औरतों के लिए शौचालय की लड़ाई

"वो कहते हैं न पर्सनल इज़ पॉलिटिकल...तो बस ये मेरा पर्सनल यानी निजी मुद्दा था और मैंने फ़ैसला किया कि मैं समाज की सभी बहनों के लिए यह लड़ाई लड़ूंगी."

मिलिए मुमताज़ शेख़ से जो भारत की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले शहर मुंबई में महिलाएं के पेशाब करने की जगह के लिए लड़ रही हैं.

आप सोच रहे होंगे कि रोज़मर्रा की एक ज़रूरत को महिलाओं को हक़ के रूप में क्यों मांगना पड़ा है?

वह इसलिए क्योंकि सार्वजनिक शौचालयों में मूत्रालय के इस्तेमाल के लिए पुरुषों से पैसा नहीं लिया जाता जबकि महिलाओं से पैसे लिए जाते हैं. मुमताज़ शेख़ इसे बदलने के लिए एक नई मुहिम चला रही हैं.

मुंबई में बस्तियों की पतली गलियों में सरपट चलते हुए मुमताज़ कहती हैं, "मुंबई शहर सोता नहीं है, लेकिन जो लोग इस शहर को संवारने में अपने दिन-रात गुज़ार देते हैं, उनकी मूलभूत ज़रूरतों पर ध्यान नहीं दिया जाता. ख़ासतौर पर महिलाओं की. वैसे तो पर्याप्त सार्वजनिक शौचालय हैं नहीं, और जो हैं भी वो महिलाओं से पेशाब करने के भी पैसे मांगते हैं. क्यों दूं मैं पैसे? सिर्फ़ इसलिए कि एक महिला होने के नाते मुझे पेशाब जाने के लिए भी एक चारदीवारी की ज़रूरत पड़ती है."

मुंबई की बस्तियों में अगर सुबह के वक़्त देखें तो हर सार्वजनिक शौचालय के बाहर महिलाओं की लंबी क़तार दिखती है.

इन महिलाओं की हर दिन की शुरुआत इसी तरह होती है. सुबह शौचालय जाने के लिए इन्हें लगभग आधा घंटा इस क़तार में इंतज़ार करना पड़ता है, क्योंकि मुंबई की बस्तियों के घरों में शौचालय ही नहीं हैं.

क़तार में खड़ी महिलाओं के चेहरे पर ग़ुस्सा साफ़ झलकता है. शौचालय का इस्तेमाल कर जैसे ही वो बाहर आती हैं, तो वहां रखी मेज पर दो रुपए का सिक्का रख घर की ओर निकल पड़ती हैं.

झल्लाते हुए कहती हैं, "आदमी का क्या है, वो तो कहीं भी दीवार के आगे खड़े हो जाते हैं, लेकिन हम महिलाएं क्या करें? हर दिन अगर पांच बार भी जाना हो तो 10 रुपए लगते हैं. हम ग़रीब कहां से लाएं इतना पैसा? पूरा दिन टॉयलेट न जाने के लिए पानी तक नहीं पीते हम."

मुंबई में कई महिलाएं पैसे बचाने के लिए शौचालयों की जगह खुले में पेशाब करने जाती हैं. लेकिन वो ये भी जानती हैं कि सुरक्षा के नज़रिए से यह उनके लिए जोखिम भरा हो सकता है.

भारत में पिछले कुछ सालों में कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जब एकांत में पेशाब करने जा रही महिलाएं बलात्कार का शिकार हुई हैं.

पिछले चार साल से मुमताज़ शेख एक नायाब मुहिम चला रही हैं, जिसका नाम है- 'राइट टु पी' यानी पेशाब करने का अधिकार.

उनकी मांग है कि मुंबई की नगरपालिका महिलाओं के लिए मुफ़्त और सुरक्षित मूत्रालय मुहैया करवाए.

लेकिन मुकाम तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं था.

वह कहती हैं, "जब हम नगर निगम अधिकारियों के पास अपनी मांग लेकर पहुंचे, तो उन्होंने इसे हंसी में उड़ा दिया. कहा कि अब हम ऐसे मुद्दों पर भी बात करेंगे? यह दर्शाता है कि भारत में ज़्यादातर लोगों की मानसिकता यही है कि महिलाओं की कोई ज़रूरतें नहीं है, और अगर हैं भी तो उन पर ध्यान देने की कोई ज़रूरत नहीं है."

लेकिन जब अधिकारियों ने उनकी मांग अनसुना कर दी, तो उनका ध्यान खींचने के लिए मुमताज़ ने एक नायाब तरीक़ा ढूंढा.

हंसते हुए वो बताती हैं, "हमने उन्हें कहा कि अगर उन्होंने हमारी मांगें नहीं सुनीं तो हम महिलाएं उनके दफ़्तर के बाहर खुले में पेशाब करने के लिए बैठ जाएंगी. बस ये सुनते ही अधिकारियों ने हमें बैठक के लिए बुला लिया. और आज आलम ये है कि हम नगर निगम के साथ मिलकर लगभग 90 मुफ़्त मूत्रालय बनवाने को योजना पर काम कर रहे हैं."

'राइट टु पी' मुहिम शहर में जगह-जगह नुक्कड़ नाटक कर लोगों में जागरूकता बढ़ाने में लगी है.

नाटक के एक भाग में महिलाएं एक पुरुष को डांटते हुए गाना गा रही हैं– अच्छी बात कर ली बहुत, अब करूंगी तेरे साथ गंदी बात, गंदी गंदी गंदी गंदी गंदी बात!

यहां गंदी बात से मतलब ज़ाहिर है– अगर महिला पेशाब जैसी अपनी ज़रूरतों की बात करे, तो समाज उसे गंदी बात ही तो कहता है.

दर्शकों के बीच मौजूद कुछ महिलाएं जहां इस नाटक को बड़े ध्यान से देख और सुन रही हैं, तो कुछ महिलाएं शर्म के मारे इधर-उधर नज़रें घुमा रही हैं.

शायद यही इस बात का संकेत है कि भारत में महिलाओं की ज़रूरतों और उनकी आवाज़ को सदियों से दबाया जाता रहा है.

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