'हम भूखे थे तब क्या सरकार ने खाना खिलाया?'

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भारत सरकार ने विदेशी जोड़ों के किराए पर कोख लेने के मामले में प्रतिबंध लगाने की मंशा ज़ाहिर की है.

ऐसा प्रस्ताव आने के बाद सरोगेसी की सेवा प्रदान करने वाले क्लिनिकों को नए विदेशी जोड़ों को सेवा नहीं देने के लिए नोटिस भेजा गया है.

गुजरात के आणंद में सरोगेसी केंद्र पर जाकर बीबीसी की योगिता लिमये ने इस फ़ैसले से प्रभावित लोगों के विचार जानने की कोशिश की है.

भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां व्यवसायिक तौर पर सरोगेसी की इजाज़त है. सरोगेसी के व्यवसायिक इस्तेमाल से किसी महिला को दूसरे का बच्चा पैदा करने पर पैसा मिलता है.

भारत कुछ ही दिनों में दुनिया में सरोगेसी का प्रमुख केंद्र बन गया था. हज़ारों विदेशी जोड़े यहां अपने बच्चे की उम्मीद पाले आते रहे हैं.

आणंद के सरोगेसी केंद्र में ज्यादातर महिलाएं विदेशी जोड़ों के बच्चों को अपनी कोख में पाल रही हैं, जिस पर अब सरकार रोक लगाना चाहती है.

27 साल की देवी परमार एक अंग्रेज़ जोड़े के बच्चे की मां बनने वाली हैं. वो एक सरोगेट मां बनने से पहले खेतों में और एक घरेलू कामगार के रूप में काम करती थीं.

उनका कहना है,"इसमें कुछ भी गलत नहीं हैं. मैं सरोगेटे मां बनने की वजह से मिलने वाले पैसे के बिना, अपना घर चलाने के बारे में सोच भी नहीं सकती हूं. यदि ये प्रतिबंध लगता है तो मेरी ज़िंदगी बदल जाएगी."

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आणंद के सबसे मशहूर क्लिनिक में अब भी काफी हलचल है लेकिन सरोगेसी कराने वालों की संख्या में जल्दी ही काफी गिरावट आ सकती है.

क्लिनिक के वेटिंग रूम में भारतीय मूल का एक अमरीकी जोड़ा परेशान नज़र आ रहा था. वो क्लिनिक से जाने के वक्त सिर्फ इतना कह पाए- 'हम हैरान और निराश हैं.'

वो महिला लगभग रुआंसी हो चुकी थीं. उनका कहना था कि वो नहीं जानती कि वे आगे क्या करेंगे.

ब्रिटेन में रहने वाली रेखा पटेल ने सरकार के प्रस्तावित प्रतिबंध के फैसले के ख़िलाफ़ ऑनलाइन याचिका दर्ज की है.

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उन्हें आणंद में एक बेटी की मां बनने का मौका मिला था. अब उनकी बेटी दो साल की हो चुकी है.

वो कहती हैं, "जो लोग वास्तविकता नहीं जानते हैं उनमें हो सकता है कि यह आम धारणा हो कि पश्चिम के अमीर लोग भारत की गरीब महिलाओं की कोख नौ महीने तक अपने बच्चों के लिए इस्तेमाल करते हैं. लेकिन बस बात इतनी नहीं है. "

वो आगे कहती हैं, "यह हमारे लिए अपना परिवार बनाने का आख़िरी मौका था और हमने इसका लाभ उठाया. हमारे जैसे हज़ारों परिवार हैं लेकिन अगर इस पर रोक लगाई गई तो यह वाकई में बहुत बड़ी त्रासदी होगी."

भारत सरोगेसी का एक बड़ा केंद्र बनता जा रहा था तो इसकी वजह यें थी कि यहां आसानी से सरोगेट मां बनने को तैयार औरतें मिल जाती हैं और सस्ती क़ीमत पर अच्छी मेडिकल तकनीक उपलब्ध है.

लेकिन भारत सरकार का मानना है कि गरीब और अनपढ़ महिलाओं का इससे शोषण हो रहा है.

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इंडियन कौंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की डायरेक्टर जनरल डॉक्टर सौम्या स्वामीनाथन का कहना है, "यह बहुत दुखदायी है कि लोग किराए पर कोख देने के लिए इस तरह उतावले हो रहे हैं."

आकांक्षा इनफ़र्टिलिटी क्लिनिक की डॉक्टर नयना पटेल का कहना है कि ऐसी औरतों का अच्छी तरह से ध्यान रखा जा रहा है.

वो बताती हैं, "बच्चे के इच्छुक जोड़े को लगभग साढ़े 16 लाख रुपए देने होते हैं. इसमें से करीब साढ़े छह लाख रुपए सीधे सरोगेट मां के हाथ में दे दिए जाते हैं. बाकी बचे हुए रुपए को नौ महीने तक सरोगेट मां के देखभाल, मेडिकल जांच और बच्चा जनने पर खर्च किए जाते हैं."

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बीबीसी ने जितनी भी सरोगेट माँओं से आणंद में मुलाकात की, उन सभी ने इस बात की पुष्टि की कि उन्हें विदेशी जोड़ों के बच्चों के लिए करीब साढ़े छह लाख मिल रहे थे.

उनमें से कइयों ने बताया कि उन्हें भारतीय जोड़ों से कम पैसे मिलते थे. शायह यही वजह है कि वे विदेशी जोड़ों को तरजीह देते हैं.

भारत में सरोगेसी से जुड़ा हुआ कोई क़ानून नहीं है. लेकिन अब आईसीएमआर से जारी दिशा-निर्देश का सरोगेसी इंडस्ट्री पालन कर रही है.

इसके नियमों के मुताबिक़ एक औरत तब तक एक सरोगेट माँ नहीं बन सकती है जब तक उसका अपना एक जीवित बच्चा ना हो और वो एक बार ही सरोगेट माँ बन सकती है.

देवी परमार का कहना है, "सरकार गलत कर रही है. क्या सरकार हमारे घर आकर हमारी समस्याएं के बारे में पूछ रही हैं और जब भूखे थे तो हमें खाना खिलाया?"

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