मिले सुर मेरा..से मोदी सरकार तक

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सालों पहले लोकसंचार परिषद के लिए लिखे पीयूष पांडे के गीत 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' ने उन्हें भारत के ब्रैंड निर्माताओं की पहली कतार में ला खड़ा किया था.

उसके बाद तो उनकी तरफ़ से विश्व स्तर के विज्ञापन अभियानों की झड़ी सी लग गई.. लूना, कैडबरीज़, फ़ेविकोल, सेंटरफ़्रेश और न जाने क्या-क्या! भारतीय जनमानस से संवाद स्थापित करने का पहला पाठ पीयूष ने अपने पिता इंद्र नारायण पांडे से सीखा था.

जयपुर की बर्फ़ीली सुबहों में, लिहाफ़ में गुड़मुड़ियाए पाँच साल के पीयूष को उनके पिता अपनी सुरीली आवाज़ में गुनगुनाते हुए जगाया करते थे- चिड़िया चूँ चूँ करके बोली, भोर निकलकर आई क्या? बिटिया पड़ी बिछौना पूछे, अम्मा चाय पकाई क्या?

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पीयूष पांडे कहते हैं कि उनका जन्म एक क्रिएटिव फ़ैक्ट्री में हुआ था. उन्होंने कहा, "बचपन से ही हम लोग घर में हिंदी बोलते थे. मेरी बहनें भी हिंदी बोलती थीं. मेरे माता-पिता दोनों साहित्य पढ़ते थे हिंदी का. हमारे सोचने, हंसने और रोने का तरीक़ा सभी हिंदी का था. जब मेरे पिता ने मेरी माँ को पहला तोहफ़ा दिया था, तो वो दौड़ते हुए ये देखने के लिए अपने कमरे में गई थीं कि उस पैकेट में क्या था. वो उम्मीद कर रही थीं कि उसमें कोई साड़ी या ज़ेवर निकलेगा. लेकिन जब उन्होंने वो पैकेट खोला तो उसमें हिंदी साहित्य की दो चुनिंदा किताबें थीं."

दिल्ली के मशहूर सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज में पढ़े पीयूष पांडे से मैंने पूछा कि आमतौर से माँ बाप अपने बच्चों को या तो डॉक्टर बनाना चाहते हैं या इंजीनयर. आप विज्ञापनों की दुनिया में कैसे आ गए?

पीयूष ने जवाब दिया, "मेरे माँ-बाप ने इंजीनियर और डॉक्टर बनाने की बहुत कोशिश की थी स्कूल में. अगर मैं डॉक्टर बनता तो रोगियों को बहुत परेशानी होती और इंजीनयर बनता तो कई घर टूटते. सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज ने मुझे सिर्फ़ आर्ट्स में दाखिला दिया और वहाँ से मेरी ज़िंदगी थोड़ी सी बदल गई क्योंकि साइंस और गणित मेरे बस का रोग नहीं था."

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कॉलेज के अनुभवों को याद करते हुए पीयूष आगे कहते हैं, "जब हम पढ़ रहे थे तो मैंने और मेरे दोस्त मशहूर क्रिकेटर अरुण लाल ने तय किया था कि जहाँ भी नौकरी करेंगे, साथ करेंगे. वह एक चाय की कंपनी में टी टेस्टर बनकर चले गए थे. जब मैंने एमए पूरा किया तो अरुण ने मेरा बायोडाटा मंगवाया और मुझे भी उनकी कंपनी में नौकरी मिल गई. मैंने तीन साल टी टेस्टिंग की. एक दिन अरुण ने कहा कि तुम जो चीज़ें बोलते हो दिन भर, तुम क्यों नहीं एडवर्टाइज़िंग में अपना हाथ आज़माते. जब मैं मुंबई आया और काफ़ी भागदौड़ करने के बाद ओगल्वी ने मुझे नौकरी दी. आज भी मैं वहाँ हूँ 33 साल बाद भी."

वैसे इस सबकी नींव बहुत पहले जयपुर में रखी गई थीं जब सत्तर के दशक में उनकी बहन इला अरुण ने जो आज मशहूर गायिका है, जयपुर में एक कंपनी शुरू की थी. वो विविध भारती के लिए रेडियो जिंगल्स बनाया करती थीं. पीयूष इन जिंगल्स में अपनी आवाज़ देते थे और इसके लिए इला उन्हें 50 रुपए दिया करती थीं.

इला अरुण याद करती हैं, "उस ज़माने में 7 सेकेंड के जिंगल के 200 रुपए मिलते थे. सबसे बड़ी दिक़्क़त होती थी इन सात सेकेंडों में ही प्रोडक्ट का पूरा पता बताना. हमारे घर में पीयूष की आवाज़ सबसे अच्छी थी. घर में ही हम लोगों ने एक स्टूडियो बना रखा था. मैं गाती थी, मेरी पसंद का एक साबुन झागो. उसमें पीयूष ज़ोर से आवाज़ लगाते थे, झागो झागो."

पीयूष को शुरू से ही वन लाइनर्स और पंच लाइन मारने में महारत हासिल थी. उनके दोस्त अरुण लाल याद करते हैं, "शुरुआत में उन्हें विज्ञापनों के प्रति कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं थी. उनके लिए वो एक तरह का एक्सिडेंट था. लेकिन शुरू से ही इनमें तुकबंदी करने का गुण था. वे जिस तरह से सोचते थे, कोई भी वैसा नहीं सोचता था. इनके मुंह से इतने अच्छे वन लाइनर निकलते थे कि मैं उनसे कहा करता था कि तुम्हें तो विज्ञापनों की दुनिया में होना चाहिए था. चाय की कंपनी में तुम अपने आप को बर्बाद कर रहे हो."

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विज्ञापनों के अलावा पीयूष का एक और शौक था क्रिकेट का. वो राजस्थान की रणजी ट्राफ़ी टीम के सदस्य थे. दिल्ली विश्वविद्यालय में उनकी टीम के सदस्य होते थे, अमृत माथुर, कीर्ति आज़ाद और अरुण लाल. एक बार हिंदू कॉलेज के साथ मैच में सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज के छह विकेट सिर्फ़ 53 रनों पर गिर गए थे.

अरुण लाल को वह मैच याद है, "हमारे लिए तो वो मैच टेस्ट मैच की तरह था. करीब 15 हज़ार लोग मैच देखने आए थे. मैं आउट होकर बाहर जा रहा था और पीयूष अंदर घुस रहे थे. मैंने उनसे कहा था कि संभाल लेना भाई. पीयूष ने 71 रनों की ज़बरदस्त पारी खेल हमारी टीम को जिताया था."

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'चल मेरी लूना' के विज्ञापन से पीयूष ने पहली बार अपनी पहचान बनाई. दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने अपनी यह कृति पहली बार अपने पड़ोसी के टेलीविज़न पर देखी और वह भी उसकी खिड़की के शीशे से.

पीयूष पांडे याद करते हैं, "मैंने मुंबई में एचएफ़डीसी से लोन लेकर एक छोटा सा अपार्टमेंट ख़रीदा था. कुछ पैसे मैंने अपने दोस्तों और परिवार वालों से लिए थे. मैंने तय किया था कि जब तक मैं लोगों के पैसे नहीं लौटा दूँगा तब तक कोई चीज़ नहीं ख़रीदूँगा. इसलिए मैंने टीवी नहीं ख़रीदा था. लेकिन मैं चाहता था कि जिस दिन पहली बार मेरा टीवी पर मेरा विज्ञापन आए तो मैं उसे देखूँ. मैं ग्राउंड फ़्लोर पर पहता था. मैंने अपने पड़ोसी से अनुरोध किया कि क्या मैं आपकी खिड़की के बाहर खड़ा होकर अपना विज्ञापन आपके टेलीविज़न पर देख सकता हूँ? वह बोले अंदर आकर चाय पीजिए. मैंने कहा मैं आपको डिस्टर्ब नहीं करूँगा. खिड़की से ही देख लूँगा और मैंने खिड़की के शीशे से अपना पहला एेड टीवी पर देखा."

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उनका कैडबरीज़ का वह कुछ ख़ास है वाला विज्ञापन याद करिए, जब 99 के स्कोर पर एक क्रिकेटर छक्का लगाता है और उसकी माशूका सारे सुरक्षाकर्मियों को छकाते हुए बीच मैदान में आकर डांस करने लगती है. मैंने पीयूष पांडे से पूछा कि कहीं आप अब्बास अली बेग से तो प्रेरित नहीं हुए थे जिनके साथ भी कुछ इससे मिलता-जुलता वाकया हुआ था?

पीयूष ने जवाब दिया-नहीं, आइडिया ये था कि मैं लोगों को बताऊँ कि हर इंसान के अंदर एक बच्चा होता है जिसे हम जैसे-जैसे बड़े होने लगते हैं, छुपाने लगते हैं. हर समय हम कोई काम करने से पहले सोचते हैं कि लोग क्या कहेंगे. असल में इस बारे में प्रेरित हुआ था एक अंग्रेज़ी पिक्चर से, जिसमें एक बाप अपने बच्चे को बेसबॉल खेलते हुए देखता है, जो बहुत कमज़ोर था उस खेल में. उसके पास एक ऊँचा कैच आता है जिसे वो पकड़ लेता है और बाप ख़ुशी से पागल हो जाता है और बच्चों की तरह उसे सेलिब्रेट करता है.

पीयूष के फ़ेविकोल के बस वाले वाले विज्ञापन को पूरी दुनिया में जितनी तारीफ़ मिली उतनी शायद किसी विज्ञापन को नहीं. इस फ़िल्म का एक-एक फ्रेम असली है जिसे पीयूष ने राजस्थान की लोकेशन पर शूट किया था. उनके फ़ेविकोल के 'दम लगा के हइसा' वाले विज्ञापन का भी कोई जवाब नहीं.

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पीयूष पांडे कहते हैं, "मुझे जब फ़ेविकोल पर काम करने का मौका दिया गया था तो यह भी नसीहत दी गई थी कि ये क्लायेंट कोई ज़्यादा क्रिएटिव काम नहीं ख़रीदते हैं. मैं उनके पास डरा हुआ 'दम लगा के हइसा' लेकर गया था. वो क्लायेंट इतने समझदार निकले कि बोले कि ये बहुत बड़ा आइडिया है. तुम इसे इतनी छोटे ब्रांड के लिए क्यों बना रहे हो. तुम इसे फ़ेविकोल के लिए बनाओ. मैंने पहले इसे फ़ैवीटाइट के लिए लिखा था. फिर वो मुझसे बोले तुम इसे रेडियो के लिए क्यों कर रहे हो. जाओ इसकी फ़िल्म बनाओ. वहाँ से जिस सफ़र की शुरुआत हुई, वह सफ़र अभी भी जारी है."

एक और विज्ञापन जिससे पीयूष को बहुत तारीफ़ मिली, वह था एसबीआई लाइफ़ का विज्ञापन, जिसमें एक बुज़ुर्ग शख़्स अपनी पत्नी को एक हीरा उपहार में देता है. ये प्रसंग भी पीयूष के अपने ख़ुद के जीवन से जुड़ा है.

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पीयूष ने बताया, "मुझे याद है कि हम दोनों भाई अपनी-अपनी नौकरियों में अच्छा करने लगे थे. थोड़े बहुत पैसे भी आ गए थे. तब मेरी बहनों ने कहा कि पता है मां को हीरे का शौक है, लेकिन उनकी आदत नहीं है कि वो किसी से कुछ मांगें. तो हमने कहा कि उन्हें हीरे लाकर देते हैं. लेकिन एक भाई दोनो ईयर रिंग नहीं ख़रीद सकते थे. एक-एक ख़रीदा. हम लेकर गए तो मां रोने लगी. उनकी तमन्ना पूरी नहीं हुई थी. बोली इस उम्र में मैं क्या करूंगी."

नरेंद्र मोदी को सत्ता में लाने का थोड़ा बहुत श्रेय भी पीयूष को जाता है. उन्होंने ही 'अबकी बार, मोदी सरकार' का नारा गढ़ा और 'अच्छे दिन आने वाले हैं' का अभियान चलाया. पीयूष ने बताया, "जो टीम हमें ब्रीफ़ कर रही थी, उनकी सोच साफ़ थी. उनका फ़ैसला था कि मोदी सरकार से लीड करेंगे, बीजेपी सरकार से नहीं. इसके बाद मेरा काम आसान हो गया."

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लेकिन पीयूष की जिस कृति पर पर उनकी मां को सबसे ज़्यादा नाज़ था, वो था कालजयी 'मिले सुर मेरा तुम्हारा'. उनका कहना था कि काश तुम्हारे पिता इस काम को देखने के लिए जीवित होते.

पीयूष बताते हैं, "सभी रिश्तेदार, पड़ोसी और जयपुर के आसपास से सभी लोग मेरी मां को फ़ोन कर रहे थे. न मेरी मां और न पिता को मालूम था कि एडवार्टाइजिंग में नौकरी होती है. 1985 में मेरे पिता गुज़र गए थे. 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' 1987 में लिखी थी. तो वह कहती थीं जीवित होते तो अपने दोस्तों को बताते कि मेरा बेटा यह करता है."

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