जब वैशाली भालेराव हल चलाती हैं

तपती धूप, बरसात में घंटों खेत में काम करती औरतें भारत के किसी भी कोने में दिख जाती हैं. भारत में 80 प्रतिशत कामकाजी महिलाएं खेतीबाड़ी से जुड़ी हैं लेकिन किसान कहते ही जेहन में पुरुष की ही छवि उभरती है.

पर तस्वीर की पहचान अब बदल रही है. वैशाली जयवंत भालेराव, रिंपी कुमारी और करमजीत अपने गांव में अनोखी हैं क्योंकि ये अपने गांव की इकलौती महिला किसान हैं.

वैशाली 40 साल की विधवा हैं- दो नौजवान बच्चे हैं. वर्धा के पेठ गांव में पांच एकड़ खेत हैं जिसमें वे कपास दलहन और सोयाबीन उगाती हैं.

Image caption वैशाली 40 साल की विधवा हैं

दोपहर की धूप में- खेतों की मेड़ पर खामोशी से चलते हुए वे पत्तों को प्यार से सहलाती हैं, मिट्टी का मुआयना करती हैं.

मैं हैरान हूं उनके आत्मविश्वास और खेती के बारे में उनकी समझ देखकर. खेती की बारीकियां वे ऐसे समझाती हैं जैसे शुरू से बस यही किया हो.

पर ये सब कुछ नया है- 20 साल की उम्र में जब ब्याह कर वैशाली आई थीं तो ऐसी भूमिका की कल्पना भी नहीं की थी.

लेकिन छह साल पहले उनके पति ने फसल बर्बादी और बढ़ते क़र्ज़ के कारण आत्महत्या कर ली.

भारत में 18 प्रतिशत ग्रामीण परिवार की मुखिया अब औरतें हैं- वैशाली का परिवार भी उनमें से एक है.

ये ज़्यादातर समय तब होता है जब या तो पुरुष पलायन कर जाते हैं या फिर क़र्ज़ के बोझ से अपनी जान दे देते हैं.

वैशाली ने तय किया पति की आत्महत्या उनके बच्चों के भविष्य की हत्या नहीं कर सकती- वे जिएंगे, लड़ेंगे और जीतेंगे.

वैशाली कहती हैं, "मैं 33-34 साल की थी जब ये दुर्घटना हुई. कोई नहीं चाहता- ज़िंदगी की सारी ज़िम्मेदारियों का बोझ उठाना- खेती का ख्याल करो- घर देखो- लेकिन मुश्किल समय था. मुझे करना ही पड़ा. मैंने खुद से कहा- जो मुझे करना चाहिए वह मुझे करना ही होगा."

जनगणना के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़ पिछले दो दशकों में क़र्ज़ के बोझ और बर्बाद फसल की मार के कारण कम से कम तीन लाख किसानों ने आत्महत्या की है.

कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यह संख्या कम करके आंकी गई है क्योंकि हर मामला पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज नहीं होता है.

वैशाली के पति के गुज़रने के बाद उसे ज़मीन का मालिकाना हक़ मिला.

क़ानून की नज़र में ज़मीन पर औरतों का बराबर का हक़ है, लेकिन आमतौर पर ऐसा होता नहीं है.

वैशाली ने उस एक मौक़े को हाथ से नहीं गंवाया. उसके पास मातम मनाने का भी वक़्त नहीं था.

कैसा लगता है इकलौती महिला किसान होना - मेरे इस सवाल पर चेहरा दमक उठता है वैशाली का. वह कहती हैं, "बहुत अच्छा. वीरांगना की तरह ..पहले तो मेरे खेत के मज़दूर ही मुझे किसी क़ाबिल नहीं समझते थे कि ये औरत है क्या खेती करेगी- कैसे बीज का चुनाव करेगी लेकिन फिर धीरे-धीरे मुझे काम आ गया और उनको मुझ पर भरोसा."

गांव में वैशाली की हिम्मत और सूझबूझ की तारीफ़ करते कई मिल जाते हैं. और ये कहते भी कि भई औरतों को खेत का हक़ मिलना चाहिए- वैशाली ने तो अपने पति से बेहतर किसानी की है!

वैशाली के पास खेती के अलावा कोई चारा नहीं था लेकिन सैंकड़ों मील दूर राजस्थान के कोटा ज़िले के एक गांव में दो ग़ैर शादीशुदा बहनों ने अपनी इच्छा से खेती शुरू की है.

32 साल की रिंपी और 26 साल की करमजीत जब मोटरसाइकिल पर सवार मेन रोड पर मुझे लेने आईं तो मैं थोड़ा हैरान हुई.

छोटी बहन करमजीत चुहल कर कहती हैं, "आप अकेले हमारे घर तो पहुँच नहीं पातीं तो हम आ गए आपको लेने." ड्राइवर की सीट पर वही बैठी हैं.

रिंपी बड़ी हैं, पूरे घर की ज़िम्मेदारी उनके ही कंधों पर है. वे आईटी सेक्टर में काम करती थीं, जिसे छोड़ खेती करना उन्होंने तय किया. छोटी बहन करमजीत उनके साथ लगी रहती हैं.

रिंपी कहती हैं, "सात साल पहले जब मेरे पिताजी गुज़र गए तो मैंने तय किया मैं खेती करूंगी. वैसे तो मेरे पास अच्छी नौकरी थी, लेकिन हमारे पास काफ़ी ज़मीन है. मेरे बड़े भाई हैं, लेकिन उन्हें इस काम में उतनी रुचि नहीं है. मेरे फ़ैसले में मेरे भाई औरे मेरी मां ने साथ दिया. बाकियों पर तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा पर मुझे उसकी परवाह नहीं है."

32 एकड़ खेत में खुद ट्रैक्टर चलाती, मज़दूरों को काम बताती, हिसाब-किताब करती, एक-एक फ़ैसले को सूझबूझ से लेती रिंपी को देखकर अच्छा लगा.

उनकी उम्र की गांव की बाकी लड़कियां कब का घर बसा चुकी हैं. अपने आंवले, गेहूं और सोयाबीन के खेतों में टलहते हुए रिंपी ने मुझसे कहा, "लड़कियों से और क्या उम्मीद करते हैं लोग- शादी करो, बच्चे करो, घर में रहो. मैं कुछ अलग करना चाहती हूं. शादी मेरे लिए बंधन है. मैं सचमुच अपनी खेती को आगे बढ़ाना चाहती हूं- बहुत आज़ादी से उड़ना चाहती हूं."

रिंपी की आज़ादी की ख़्वाहिश उस गांव में बहुत पसंद नहीं की जाती.

80 साल के सरदार सिंह कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि ये दो बहनें जो कर रही हैं वह ठीक है. उन्हें सही समय में शादी कर अपना घर बसाना चाहिए. खेती भाई करें और बाकी ज़मीन बयाने पर लगा दें. हम अपनी औरतों को बाहर नहीं जाने देते- खेती तो दूर की बात है."

रिंपी को ऐसी नाराज़गी की आदत हो गई है. उन्हें इससे लड़ने की ताक़त अपनी मां सुखदेव कौर से मिलती है.

गुलाबी सलवार कमीज और दुपट्टे से सर को ढके सुखदेव कौर बेटियों के नाम पर हुमस कर कहती हैं, "लड़कियों को आज़ादी चाहिए- उड़ना तो वो सीख ही लेती हैं. बस हम उनके पंख न कुतरें. मेरी बेटियों ने दिखा दिया वे बेटों से बढ़कर हैं. मुझे समाज की परवाह नहीं है."

रिंपी अपने पिता से बेहतर कमाई कर रही है- नए खेत खरीद रही हैं और आधुनिक तरीक़े से खेती करने में विश्वास रखती हैं.

खेती के तौर-तरीक़े की अब उनको आदत हो गई है पर एक जगह जाना उन्हें बिल्कुल अच्छा नहीं लगता- शहर की मंडी जहां वे अपना अनाज बेचती हैं.

हज़ारों टन बोरियों के बीच रिंपी के साथ खड़े होने पर मुझे इसकी वजह का अंदाज़ा हो गया.

रिंपी कहती हैं, ''अब देखिए यहां मेरे अलावा कोई औरत नहीं है. इसीलिए शायद वे इतना घूरते हैं कि मैं यहां क्या कर रही हूं. मैं इसीलिए लड़कियों के कपड़े पहनकर नहीं आती हूं- पैंट कमीज़ में आती हूं ताकि लोग मुझे ज़्यादा न घूरें. लड़कों के कपड़े में लोग मुझे गंभीरता से लेते हैं."

मुझे पता है रिंपी, वैशाली, करमजीत और इनकी तरह की दूसरी औरतों का सफ़र आसान नहीं है, लेकिन इन्होंने तय किया है कि अपने रास्ते तो ये खुद तय करेंगी और हारेंगी नहीं.

आज़ाद सशक्त और फ़ैसले लेने का हौसला रखने वाली ये हैं ज़मीन की औरतें- रिंपी और करमजीत ने खेती करने का फैसला लिया - वे धनी परिवार से हैं - पढ़ी-लिखी हैं, लेकिन वैशाली के पास ऐसे अवसर नहीं थे. पर वो चाहती हैं अपनी बेटी को ये सब कुछ मुहैया कराना ताकि वे अपने फ़ैसले खुद ले. अधिकार के साथ जिए.

ये सभी औरतें अपने अंदाज़ में उस परिभाषा का विस्तार कर रही हैं जो गढ़ रही है आधुनिक भारत में ज़मीन से जुड़ी औरतों के नए मायने.

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