90 बेटियों की मां

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  • 100Women: Changemaker

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  • अंजली गोपालन

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    भारत में एचआईवी और एड्स संक्रमण के ख़िलाफ़ मुहिम का सशक्त चेहरा हैं अंजली गोपालन.

    उन्होंने एड्स पीड़ितों के बीच काम करने के लिए 1994 में 'नाज़ फाउंडेशन' का गठन किया.

    2000 में उन्होंने एचआईवी से संक्रमित बच्चों की देखरेख के लिए 'नाज़ केयर होम' की स्थापना की. इस केयर होम में मौजूदा समय में पांच से 17 साल की उम्र के 29 बच्चों की देखभाल होती है.

    अंजली ने समलैंगिकता को अपराध ठहराने वाले भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को अदालत में चुनौती दी.

    उनकी कोशिशों के बाद ही 2009 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने धारा 377 को व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन माना. अंजली को देश-विदेश के कई सम्मान मिल चुके हैं.

  • लैशराम ज्ञानेश्वरी

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    मणिपुर में सशस्त्र सुरक्षा बल अधिनियम (आफ़्स्पा) के विरोध में पूरी तरह नग्न हो प्रदर्शन करने वाली महिलाओं में एक हैं लैशराम ज्ञानेश्वरी.

    साल 2004 में एक मणिपुरी महिला थंगजाम मनोरमा के सेना द्वारा कथित बलात्कार और हत्या के बाद ज्ञानेश्वरी के नेतृत्व में, राज्य में सत्ता का केंद्र माने जाने वाले कांगला फोर्ट के सामने, क़रीब 30 महिलाओं ने सेना के अत्याचार के ख़िलाफ़ ये ऐतिहासिक कदम उठाया.

    पिछले सालों में मणिपुर के सात नगरनिगम को आफ़्स्पा कानून के दायरे से हटाया गया है.

    स्कूली दिनों से ही सामाजिक आंदोलनों में हिस्सा लेने वाली ज्ञानेश्वरी 1968-69 में मणिपुर को राज्य का दर्ज़ा देने वाले आंदोलन में भी शरीक हो चुकी हैं. इसके बाद वो राज्य में शराब और नशाखोरी के अभियान से भी जुड़ी रहीं.

  • लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी

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    ट्रांसजेंडर कार्यकर्ता और कलाकार लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी भारत में हिजड़ा समुदाय की आवाज़ बन गई हैं. वह पहली किन्नर हैं जो संयुक्त राष्ट्र में एशिया प्रशांत क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती हैं.

    लक्ष्मी टोरंटो में आयोजित विश्व एड्स सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व भी कर चुकी हैं. किन्नर समुदाय के समर्थन और विकास के लिए वो ‘अस्तित्व’ नाम का संगठन भी चलाती है.

    'मी हिजड़ा, मी लक्ष्मी’ नाम की उनकी आत्मकथा, अंग्रेज़ी, मराठी, गुजराती और अब हिंदी में प्रकाशित की गई है.

    इस आत्मकथा के माध्यम से लक्ष्मी समाज में प्रेम और सम्मान पाना चाहती हैं. लक्ष्मी लोकप्रिय टीवी कार्यक्रम बिग बॉस (सीज़न 5) में भी हिस्सा ले चुकी हैं.

  • लक्ष्मी

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    दिल्ली की लक्ष्मी एसिड अटैक की शिकार महिलाओं के हक की लड़ाई लड़नेवाला जानामाना चेहरा हैं. एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मी लक्ष्मी संगीत की दुनिया में गायक के तौर पर मुकाम बनाना चाहती थी.

    पर एक दिन स्कूल जाते वक्त किसी ने एसिड से हमला किया और लक्ष्मी का 45 फ़ीसदी चेहरा जल गया. कई जटिल ऑपरेशन करवाने के बाद जब लक्ष्मी लौटीं तो संस्था ‘स्टॉप एसिड अटैक्स’ के साथ जुड़ गईं.

    साल 2006 में लक्ष्मी ने एक जनहित याचिका की जिसपर 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुनाते हुए भारत में एसिड की खुली बिक्री पर रोक लगाने और पीड़िताओं के मुफ़्त इलाज़ का आदेश दिया. लक्ष्मी अब एक बच्ची की मां हैं.

  • नलिनी नायक

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    नलिनी नायक बीते तीन दशकों से समुद्रतटीय इलाके में रहने वाले समुदायों के बीच काम कर रही हैं और ‘इंटरनैश्नल कलेक्टिव इन सपोर्ट ऑफ फिशवर्कर्स’ के संस्थापकों में से एक हैं.

    उन्होंने मछुआरे परिवार की महिलाओं के जीवन-स्तर को बेहतर बनाने और छोटे पैमाने पर मछलीपालन के काम तक उनकी पहुंच बनाने के लिए काम किया है. वे केरल में असंगठित क्षेत्र में महिलाओं को एकजुट करने का काम कर रही संस्था ‘सेवा’ की सह-संस्थापिका भी हैं.

    मौजूदा समय में वे ‘सेवा भारत’ की महासचिव हैं. 1989-91 के बीच बतौर अशोका फेलो, नलिनी ने कन्याकुमारी के दो ज़िलों में तटवर्तीय इलाके की वनस्पति और मैंग्रोव के पेड़ों पर काम किया. बैंगलोर में पैदा हुईं नलिनी अब तिरुवनंतपुरम में रहती हैं.

  • नंदिता दास

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    अभिनेत्री और निर्देशिका नंदिता दास की सोच और प्राथमिकताएं उनके काम के चयन से ज़ाहिर होती है. निर्देशक के तौर पर उनकी पहली फ़िल्म, गुजरात दंगों पर आधारित ‘फ़िराक’, को देश विदेश में काफी सराहना मिली थी.

    लैंगिक असमानताओं पर आधारित नाटक, ‘बिटवीन द लाइन्स’, लिखने के साथ नंदिता ने उसमें अभिनय और उसका निर्देशन भी किया.

    सोशल वर्क में मास्टर्स के बाद से ही नंदिता सामाजिक मुद्दों से जुड़ी रही हैं. मसलन, ‘डार्क इज़ ब्यूटीफुल’ अभियान, जो त्वचा के रंग से इंसान की कीमत जोड़ने का विरोध था.

    नंदिता को फ्रांस सरकार की ओर से प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान 'नाइट ऑफ़ ऑर्डर' से नवाज़ा गया है. नंदिता 2005, 2013 में कान फ़िल्म महोत्सव की जूरी सदस्य और 2014 में 'येल वर्ल्ड फैलो' रह चुकी हैं.

  • सबा हाजी

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    33 साल की सबा हाजी भारत प्रशासित कश्मीर के एक दूरस्थ गांव में स्थानीय बच्चों को शिक्षित करने की मुहिम में जुटी हैं. बीते सात सालों में हाजी पब्लिक स्कूल के माध्यम से उन्होंने अपने आसपास के इलाकों में नई उम्मीद जगाई है.

    सबा ने यह सब अपना कॉरपोरेट करियर छोड़कर किया है. दुबई में पली बढ़ी और बेंगलुरु में नौकरी करने के बाद सबा ने अपने गांव के लोगों के बीच काम करने का फ़ैसला लिया. वह ट्विटर पर बेहद लोकप्रिय हैं.

    इसके अलावा सबा तहलका, लाइव मिंट, हिंदुस्तान टाइम्स और सेमिनार जैसे अख़बारों और पत्रिकाओं के लिए लिखती भी हैं. सबा अंतर्राष्ट्रीय मंच ‘टेड-एक्स’ में वक्ता रह चुकी हैं और कई सम्मानों से भी नवाज़ी गई हैं.

  • संदीप कौर

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    पंजाब के अमृतसर की संदीप कौर महिला सशक्तिकरण की जीती जागती मिसाल हैं. बीते 25 साल से वह अनाथ बच्चियों के जीवन को संवारने का काम कर रही हैं.

    फ़िलहाल उनके परिवार में 90 बच्चियां हैं, जिनके खाने पीने से लेकर स्कूल भेजने के काम में संदीप कौर हर सुबह नए उत्साह के साथ जुट जाती हैं.

    एक मारे गए चरमपंथी धरम सिंह कश्तीवाल की पत्नी संदीप कौर कश्तीवाल ने अमृतसर के करीब सुल्तानविंड में 'भाई धरम सिंह ख़ालसा चैरिटेबल ट्रस्ट' की स्थापना की.

    यह ट्रस्ट अभी फ़िलहाल 1,000 से ज़्यादा बच्चियों की शिक्षा का ख़र्चा उठाती है. इनमें से कुछ बीटेक, एलएलबी, एमबीए, एमएससी, एमसीए जैसे पाठ्यक्रम भी कर रही हैं.

  • थिम्माक्का

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    थिम्माक्का की पहचान कर्नाटक में बरगद के सैकड़ों पेड़ लगाने वाली महिला के तौर पर है.

    इनकी उम्र भले 80 साल से ज़्यादा की हो चुकी है लेकिन बेंगलुरु से 80 किलोमीटर दूर कुदुर से लेकर हुलीकल के बीच पांच किलोमीटर लंबे दायरे में थिम्माक्का ने बरगद के पेड़ लगाए हैं.

    थिम्माक्का की कोई संतान नहीं हुई तो उन्होंने अपने पति के साथ इस अभियान की शुरुआत की थी. दोनों मिलकर बरगद के पौधे को अपने बच्चे की तरह बड़ा करने लगे.

    1995 में पहली बार इन दोनों की कोशिशों को स्थानीय मीडिया में चर्चा मिली. अपने पति के मौत के बाद भी थिम्माक्का ने अपना अभियान जारी रखा है.

  • पी विजी

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    जब पी विजी ने देखा कि आंगनवाड़ी, कपड़ा मिलों और गैर सहायता प्राप्त स्कूलों में काम करनेवाली कई महिलाएं दिनभर पानी नहीं पीती थीं, क्योंकि उनके पास शौचालय की कोई सुविधा नहीं थी, तो उन्होंने असंगठित महिलाओं का एक समूह बनाया – पेनकूट.

    तीन साल बाद उन्होंने इसे ट्रेड यूनियन की शक्ल दी. काम की जगह पर सुविधाओं की मांग के साथ बनी अज़ंगाढ़ा मेखला थोएलाली यूनियन ने फिर बेहतर वेतन का मुद्दा भी उठाया.

    इस यूनियन में 85 फ़ीसदी कर्मचारी यानि 6,000 से ज़्यादा महिलाएं हैं. 46 साल की विजी को मुन्नार की महिलाओं की प्रेरणा भी माना जाता है जिन्होंने देश की सबसे बड़ी चाय कंपनी में एक के मालिकों को झुका कर 20 फ़ीसदी बोनस हासिल किया.