#100Women मौलिक सोच, नए रास्ते (भाग-6)

  • 25 नवंबर 2015

#100Women में बीबीसी हिंदी ने चुनी हैं भारत की वो 100 दमदार औरतें, जिन्होंने नियम बदले, नए रास्ते खोले और मिसाल कायम कर दी और समाज को झकझोरा है.

इस सिरीज़ में बात उन महिलाओं की जिन्होंने मौलिक और नई सोच से नए रास्ते बनाते हुए कीर्तीमान स्थापित किए.

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  • 100Women: Innovators

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  • अदिति गुप्ता

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    उम्र के साथ सभी लड़कियों को माहवारी के मुश्किल दौर में दाख़िल होना होता है लेकिन समाज में इसको लेकर जागरूकता कम है. ‘नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ़ डिज़ाइन’ से पढ़ाई के दौरान अदिति गुप्ता ने इसी मुद्दे पर शोध किया, जो अब 'मेंस्ट्रूपीडिया' वेबसाइट में तब्दील हो चुका है.

    इसके बाद अदिति ने इस मुद्दे पर जानकारी देने वाली सामग्री तैयार की और उसे कॉमिक्स के अंदाज़ में पेश किया.

    इन कॉमिक्स को लेकर अदिति, मेहसाना, गांधी नगर, अहमदाबाद और रांची के स्कूलों में गईं जहां लड़कियों, उनके अभिभावक और शिक्षकों ने काफ़ी पसंद किया.

    अदिति की तैयार की गई सामग्री का इस्तेमाल उत्तर भारत के पांच राज्यों के स्कूलों में हो रहा है. उन्हें फोर्ब्स इंडिया ने 30 अंडर 30 की सूची में शामिल किया गया है.

  • बानू हरालू

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    दो दशक तक टीवी पत्रकारिता में सक्रिय रहीं बानू हरालू ने अब नागालैंड में वन्य जीव संरक्षण को अपना मिशन बना लिया है.

    नागालैंड के वोखा ज़िले के डोयांग जलाशय में हर साल हज़ारों किलोमीटर का सफर करके हज़ारों बाज पहुंचते हैं. आराम करने के बाद के बाद वे दक्षिण अफ्रीका की ओर रवाना हो जाते हैं. यानी ये बाज 22 हज़ार किलोमीटर की दूरी तय करते हैं.

    2012 से पहले नागालैंड में इन पक्षियों का बड़े पैमाने पर शिकार होता था. लेकिन बानू हरालू ने राज्य के मुख्यमंत्री से लेकर बड़े अधिकारियों का ध्यान इस पहलू की ओर आकर्षित किया.

    उनकी कोशिशों का नतीजा रहा कि नवंबर 2013 के बाद नागालैंड में प्रवासी पक्षियों का शिकार नहीं हुआ.

    अपनी इस मुहिम के लिए बानू ने ‘नागालैंड वाइल्डलाइफ एंड बायोडायवर्सिटी कंजर्वेशन ट्रस्ट’ भी बनाया है.

  • एल्सा मेरी डिसिल्वा

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    नागरिक उड्डयन के क्षेत्र में 20 साल काम करने के बाद एल्सा मेरी डिसिल्वा ने ‘रेड डॉट फाउंडेशन’ की स्थापना की .

    महिलाओं की सुरक्षा पर काम करने के लिए बनाई गई इस संस्था का सबसे अहम् प्रोजेक्ट है ‘सेफ़ सिटी’. इसके तहत लोगों से अलग-अलग जगहों में हुई यौन हिंसा की जानकारी लेकर उसे एक मैप पर डाला जाता है ताकि ये अंदाज़ा लगाया जा सके कि कौन से इलाके सुरक्षित हैं.

    सलोनी मल्होत्रा, सूर्या वेलामूरी और सुप्रीत के. सिंह के साथ मिलकर चलाए जा रहे इस प्रोजेक्ट के तहत एल्सामेरी कॉरपोरेट दफ़्तरों में यौन उत्पीड़न पर जागरूकता फैलाने के लिए वर्कशॉप भी करती है.

    एल्सा मेरी के काम को कई सम्मान मिल चुके हैं. 2015 में उन्हें ‘यूरोपीय एंजेल इन्वेस्टर’ की ओर से साल का ‘फीमेल आंत्रप्रेन्योर’ का सम्मान मिला है.

  • जस्मीन पथेजा

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    बेंगलुरू की जस्मीन पथेजा ने यौन उत्पीड़न और लैंगिक हिंसा के ख़िलाफ़ ग्लोबल समुदाय का ग्रुप तैयार किया है. ‘ब्लैंक न्वाइज़’ नाम के इस ग्रुप में जस्मीन उन लोगों को शामिल करती हैं जिन्होंने अपने आसपास की दुनिया को महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाने में अहम योगदान दिया है.

    इन्हें ‘ऐक्शन हीरोज़’ कहा जाता है. इनमें 16 साल के युवा से लेकर 65 साल के बुज़ुर्ग तक शामिल हैं.

    जस्मीन यौन पीड़िताओं के डर को कम करने, उनका आत्मविश्वास वापस लौटने और सहानुभूति जगाने वाले अलग-अलग थीम पर काम करती हैं.

    पथेजा वीडियो, लाइव एक्शन, साउंड, फोटोग्राफ़ी, इंस्टॉलेशन, टीशर्ट, पोस्टर और ग्रैफिटी का इस्तेमाल करती हैं.

    'टॉक टू मी' प्रोजेक्ट के चलते जस्मीन को 2015 में ऑकलैंड में ‘इंटरनेशनल अवॉर्ड फॉर पब्लिक आर्ट’ से सम्मानित किया गया.

  • जया देवी

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    बिहार के मुंगेर ज़िले की जया देवी, ग्रीन लेडी ऑफ़ बिहार के नाम से मशहूर हैं. जया देवी ने अपने इलाके और उसके आसपास की महिलाओं को एकजुट कर सामूहिक काम करने के तरीके सिखाए.

    इसका असर ये हुआ कि 285 स्वयंसेवी समूह तैयार हो गए और इन लोगों ने बारिश के पानी का संचयन करना सीख लिया.

    इस तरकीब से आसपास की करीब पचास हज़ार हेक्टेयर बंज़र ज़मीन को उपजाऊ कर खेती के लिए तैयार किया गया. 35 साल की जया देवी ने इसके अलावा गांव के लोगों के श्रमदान से पानी के कई टैंक बनवाए.

    जया के मुताबिक आसपास की सुविधाओं को बेहतर करके पलायन को रोका जा सकता है. जया को 2010 में भारत सरकार का ‘नेशनल यूथ सम्मान’ मिल चुका है.

  • मीनाक्षी गुप्ता

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    मीनाक्षी गुप्ता ने 2005 में कॉरपोरेट करियर को त्यागकर अपने पति के साथ गैर सरकारी संगठन ‘गूंज’ को जमाया.

    गूंज वैसे तो जरूरतमंद लोगों के बीच कपड़े पहुंचने का काम करती है, लेकिन संगठन के काम को विस्तार देते हुए मीनाक्षी ने ग्रामीण महिलाओं के लिए माहवारी के वक्त इस्तेमाल करने वाले सस्ते एवं घरेलू पैड्स तैयार करने की योजना में अहम् भूमिका निभाई और उसे वास्तविकता के धरातल पर उतारा.

    गूंज को 2015 को ‘रेमन मैग्सैसे अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया. समाज के गरीब तबकों के बीच काम करने वाली गूंज की टीम के आपसी समन्वय से लेकर अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से संवाद तक का सारा काम मीनाक्षी संभालती हैं.

    इतना ही नहीं मीनाक्षी की कोशिश ग्रामीण भारत की महिलाओं के जीवन में साकारात्मक बदलाव लाने की है.

  • महविश मुश्ताक

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    25 साल की महविश मुश्ताक, एंड्रायड ऐप बनाने वाली जम्मू-कश्मीर की पहली युवा हैं. कंप्यूटर इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद महविश ने दो साल पहले ‘डायल कश्मीर’ ऐप बनाया.

    ये ऐप कश्मीर आने वाले टूरिस्टों के साथ साथ स्थानीय लोगों के लिए भी बेहद उपयोगी साबित हुआ है.

    कश्मीर में किसी भी सरकारी विभाग से लेकर व्यावसायिक उपक्रमों का पता, नंबर और ज़रूरी ईमेल आईडी सब इस ऐप से मिल सकता है. इसके साथ नमाज़ का वक्त, रेलवे समय सारिणी, पिन कोड नंबर और आईएसडी कोड भी ऐप बताता है.

    डायल कश्मीर ऐसा ऐप है जो आपको कश्मीर के बारे में सब कुछ बताता है और आपको सारी सूचनाएं एक ही जगह मिल जाती हैं. इस ऐप की कामयाबी के चलते महविश को कई सम्मान मिले हैं, लेकिन बड़ी बात ये है कि महविश को बड़ी पहचान मिली है.

  • मुमताज़ शेख़

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    मुमताज़ शेख़ ने महाराष्ट्र में सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं के लिए शौचालय की कमी को देखते हुए 'राइट टू पी' अभियान शुरू किया. इस अभियान के चलते 2013 में राज्य सरकार ने शहर में प्रत्येक 20 किलोमीटर के दायरे में महिलाओं के लिए शौचालय बनाने का निर्देश दिया.

    इसके अलावा पांच करोड़ रूपये की लागत से सरकार ने महिलाओं के लिए ख़ास डिज़ाइन किए गए 147 शौचालय बनवाए. मुमताज़ की कोशिशों के चलते उन्हें राज्य सरकार ने 'महाराष्ट्र की बेटी' सम्मान से सम्मानित किया.

    मुमताज़ ने अपने इलाके में घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ संघर्ष करने के लिए 75 स्वयंसेवी समूहों की स्थापित करने में अहम भूमिका अदा की है.

    महिला मंडल फ़ेडरेशन की कार्यकारी अध्यक्ष, 34 साल की मुमताज़ कई गैर सरकारी संगठनों से जुड़ी हुई हैं.

  • संपत पाल

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    उत्तर प्रदेश के बांदा के एक गरीब परिवार में जन्मी संपत पाल केवल पांचवीं तक पढ़ पाईं, 12 साल की उम्र में विवाह हो गया.

    देखते-देखते पांच बच्चों की मां बन गईं लेकिन बुंदेलखंड में महिलाओं के सशक्तिकरण के मुद्दे पर उन्होंने काम करना जारी रखा.

    2006 में उन्होंने 'गुलाबी गैंग' बनाया. गुलाबी साड़ी और लाठी रखने वाली महिलाओं का ये गैंग महिलाओं के हितों की रक्षा करता है. इसके सदस्य महिलाओं की संख्या हज़ारों तक पहुंच गई है.

    संपत पाल पर फ्रांसीसी लेखक एने ब्रेथॉड किताब लिख चुकी हैं, जिसका स्पेनिश, इतालवी और पुर्तगाली में अनुवाद हो चुका है.

    बॉलीवुड में ‘गुलाब गैंग’ के नाम से फ़िल्म और ब्रिटेन में पिंक साड़ी के नाम से डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म बन चुकी है.

  • शुभा मुद्गल

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    मशूहर गायिका शुभा मुद्गल भारत में कलाकारों के काम के लिए कॉपीराइट की आवाज़ उठाने वाली गायिका रहीं हैं.

    उन्होंने अपने पति अनीश प्रधान के साथ मिलकर 2003 में ‘अंडरस्कोर रिकॉर्ड्स’ की स्थापना की जो गैर-फिल्मी गीतों के स्वामित्व और बिक्री के अलावा कलाकार की शर्तों पर उसके सर्वाधिकार सुरक्षित रखता है.

    शुभा मुद्गल भारत में संगीत शिक्षा के कार्यक्रमों से जुड़ीं हैं. इसके अलावा वे ख़्याल, ठुमरी और दादरा जैसे शास्त्रीय संगीत को इंडीपॉप से मिक्स करने का प्रयोग भी करती रही हैं.

    उन्हें साल 2000 में पद्मश्री और 2015 में उत्तर प्रदेश सरकार का 'यश भारती सम्मान' मिल चुका है. (तस्वीर : प्रकाश प्रभु)

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