जहां चाय बनी ज़हर का प्याला

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"हमारे लिए तो दो जून की रोटी तक का जुगाड़ करना पहाड़ है. ऐसे में दवा और इलाज की कौन कहे. हरी-भरी पत्तियों वाला यह बागान हमारे लिए तो ज़हर का ऐसा प्याला बन गया है. इसे पीकर हम पल-पल मरने को अभिशप्त हैं."

इतना कहते हुए जोगिता लोहार रोने लगती हैं. उनके पति महीनों से बीमार हैं.

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी ज़िले में डंकन समूह के इस बागराकोट चाय बागान के लगभग तीन हज़ार मज़दूर और उनके परिजनों की हालत जोगिता से अलग नहीं है.

बागराकोट चाय बागान में इस साल सितंबर से अब तक भूख से 14 मज़दूर मर चुके हैं. बागानों से पलायन तेज़ हो रहा है. इससे मानव तस्करी के मामले भी बढ़े हैं.

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चाय बागानों की बदहाली और इस बारे में राज्य सरकार की उदासीनता के विरोध में 20 से ज़्यादा मज़दूर यूनियनों ने 27 नवंबर से चार दिवसीय भूख हड़ताल करने और एक दिसंबर को आम हड़ताल का फ़ैसला किया है.

मज़दूर यूनियनों का आरोप है कि राज्य और केंद्र सरकारों का उदासीन रवैया ही तमाम समस्याओं की जड़ है.

सीटू के प्रदेश अध्यक्ष श्यामल चक्रवर्ती कहते हैं, "राज्य सरकार ने अब तक इन समस्याओं के समाधान की दिशा में कोई पहल ही नहीं की है."

डंकन समूह के बागराकोट बागान में इसी सप्ताह सोमवार को शिबू प्रधान नामक एक और मज़दूर ने लंबी बीमारी और इलाज के अभाव में दम तोड़ दिया. इसी समूह के नागाईसूरी बागान में मनकी मुंडा की भी इन वजहों से सोमवार को ही मौत हो गई.

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हाल में चाय बागान इलाक़ों का दौरा करने वाली मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रबंधन को बागान समुचित तरीक़े से चलाने का निर्देश देते हुए कहा था कि ऐसा न करने वाले बागानों को सरकार अपने हाथ में ले लेगी.

राज्य सरकार ने मज़दूरी का भुगतान न करने के मामले में डंकन समूह के ख़िलाफ़ सीआईडी जांच के भी आदेश दिए हैं.

उत्तर बंगाल के डुआर्स और तराई इलाक़े के 290 बागानों में सालाना 22 करोड़ दस लाख किलो चाय पैदा होती है.

देश में पैदा होने वाली कुल चाय में बंगाल का हिस्सा 24 फ़ीसदी है. इलाक़े में 13 दूसरे चाय बागान अरसे से बंद हैं.

जो बागान खुले हैं, उनकी भी हालत अच्छी नहीं. समय पर मज़दूरी और राशन न मिलने, पीने के पानी की सप्लाई बंद होने और इलाज की कोई सुविधा न होने से बीते एक दशक के दौरान इन बागानों में कुपोषण और भूख से होने वाली मौतें अक्सर सुर्खियां बटोरती रही हैं.

लेकिन इस साल अब तक इन मौतों की तादाद सौ पार हो गई है.

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अब अगले साल होने वाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए ममता बनर्जी ने बंद बागानों पर ध्यान दिया है.

बागराकोट बागान में भूख से हुई मौत की ख़बरें सामने आने के बाद ही उन्होंने हाल में उस इलाक़े का दौरा किया था.

सरकार ने इन मज़दूरों के लिए 100 करोड़ की योजना का ऐलान किया है. उसने मज़दूरों को दो रुपए किलो चावल देने की एक योजना भी शुरू की है.

लेकिन मज़दूरों का आरोप है कि ये चावल इंसानों के खाने लायक़ नहीं हैं.

सिलीगुड़ी वेलफ़ेयर आर्गनाइज़ेशन की ओर से हाल में किए गए सर्वेक्षण से पता चला कि ज़्यादातर चाय बागानों में आधे से ज़्यादा मज़दूरों का बीएमआई यानी बॉडी मास इंडेक्स 18.5 है.

कहीं-कहीं तो यह 14 भी पाया गया. यह बीएमआई अकालग्रस्त इलाक़े के लोगों का होता है. देश में 23 से 24 तक के बीएमआई को आदर्श माना जाता है. इससे मज़दूरों के बीच कुपोषण की तस्वीर सामने आती है.

संगठन के सदस्य अभिजीत मजुमदार कहते हैं, "ख़ासकर बंद चाय बागानों में अकाल जैसे हालात हैं. यह धीरे-धीरे महामारी की शक्ल ले रहा है."

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