18 महीनों में 30 देशों के दौरों से क्या मिला

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अभी ब्रिटेन और टर्की के दौरे से वापस लौटे ही थे कि वो अब शनिवार से मलेशिया और सिंगापुर के दौरे पर जा रहे हैं.

इससे एक बार फिर उनके आलोचक सवाल करेंगे कि बार-बार विदेशी दौरों की ज़रूरत क्यों? उनकी मांग है कि प्रधानमंत्री को देश में रह कर घरेलू समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए.

मलेशिया में वो 13वें आसियान-इंडिया और 10वें पूर्व एशिया शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे. सम्मेलनों के इलावा मलेशिया का दौरा एक द्विपक्षीय यात्रा भी होगी. जबकि सिंगापुर दौरा द्विपक्षीय यात्रा है.

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सत्ता में आने के बाद से अब तक वो 28 देशों का सफर कर चुके हैं. सिंगापुर का पड़ाव 30वां होगा.

उनकी ब्रिटेन यात्रा पर रिपोर्टिंग करने मैं भी वहां गया था. मैंने उनके आलोचकों के सवाल उन प्रवासी भारतीयों के बीच रखे जो मोदी को अपना हीरो मानते हैं.

अधिकतर लोगों के अनुसार प्रधानमंत्री की विदेश यात्राएं ज़रूरी हैं. महाराष्ट्र के एक व्यक्ति बिर्मिंघम की एक मस्जिद से जुड़े हैं. उनके अनुसार प्रधानमंत्री की यात्राओं से वैश्विक समुदाय के बीच देश का क़द ऊंचा हुआ है.

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उसी शहर के एक मंदिर के पुजारी ने कहा कि उनकी यात्राओं से प्रवासी भारतीयों को उनके देश के अंदर बल मिला है, उनका प्रोफ़ाइल बढ़ता है और दूसरी तरफ़ वो भारत से अधिक निकट आते हैं.

प्रवासी भारतीयों के अनुसार नरेंद्र मोदी उनसे जुड़ने के लिए और उनके प्रोफ़ाइल को ऊंचा करने के लिए वेम्बले और मैडिसन स्क्वायर मैदान जैसी शानदार सभाएं करते हैं.

बीते शुक्रवार को लंदन के वेम्बले स्टेडियम के बाहर एक गुजराती प्रवासी ने कहा, "पहले जब भारत के प्रधानमंत्री आते थे तो केवल लंदन में रहने वाले भारतीयों से मिल कर लौट जाते थे. आज पूरे ब्रिटेन से लोग उन्हें सुनने आए हैं. मैं ख़ुद मेनचेस्टर से आया हूँ."

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पिछले 18 महीनों में मोदी की विदेश यात्राओं पर एक निगाह डालें तो प्रवासी भारतीयों से उनके जुड़ने वाला तर्क समझ में आता है.

एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 2014 में विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों ने भारत को 70 अरब डॉलर भेजे. जबकि पिछले साल भारत आने वाली प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की राशि 35 अरब डॉलर थी.

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इसके इलावा भारतीय मूल के लोग जिन देशों से पैसे भेजते हैं उन में 10 सब से अधिक पैसे भेजने वाले देशों में संयुक्त अरब अमीरात, अमरीका, ब्रिटेन और कनाडा शामिल हैं.

प्रधानमंत्री मोदी इन सब देशों का दौरा कर चुके हैं. जहाँ तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का सवाल है तो तीन सब से अधिक निवेश करने वाले देशों में मॉरीशस, सिंगापुर और ब्रिटेन सब से आगे हैं. सिंगापुर की यात्रा के पीछे इस सच को सामने रखना ज़रूरी है.

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भारत सरकार के अनुसार प्रधानमंत्री की यात्राओं के कारण विदेशी निवेश में बढ़ोतरी हुई है. सरकार का दावा है कि 2015 में दुनिया भर में भारत में सब से अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया है.

मोदी ने अपनी यात्राओं के दौरान कई बार कहा है कि प्रवासी भारतीयों से जुड़ने का कारण उनका भारत में निवेश के लिए प्रोत्साहन करना है.

मोदी के समर्थक कहते हैं कि प्रधानमंत्री की विदेशी यात्राओं का मक़सद भारत को निवेश के लिए 'सुधरते माहौल और सुविधाओं' वाले देश के रूप में बेचना है. वो कहते हैं कि प्रधानमंत्री निजी फ़ायदे के लिए विदेशी दौरे नहीं करते हैं बल्कि देश की गरिमा बढ़ाने के लिए ये यात्राएं करते हैं.

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आम धारणा ये है कि वो देश के अंदर अधिक यात्राएं नहीं करते लेकिन पिछले 18 महीनों में वो लगभग सभी राज्यों का दौरा कर चुके हैं. ये बात और है कि उनके कई दौरे चुनावी सभाओं से संबंधित होते हैं.

प्रधानमंत्री के आलोचक कहते हैं कि बस अब बहुत हुआ. अब देश के अंदर रह कर समस्याओं पर ध्यान दें.

पिछले कुछ महीनों में भारत में बढ़ती असहिष्णुता पर रोक लगाने में नाकाम रहने पर उनकी कड़ी आलोचना की गयी है. हालांकि उन्होंने बढ़ती असहिष्णुता पर बातें की हैं.

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ब्रिटेन में भी उन्होंने कहा था कि विविधता भारत की शक्ति है लेकिन उनके आलोचक कहते हैं कि जिस दोषसिद्धि के साथ उन्हें ये बातें करनी चाहिए वो नहीं करते हैं.

आलोचक कहते हैं कि उनकी विदेशी यात्राओं के बावजूद मोदी अपने पड़ोसी देशों से रिश्ते मज़बूत करने में असफल रहे हैं. वो नेपाल दो बार जा चुके हैं.

भूटान, श्रीलंका और बांग्लादेश भी गए हैं लेकिन पड़ोसियों से रिश्ते पहले से अधिक मज़बूत नहीं हुए हैं.

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बल्कि नेपाल के साथ रिश्ते पहले से ख़राब हुए हैं.

नरेंद्र मोदी शनिवार को मलेशिया और सिंगापुर के दौरे जा रहे हैं. उनके आलोचकों को शायद उनकी विदेश यात्राओं पर ऐतराज़ करने का एक और अवसर मिलेगा. हाल में मोदी के एक आलोचक ने चुटकी लेते हुए कहा, "नरेंद्र मोदी देश के पहले एनआरआई प्रधानमंत्री हैं."

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