गत्ते की नाव बनाकर बच्चे को बचाया गया

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मैं चेन्नई के वडपल्ली इलाक़े में रहती हूं. वहां सड़कें पानी से भरी हैं. सड़कें दिख ही नहीं रही हैं. गाड़ियां भी पानी में डूबी हैं.

मैं मंगलवार को अडियार में काम पर गई थी. वहां हालात बहुत ख़राब थे. नदी वहीं उफ़न गई और पानी शहर में आ गया.

मैं जब सुबह क़रीब नौ बजे गई थी तो 10 किलोमीटर की दूरी तय करने में एक घंटा लगा था. मैं एक बजे तक वहीं फँसी रही.

फिर मैंने कैब, बस या ऑटो लेने की कोशिश की लेकिन कुछ भी नहीं मिल रहा था.

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मैं इतना इंतज़ार नहीं कर सकती थी.

मैं चार किलोमीटर तक पैदल चली होंगी, इस बीच मैं पॉटहोल में भी गिर गई जिससे मैं बुरी तरह भीग गई थी.

दूसरी तरफ़ मेरे पिता बहुत परेशान थे, वो बार-बार मुझे फ़ोन कर रहे थे.

पांच बजे के आसपास तूफ़ान तेज़ हो गया, आईआईटी जहां मैं कुछ देर के लिए रूक गई थी, वहां कैंपस में चारों तरफ़ पेड़ गिरे पड़े थे. वहां से निकलने के बाद क़रीब दो-ढाई किलोमीटर चलने के बाद मैं एक बस स्टैंड पहुँच पाई. मगर वो पानी से घिरा था, बसे नहीं चल रही थीं.

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मैं घंटे पर वहां फँसी रही. किसी तरह एक ऑटो मिला हालांकि उसने मुझसे 500 रुपए लिए.

ऑटो से भी घर पहुंचने पर मुझे तीन घंटे लगे. ऑटो में भी पानी मेरे घुटनों तक था. ऐसा लग रहा था कि जैसे मैं किसी स्विमिंग पूल में उतर रही हूं.

रास्ते में चारों तरफ़ पेड़ गिरे पड़े थे, बिजली के तार पानी में गिरे हुए, मेरे ही इलाक़े में पांच लोगों की मौत हो गई थी.

मुझे वडपल्ली से घर पहुंचने में साढ़े सात घंटे लग गए थे.

फिर भी मैं ख़ुशनसीब थी कि घर पहुँच गई. बहुत सारे लोग देर रात तक घर नहीं पहुँच पाए थे.

मेरा परिवार और दोस्त सुरक्षित हैं क्योंकि हमारा घर कुछ ऊंचाई पर हैं लेकिन घर से निकलने पर फँसने का डर है.

लेकिन साइदापेट में - जो सबसे प्रभावित इलाक़ा है, मेरी एक दोस्त को घर से निकलने के लिए ख़ुद से नाव तैयार करनी पड़ी.

उन्होंने प्लास्टिक की बोतलों और गत्तों से नाव बनाई. और बच्चे को नाव पर रखा और घर से निकल पाए.

हमारे यहां बिजली नहीं है. पावर बैकअप भी बंद हो गया है. जैनरेटर के लिए डीज़ल नहीं बचा है. एटीएम काम नहीं कर रहे हैं, कैश नहीं तो कुछ ख़रीद नहीं सकते.

वैसे भी खाने-पीने का सामान है ही नहीं तो लोग लाएंगे कहां से?

पिछले दिनों में बीमार रही हूं डॉक्टर को दिखाने की कोशिश की लेकिन अस्पताल में कोई डॉक्टर ही नहीं है.

(बीबीसी संवाददाता वंदना से बातचीत पर आधारित)

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