मैं जो कुछ भी हूँ फ़ेसबुक की वजह से हूँ.. ये बात सुनने में अटपटी लग सकती है लेकिन इन महिलाओं के लिए फ़ेसबुक का कुछ ऐसा ही महत्व है.

ये महिलाएं भारत के छोटे शहरों से आती हैं और पिछले लगभग पांच सालों में उनके जीवन में बड़े परिवर्तन आए हैं जिसके लिए वो फ़ेसबुक को ज़िम्मेदार मानती हैं.

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आइए मिलते हैं ऐसी तीन महिलाओं से.

कुमुद सिंह बिहार के पटना में रहती हैं और मैथिली भाषा में 'ईसमाद' नाम का ई-पेपर चलाती हैं. ये मैथिली भाषा में पहला ईपेपर है. कुमुद का संबंध दरभंगा राजघराने से है और शादी के बाद ही उनका आम लोगों से मिलना जुलना शुरू हुआ.

कुमुद ने औपचारिक स्कूली पढ़ाई नहीं की है. शादी के बाद उन्होंने ओपन स्कूल से दसवीं पास की. उनकी बेटी जब स्कूल जाने लगी तो उन्होंने कंप्यूटर सीखा और ई-पेपर की शुरुआत हुई.

वो फ़ोन पर हंसते हुए कहती हैं, "फ़ेसबुक नहीं होता तो मैं एक अच्छी मां होती, गृहिणी होती, मैगज़ीन निकाल रही होती. फ़ेसबुक ने मुझे एक आवाज़ दी अपनी बातें रखने की. मैंने खूब लड़ाइयां की हैं लोगों से. बहस की है. डांटा है. पलट कर गालियां दी हैं. अब लोग मुझे पहचानते हैं मेरे फ़ेसबुक पोस्टों की वजह से."

फ़ेसबुक पर कुमुद सिंह की पहचान एक ऐसी महिला के रूप में है जो बिहार की राजनीति, दरभंगा राजघराने और सामाजिक मुद्दों पर बेबाक राय रखती हैं, बेकार की टिप्पणी करने वालों को डांट देती हैं और अपने तर्कों के लिए ऑनलाइन लिंक्स का खूब इस्तेमाल करती हैं.

वो कहती हैं, "ऐसा नहीं है कि सब एकदम अच्छा ही था. फ़ेसबुक पर लड़ती मैं हूँ और तनाव परिवार को हो जाता है. मेरी बेटी को बहुत चिंता होती है. लेकिन फ़ेसबुक ने मुझे लड़ना झगड़ना सिखा दिया. मज़बूत कर दिया मुझे सामाजिक रुप से. मुझे पहचान मिली है फ़ेसबुक से. कुमुद को कुमुद सिंह फ़ेसबुक ने ही बनाया."

एक तरफ कुमुद की छवि तेज़ तर्रार महिला की है वहीं प्रवेश सोनी मृदुभाषी कवयित्री हैं.

प्रवेश सोनी राजस्थान के कोटा की रहने वाली हैं और उन्होंने भी इंटरनेट बच्चों से ही सीखा है. पिछले दिनों उनकी कविताओं को 'स्त्री होकर सवाल करती है' नामक पुस्तक में शामिल भी किया गया.

वो कहती हैं, "मैं बस ग्यारहवीं तक पढ़ी हूँ. शादी हो गई तो पढ़ना छूटा...लेकिन पढ़ने की इच्छा नहीं छूटी. जब बच्चे बड़े हुए तो इंटरनेट सिखाया उन्होंने. पहले मैं ऑरकुट पर थी फिर फ़ेसबुक पर आई. कविताएं डायरी में थीं..फिर धीरे-धीरे फ़ेसबुक पर लोगों ने हौसला बढ़ाया तो मैं लिखने लगी."

प्रवेश कहती हैं कि उन्होंने भी बुरे लोगों का सामना किया है फ़ेसबुक पर. वो कहती हैं, "बुरे लोगों को इग्नोर कर के चलना चाहिए. मुझे आज लोग मेरे नाम से जानते हैं. इसकी वजह सिर्फ फ़ेसबुक है. मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं. तब मैं यहां आई और जितना यहां सीखा उतना उम्र के किसी दौर में नहीं सीख पाई."

प्रवेश के पति बिजनेसमैन हैं और आने वाले दिनों में प्रवेश की पुस्तक भी छपने वाली है.

वो एक मज़ेदार बात कहती हैं, "बहुत सारे लोग तो मेरे लिखे की तारीफ़ सिर्फ महिला होने के कारण कर देते हैं लेकिन मुझे पता है कि कौन वाकई तारीफ़ कर रहा है. ये अनुभव होते-होते हुआ है."

वो कहती हैं, "अगर फ़ेसबुक नहीं होता तो मैं शायद अपने पड़ोसियों से ज्यादा गप्पे मार रही होती. टीवी देख रही होती लेकिन फ़ेसबुक है तो एक किताब में छपी हूँ. शायद किताब भी छपे. ऐसी उम्मीद तो करती ही हूँ."

प्रवेश ने ख़ुद से पेंटिंग सीखी है और उन्होंने जब फ़ेसबुक पर इन्हें शेयर किया तो कई प्रकाशकों ने इन पेंटिंग्स को किताबों का कवर पेज भी बनाया है.

कुमुद और प्रवेश जैसी कई महिलाएं हैं जिनका जीवन फ़ेसबुक के कारण बदल रहा है.

अनुशक्ति सिंह अपने जीवन के कठिन दौर से गुज़र रही हैं और वो कहती हैं कि फ़ेसबुक ने उन्हें बहुत संबल दिया है.

अनुशक्ति सिंह मास कॉम की पढ़ाई के बाद 'इंडिया मार्ट' में काम करती थीं लेकिन शादी के बाद सब कुछ बदल गया.

वो बताती हैं, "मेरी शादी अरेंज्ड मैरेज के तहत एक आर्मीमैन से हुई थी. शादी के बाद बंधन हो गए. मुझे घर से बाहर जाने की भी परमिशन नहीं थी. मेरा अस्तित्व घर में काम करने वाली बहू जैसा हो गया था. मैं फ़ेसबुक पर थी लेकिन 2015 मार्च में मुझे फ़ेसबुक पर ही एक दोस्त ने कहा कि मैं ब्लॉग लिखूं."

ब्लॉग लिखते-लिखते अनुशक्ति सिंह का आत्मविश्वास जागा.

वो कहती हैं, "एक नया अखबार है 'गांव कनेक्शन'. मैंने उनके फ़ेसबुक पर ही आवेदन किया कि मैं उनके लिए कुछ लिखना चाहती हूँ. उन्होंने आर्टिकल मांगा और वो आर्टिकल छप गया. इससे मेरा आत्मविश्वास जग गया. मेरे ससुराल में हंगामा हुआ. मेरे ससुरालवालों को मेरा लैपटॉप और फ़ेसबुक पर जाना ही पसंद नहीं आया."

अनुशक्ति बताती हैं कि अगले कुछ महीनों में घर में लड़ाई झगड़े बढ़े और अब वो अपने बच्चे के साथ अलग रह रही हैं.

वो कहती हैं, "फ़ेसबुक ने मुझे ये भरोसा दिया कि मैं अपने पैर पर खड़ी हो सकती हूँ. ऑनलाइन पर मुझे लोगों ने जो सपोर्ट दिया, मेरे लेखन की तारीफ़ कर के....उस बात ने मुझे बल बहुत दिया. पहले लेख के बाद कई जगहों पर लिखने का प्रस्ताव मिला तो मुझे लगा मैं आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो सकती हूँ."

अनुशक्ति सिंह राजनीतिक मुद्दों पर भी लिखती हैं और ऑनलाइन पर गालियां भी झेलती हैं लेकिन वो कहती हैं कि फ़ेसबुक ऐसा माध्यम है जहां एक आदमी टांग खींचता है तो कई और लोग सपोर्ट भी करते हैं.

अब अनुशक्ति फ्रीलांस करती हैं और अपना नया जीवन बसाने की कोशिश में लगी हुई हैं.

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