खांटी राजनेता बनकर उभरे केजरीवाल..?

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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के ट्विटर प्रोफाइल पर उनका सूत्र वाक्य लिखा है, ‘भारत जल्दी बदलेगा.’ आंदोलनकारी नेता से खांटी राजनेता के रूप में उनका तेज़ रूपांतरण उनके सूत्र वाक्य की पुष्टि करता है.

पिछले दो साल में केजरीवाल ने अपनी राजनीति और अपने सहयोगियों को जितनी तेज़ी से बदला है वह उनकी परिवर्तनशील-प्रतिभा का प्रतीक है.

मीडिया कवरेज के मुताबिक पटना में महागठबंधन सरकार के शपथ-समारोह में अरविंद केजरीवाल को बेमन से लालू यादव के गले लगना पड़ा.

व्यावहारिक बात यह है कि केजरीवाल लालू से गले मिले और यह जाहिर करने में कामयाब भी रहे कि चाहते नहीं थे... इस बीच सोशल मीडिया पर केजरीवाल के कुछ पुराने ट्वीट उछाले गए जिनमें उन्होंने लालू की आलोचना की थी. पर उससे फर्क क्या पड़ता है?

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मोदी-विरोधी राजनीति के साथ केजरीवाल ने अब राष्ट्रीय राजनीति की ओर कदम बढ़ाए हैं. बिहार में महागठबंधन की विजय इसका पहला पड़ाव है और पटना में केजरीवाल की उपस्थिति पहला प्रमाण.

केजरीवाल मोदी-विरोधी ताकतों के साथ आगे बढ़ना और शायद उसका नेतृत्व भी करना चाहते हैं. इसीलिए उन्होंने वाराणसी से मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ा था.

केन्द्र से टकराव का नया बिन्दु अब वे दिल्ली जन लोकायुक्त विधेयक को बनाएंगे. उनके कैबिनेट ने हाल में विधेयक के प्रारूप को स्वीकार किया है.

फरवरी 2014 में उनके कैबिनेट ने इसी तरह का विधेयक मंजूर किया था. उसे विधान सभा में रखे जाने के पहले ही उप राज्यपाल ने आपत्ति व्यक्त की थी कि उनसे स्वीकृति नहीं ली गई है. अब भाजपा के सूत्रों का कहना है कि सरकार ने उप राज्यपाल से मंजूरी नहीं ली है.

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आम आदमी पार्टी के सूत्रों का कहना है कि यह विधेयक उत्तराखंड के 2011 के क़ानून जैसा है. उस बिल को तैयार करने में केजरीवाल का हाथ बताया गया था. यह बात केन्द्र सरकार को असमंजस में डालेगी. क्या भाजपा सरकार ऐसे कानून का विरोध करेगी?

उप राज्यपाल की अनुमति के संदर्भ में भी परिस्थितियाँ फरवरी 2014 जैसी हैं. फर्क केवल यह है कि विधानसभा में पार्टी का भारी बहुमत है. बिल पास होने के बाद उप राज्यपाल उसे स्वीकार करें या न करें, वह टकराव का बिन्दु बनेगा.

केजरीवाल की राजनीति भीतरी और बाहरी टकरावों की मदद से बढ़ रही है. कुछ महीने पहले पार्टी के भीतर पहला टकराव इस बात को लेकर हुआ था कि दिल्ली के बाहर दूसरे राज्यों में जाना चाहिए या नहीं.

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प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव के साथ टकराव का एक कारण यह भी था. तब केजरीवाल अपनी ऊर्जा को दिल्ली तक सीमित रखने के पक्षधर थे. पर अब पार्टी 2017 में पंजाब में होने वाले चुनावों के लिए कमर कस रही है.

पंजाब के अलावा पार्टी उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ेगी. दिल्ली सरकार के मंत्री गोपाल राय ने हाल में लखनऊ में कहा कि पंजाब और उत्तर प्रदेश में ‘आप’ गंभीरता और मजबूती से चुनाव लड़ेगी. पार्टी उत्तराखंड के चुनाव मैदान में भी उतर पड़े तो आश्चर्य नहीं.

इसके बाद 2018 में वह राजस्थान विधान सभा चुनाव में भी उतरेगी. पार्टी ने नारा दिया है, ‘भाजपा-कांग्रेस सब शैतान, हम बदलेंगे राजस्थान.’ कुछ दिन पहले दिल्ली से गए वरिष्ठ नेताओं ने जयपुर में कार्यकर्ताओं को ज़मीनी स्तर पर पकड़ बनाने की सलाह दी है.

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पंजाब में कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी ने माना है कि सबसे बड़ा ख़तरा 'आप' से है. 'आप' को यकीन है कि अबकी बार उसकी सरकार बनेगी. पार्टी ने अभियान चलाकर बड़ी संख्या में सदस्य बनाए हैं.

अच्छी स्थिति होने के बावजूद पंजाब में 'आप' को आंतरिक धड़ेबाज़ी से दिक्कत है. पिछले दिनों दो सांसदों को अनुशासनहीनता के आरोप में निलंबित करके पार्टी ने बड़ा जोखिम मोल लिया है.

बहरहाल पार्टी किसी गठबंधन में शामिल नहीं होना चाहती. उसके राज्य संयोजक सुच्चा सिंह छोटेपुर ने हाल में कहा, हम किसी के साथ गठजोड़ नहीं करेंगे. वह भाजपा हो, अकाली दल या कांग्रेस.

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