बस..हम ही सच्चे और अच्छे, यही है आज का क़ानून

फ़ाइल फोटो इमेज कॉपीरइट AFP

मेरे घर में आज भी मिट्टी के तीन बंदर ऊंची जगह पर पड़े-पड़े देखते रहते हैं.

जब बच्चा था तो मां कहती थी कि किसी में बुराई मत देखो, उसकी अच्छाई पर ध्यान दो. पिता समझाते थे, 'अपने मुंह से किसी के लिए बुरी बात मत निकालना और दूसरा निकाले तो उसे भी रोक देना'. मेरे गुरु बताते थे, 'न बुरी बात सुनो और न बुरी बात सुनाओ'.

जब मैं ये तीनों बातें गिरह से बांधे-बांधे बड़ा हुआ तो अब मेरी मां कहती है, ''बुराई देखो तो चुप रहो.'' पिता कहते हैं, ''कोई बात मुंह से मत निकालो, जाने किसको बुरी लग जाए.'' गुरु कहते हैं, ''बुरी बात कान में पड़े तो सुनी-अनसुनी कर दो.''

इमेज कॉपीरइट

और मेरा राष्ट्र जिसके बारे में मुझे बचपन से बताया गया कि वो पिता, माता और गुरु सभी कुछ है, वही राष्ट्र अब मुझसे कहता है कि कभी ये मत सुनो कि हम बुरे हैं, बस ये कहो कि वो बुरे हैं.

कभी अपनी बुराई मत देखना, हमेशा ये देखना कि सामने वाला कितना घटिया है. कभी अपने बारे में बुरा मत सोचना, हमेशा सामने वाले के लिए बुरा सोचना.

इमेज कॉपीरइट AP

हम बुरे हो ही नहीं सकते, हम बुरी बात कर ही नहीं सकते, हम अपने लिए बुरी बात सुन ही नहीं सकते. बस यही है आज का संविधान, क़ानून और नियम. और जब, बस हम ही अच्छे और सच्चे हैं तो हमारा फ़र्ज़ है कि बुरों को सीधा करें, भले ही शब्दों के तीर से, डंडे से या ख़ंजर से.

अच्छाई फैलाने के लिए गाली-गलौच, पिटाई और मार डालना समेत सब कुछ ठीक है. बुराई में से अच्छाई का घी सीधी उंगली से न निकले तो टेढ़ी उंगली से निकाल लो.

मक़सद तो अच्छाई फैलाना है, भले ही कैसे भी. क्योंकि अब हम तय करेंगे कि अच्छाई क्या है और बुराई क्या. और वो भी सिर्फ़ अपने लिए नहीं, बल्कि तुम्हारे लिए भी.

इमेज कॉपीरइट AP

तर्क और दलील तो कमज़ोरों के हथियार हैं. ताक़तवर का तर्क से क्या लेना-देना. और हाँ, क़ानून तो अच्छी चीज़ है, लेकिन तभी अगर हम बनाएं और तुम पर लागू हो.

मैं आज जिस देश के जिस घर में रहता हूँ, वहाँ अगर यही नियम फलता-फूलता रहा तो आख़िर में सिर्फ़ ऐसा राष्ट्र बचेगा जहाँ शेर और बकरी एक ही घाट पर पानी पीएंगे. क्योंकि प्यासी बकरी का शिकार बुरी बात होती है. और फिर मेरे घर के सन्नाटे में भी मिट्टी के बने हुए तीन बुद्धिमान वानर ही रह जाएंगे, क्योंकि शेर मिट्टी नहीं खाता.

इमेज कॉपीरइट Reuters

न देखो, न कहो, न सुनो...बस मिट्टी के बंदर बन जाओ. ताकि संसार शांत हो जाए...क़ब्रिस्तान की तरह...मरघट की तरह.

ये है आदर्श राष्ट्र की नवीन छवि. अपनी तसल्ली के लिए जो भी नाम रख लो. बांग्लादेश, चीन, ईरान, अमरीका, सऊदी अरब, पाकिस्तान, भारत...कुछ भी.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार